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शहरी परिवहन: अभिजात तंत्र में बदलता समाज

शहरीकरण के आधुनिक दौर में शहरी परिवहन मुनाफा कमाने और मुनाफाखोरी बढ़ाने का प्रमुख क्षेत्र है। कारों और मेट्रो के लिए बहुत महंगा भूतलीय, भूमिगत और उपरगामी परिवहन के ढांचे का विस्तार किया जा रहा है। यह सब नगरों-महानगरों को…

तिब्बत की प्रभुसत्ता का प्रश्न

विश्व बिरादरी में तिब्बत को न्याय कब मिलेगा इस प्रश्न का समाधान नहीं निकल पा रहा है। महामहिम दलाईलामा तिब्बत के लिए प्रभुसत्ता के बजाय केवल स्वायत्तता पर ही समझौता करने पर सहमत हैं। इस सूरत में चीन को भी…

आयुर्वेद में आस्था संकट का हल क्या है ?

आयुर्वेद चिकित्सा प्रणालियां आज की दुनिया में वैकल्पिक उपचार मानी जाती हैं। आयुर्वेद में विज्ञान, कला और दर्शन का त्रिवेणी संगम है जो व्यक्ति को स्वस्थ जीवन जीने की जीवनशैली से परिचित कराती है। आधुनिक चिकित्सा शैली के सहारे किसी…

“हम देश नहीं बिकने देंगे” के नारे के साथ भूमि अधिकार आंदोलन का ऑनलाइन सम्मेलन सम्पन्न

नई दिल्लीः भूमि अधिकार आंदोलन का ऑनलाइन राष्ट्रीय सम्मेलन 12 जुलाई 20 को सम्पन्न हुआ। इस  सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों के जनांदोलनों के 150 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने हिस्‍सा लिया। सम्‍मेलन में वक्ताओं द्वारा देश के तमाम संसाधनों पर…

व्यवस्था का ही ‘व्यवस्था’ की ज़रूरत से उठता यक़ीन !

वफ़ादारी के टुकड़ों-टुकड़ों में बँटी व्यवस्था से जुड़े हुए लोग भी कई-कई हिस्सों में बंट गए हैं। इनमें एक वे हैं जो मानते हैं कि वर्तमान न्यायिक व्यवस्था में अपराधियों को या तो सजा मिल ही नहीं पाती या फिर…

निजी कोल खनन के विरोध से लोक जुम्बिश की शुरूआत

राजेंद्र सिंह लोकतंत्र में जब ’तंत्र’ ही ’लोक’ के विरोध में खड़ा हो जाता है, तो लोक भी संगठित होकर अपने को मजबूत बना लेता है। लेकिन सरकार ने यह काम एक महामारी के दौरान किया है; जिसमें सामाजिक दूरियों…

आदिवासियों की सब्जी बाड़ी

श्रम आधारित गांव की, खेती की संस्कृति की वापसी हो रही है। गांव की पारंपरिक खान-पान संस्कृति बच रही है। इस तरह की मुहिम को आंगनबाड़ी जैसी योजनाओँ से भी जोड़ा जा सकता है। बाड़ियों में सब्जियों की खेती गांवों…

कोविड-19 राहत कोष को निरर्थक बनाते बैंक चार्जेस

बैंकिंग हमारी अनिवार्य ज़रूरत बन गई है। लेकिन आप जानते ही है कि ये ज़रूरत मुफ्त में पूरी नहीं होती। इसके लिए हर कदम पर चार्जेस लिये जाते है और खाते से पैसा कटता रहता है। हरेक सुविधा के लिए…

एनजीओ की बढती अप्रासंगिकता

‘सेवा,’ ‘विकास,’ ‘राजनीतिक प्रशिक्षण’ और ‘गैर-दलीय राजनीति’ के इन विभिन्‍न सोपानों से गुजरे और मौजूदा भेडियाधसान में ‘एनजीओ’ पुकारे जाने वाले इन व्‍यक्तियों, समूहों के बीच समझ, तेवर और उद्देश्‍यों को लेकर गहरी भिन्‍नता रही है। अव्‍वल तो, परिभाषा से…

हम किस ‘सीमा’ तक चीनी नाराज़गी की परवाह करना चाहते हैं ?

सवाल केवल इतना भर नहीं है कि प्रधानमंत्री ने दलाई लामा को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएँ प्रेषित नहीं कि जबकि पिछले वर्ष बौद्ध धार्मिक गुरु को उन्होंने फ़ोन करके ऐसा किया था। तो क्या पंद्रह जून को पूर्वी लद्दाख़ में…