“हम देश नहीं बिकने देंगे” के नारे के साथ भूमि अधिकार आंदोलन का ऑनलाइन सम्मेलन सम्पन्न

नई दिल्लीः भूमि अधिकार आंदोलन का ऑनलाइन राष्ट्रीय सम्मेलन 12 जुलाई 20 को सम्पन्न हुआ। इस  सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों के जनांदोलनों के 150 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने हिस्‍सा लिया। सम्‍मेलन में वक्ताओं द्वारा देश के तमाम संसाधनों पर देश की मेहनतकश जनता के समाप्त होते अधिकार तथा उनको कॉर्पेरेट शक्तियों को सौंपने की प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा की। सम्मेलन के केंद्र में कोरोना महामारी संकट के दौरान देश के मजदूरों के सामने खड़ा संकट और उसमें केंद्र-राज्य सरकारों की लापरवाही तथा मौजूदा केंद्र सरकार द्वारा लॉकडाउऩ का फायदा उठाते हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा प्रगतिशील तबके पर किए जा रहे हमलों पर मजबूत आवाज निकल कर आई।  वैश्विक महामारी की आड़ में जब लोग विरोध के लिए सड़कों पर नहीं आ सकते हैं, ऐसे में सरकार द्वारा विभिन्न जनविरोधी क़ानूनों का लागू किया जाना इस तथ्य को और मजबूत ही करता है।

सम्मेलन में अखिल भारतीय किसान सभा से हनन मुल्लाह, जनसंगठनों का राष्ट्रीय समन्वय से मेधा पाटकर, सर्वहारा जन आंदोलन से उल्का महाजन, आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच से दयामनी बारला, माइन्स मिनरल एंड पीपल से अशोक श्रीमाली, अखिल भारतीय वन श्रमजीवी यूनियन से अशोक चौधरी और रोमा मलिक, जिंदाबाद संगठन से त्रिलोचन पूंजी, इंसाफ से नरेंद्र मोहंती, ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन से सत्यवान जी, अखिल भारतीय किसान महासभा से प्रेम सिंह, किसान संघर्ष समिति से डॉ सुनीलम और अन्य वरिष्ठ साथियों ने अपनी बात और सुझाव रखे। 

चार सत्रों में बंटे इस सम्मेलन में श्रम कानूनों में हो रहे संशोधन, कोरोना महामारी की वजह से प्रवासी मजदूरों के जीवन तथा आजीविका पर आए संकट, कोयले के निजी आवंटन, खेती पर होने वाले दुष्प्रभाव, पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020 और जंगल क्षेत्र में बढ़ते अन्याय सहित केंद्र सरकार के नीतियों के कारण पैदा हुए तमाम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गयी।

जलआंदोलनों के प्रतिनिधियों ने सर्वसम्‍मति से पारित प्रस्‍ताव में कहा गया है कि 9 अगस्त को देशव्यापी प्रदर्शन के आयोजन के लिए देशभर के संगठनों को जोड़ा जाएगा और समन्वय के साथ इस प्रदर्शन को आयोजित किया जाएगा। “भारत बिकाऊ नहीं है” का नारा इस आंदोलन के माध्यम से लोगों के बीच पहुंचाया जाएगा। जो संगठन लॉकडाउन के कारण 9 अगस्त को प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं, उनसे 10 अगस्त को अपने क्षेत्रों में प्रदर्शन कर सकेंगे।

सम्मेलन में उपस्थित जनांदोलनों के प्रतिनिधियों ने यह भी प्रस्‍ताव पारित किया कि 23 जुलाई को ब्लॉक स्तर पर एक राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन किया जाएगा जिसमें राष्ट्रीय मुद्दों के साथ स्थानीय मुद्दों को भी उठाया जाएगा। वहीं भूमि सुधार पर एक अभियान शुरू किया जाए जो भविष्य में एक आंदोलन के रूप में खुद को विकसित करने में मदद करेगा। इसके अलावा जनता को उनके प्राकृतिक संसाधनों के लिए सरकार से रॉयल्टी की मांग करने के लिए संगठित किया जाए। प्राकृतिक संसाधनों की इस लड़ाई में प्रभावित समुदायों के साथ देश के सभी दमित वर्गों को भी जोड़ा जाए। सरकार द्वारा श्रम कानूनों में किए जा रहे संशोधनों का देश के तमाम जनांदोलनों द्वारा विरोध किया। कोरोना महामारी की वजह से प्रवासी मजदूरों के जीवन तथा आजीविका पर आए संकट को हल करने के लिए जनांदोलनों द्वारा सरकार पर दबाव बनाया जाए।

इसके अलावा अन्‍य पारित प्रस्‍तावों में कहा गया है कि संविधान का 73वां संशोधन, जनांदोलनों को संघर्ष की ज़मीन मुहैया करता है, इसलिए ज़रूरी है कि यह पूरी तरह से लागू हो और आदिवासी क्षेत्र में पेसा और वन अधिकार कानून भी पूर्ण रूप से लागू किया जाए। हमें इसके लिए जनांदोनों को तेज़ कर केंद्र सरकार पर दबाव बनाना होगा।  

चर्चा के दौरान सम्मेलन में सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि मौजूदा केंद्र सरकार इस महामारी का फायदा उठाते हुए तमाम जनविरोधी नीतियों को लागू कर रही है। यह सरकार निजीकरण की प्रक्रिया को तेज करते हुए तमाम सार्वजनिक संस्थाओं को निजी हाथों में सौंप रही है। ‘मैं देश नहीं बिकने दूंगा’ के नारे के साथ केंद्र में आई मौजूदा सरकार आज पूरी अर्थव्यव्यवस्था को देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हाथ बेचने की तैयारी कर रही है। ऐसे में वक्ताओं ने कहा कि हम मौजूदा केंद्र सरकार की इन मंशाओं के खिलाफ संघर्ष को बुलंद करते हुए देश नहीं बिकने देंगे। आंदोलन की आगामी कदमों को लेकर कुछ महत्वपूर्ण रणनीतिक बिंदु पर सहमति बनाई गई।

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