सर्व सेवा संघकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी सम्पन्न सेवाग्राम : सर्व सेवा संघ (अखिल भारत सर्वोदय मंडल) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की वर्चुअल बैठक में 13 राज्यों के 22 सदस्यों ने खादी संस्थाओं की ऋण माफ़ी एवं भारत और चीन के बीच में तनाव के संदर्भ…
जैव-विविधता इंसानों समेत समूची सचराचर धरती के विकास में अहमियत रखती है, लेकिन उसे इंसानों से ही सर्वाधिक खतरा भी है। अपनी खाऊ-उडाऊ विकास पद्धति पर अटूट भरोसा करने वाला इंसान यह तक भूलता जा रहा है कि जैव-विविधता की…
ये चित्र सत्ताओं में बैठे हुए लोगों को शर्मिंदा तो नहीं ही कर रहे हैं पर उनकी प्रजाओं को अपने होने के बावजूद कुछ भी न कर पाने को लेकर आत्म ग्लानि और क्षोभ में ज़रूर डूबा रहे हैं। इतना…
जिस लोकतंत्र की कसमें खाकर हम अपने तमाम अच्छे-बुरे, निजी-सार्वजनिक काम निकालते रहते हैं और किसी दूसरी राजनीतिक जमात के सत्ता पर सवारी गांठने से जिस लोकतंत्र की हत्या होना मान लिया जाता है, ठीक उसी लोकतंत्र की एन नाक…
किसानों सम्बन्धी तीनों अध्यादेश ‘‘किसानों की लूट कारपोरेट को छूट’’ प्रदान करने वाला किसानों के खिलाफ लाए गए तीनों अध्यादेश ‘‘किसानों की लूट कारपोरेट को छूट’’ प्रदान करने वाली नीति है। कृषि उपज, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन व सुविधा अध्यादेश…
क्या पेट की भूख का थोड़ा बहुत सम्बंध इस बात से नहीं होता होगा कि लोग उसी अनुशासन की अब सविनय अवज्ञा कर रहे हैं जो उनपर बिना पर्याप्त सरकारी तैयारी किए और उन्हें भी करने का मौक़ा दिए बग़ैर…
किशन पटनायक के किस्से पत्नी वाणी की जुबानी डॉ. सुनीलम किशन पटनायक भारत के प्रमुख समाजवादी चिन्तक और कर्मी रहे हैं। भारतीय राजनीति में जनांदोलनों की बढ़ती भूमिका को उन्होंने बहुत पहले पहचाना, समझा, उनसे एक रिश्ता बनाया और उन्हें…
सुरभि अग्रवाल, शोभा शुक्ल, बॉबी रमाकांत व संदीप पाण्डेय कोरोना वायरस से उपजी ‘कोविड-19’ बीमारी ने बेहद छोटे, करीब तीन महीने के अंतराल में कई तरह के गुल खिलाए हैं। सरकारी लापरवाही, अक्षमता और टालू प्रवृत्ति उन कईयों में से…
‘कोविड-19’ के इलाज के लिए वैक्सीन यानि ‘टीका’ की अहमियत उजागर हुई है, लेकिन क्या विशाल पैमाने पर इसका निर्माण आसान होगा? वे कंपनियां जो धंधे की खातिर झूठे आंकडों से बीमारी की गंभीरता स्थापित करने से लगाकर खुद बीमारी…
कोरोना की चपेट में आए लाखों-लाख श्रमिकों की बदहवास गांव-वापसी इशारा कर रही है कि खेती में आज भी काफी संभावनाएं है। क्या यह बात हमारे नीति-नियंता, सत्ताधारी और नौकरशाह समझ पाएंगे? क्या ‘कोरोना-बाद’ का भारत वापस कृषि-प्रधान हो सकेगा?…