राज्यसभा में सुधा मूर्ति की आवाज़ ने उस सच्चाई को उजागर कर दिया, जिसे समाज लंबे समय से टालता आ रहा था—डिजिटल दुनिया बच्चों के बचपन को निगल रही है। किडफ्लुएंसर संस्कृति की चमक के पीछे शोषण, दबाव, ट्रोलिंग और…
8 दिसंबर मानव इतिहास की उस अद्वितीय जागृति का उत्सव है, जिसने सिद्धार्थ को बुद्ध बनाया और पूरी मानवता को करुणा, विवेक और आत्मज्ञान का मार्ग दिया। बोधि दिवस हमें यह समझाता है कि सदियों बाद भी शांति और सत्य…
आजकल डाटा पूंजी के नए रूप की तरह उभरा है। मोबाइल का सामान्य उपयोग हमारे जीवन की जानकारियों, यानि डाटा को सार्वजनिक कर सकता है जिसे बाद में तरह-तरह के बाजारों में बेचा जा सकता है। एक दशक पहले देश…
विश्व मृदा दिवस हमें चेताता है कि मिट्टी का संकट केवल पर्यावरण नहीं, मानव अस्तित्व का प्रश्न है। प्लास्टिक, रसायनों और उपेक्षा से खोखली होती धरती को अब पुनर्जीवन चाहिए—केंचुओं की वापसी, जैविक खाद, नमी-संरक्षण और मिट्टी की ओर लौटता…
विनाशकारी विकास की हवस में हमारे सत्ताधारियों ने उन छह गांवों को सिरे से भुला दिया है जिनकी जमीनों पर साठ के दशक में ‘सरदार सरोवर परियोजना’ बनाने वालों की बस्ती बसाई गई थी। आजकल उसी इलाके में ‘स्टैच्यू ऑफ…
आज के दौर में औपचारिक आर्थिक ताने-बाने को बनाए रखने के लिए बैंक बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। खासियत यह है कि बैंकों की यह सेवा छोटे-छोटे, स्थानीय ग्रामीणों से लगाकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती है। क्या और कैसा है,…
21वीं सदी की दुनिया जलवायु संकट, विषैली हवा और औद्योगिक जोखिमों की भयावह सच्चाइयों से घिरी है, जिनका सबसे तीखा असर महिलाओं पर पड़ता है। वैश्विक शोध जहाँ आपदाओं में महिलाओं की मृत्यु दर चौदह गुना अधिक बताते हैं, वहीं…
2 दिसंबर सिर्फ एक स्मृति-दिवस नहीं, उस सच का आईना है जिसे भोपाल गैस त्रासदी ने उजागर किया था—पर्यावरणीय संकट कभी बराबरी से नहीं चोट पहुँचाते। विषैली हवा, बढ़ती गर्मी, जल-संकट और घरेलू धुएँ का सबसे भारी बोझ आज भी…
भारतीय मध्यवर्ग आज मिथ्या गौरव और भय के मिश्रण से गढ़े आंकड़ों के सहारे एक वैकल्पिक यथार्थ रच रहा है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अर्थशास्त्रियों को अविश्वसनीय ठहराकर वह ऐसी चमकीली तस्वीर चाहता है जिसमें तेज़ विकास, बढ़ता ख़तरा और एक…
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, साहित्य और सामाजिक सुधार के प्रमुख स्तंभ काका साहेब कालेकर न केवल गांधीजी के निकटतम सहयोगी थे, बल्कि भाषा, शिक्षा, नैतिकता और सामाजिक न्याय के प्रखर विचारक भी रहे। शिक्षक, साहित्यकार, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी के रूप…