स्मृति शेष : संज्ञा की बजाय क्रिया के अनुपम

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अनुपम मिश्र को शरीर छोड़े एक दशक हो रहा है, लेकिन पानी और पर्यावरण पर मंडराते संकटों में उनकी चेतावनी आज और तेज़ सुनाई देती है। उन्होंने बार-बार बताया कि जल की कमी प्रकृति की नहीं, समाज की असंवेदनशीलता की उपज है—और समाधान भी समाज के हाथ में ही है।


सुरेंद्र बांसल

अनुपम मिश्र की याद ऐसे आती है जैसे वे एक सजलनयन पानीदार समाज के बीच खड़े हों। जिनके हृदय सरोवर में जलतरंगों से उठकर जीवन जल सबकी आंखों में झलक रहा हो और चेताते हुए कह रहे हों कि जिस समाज की आंखों का पानी मर जाता है वह अपने आसपास भरे नदी-सरोवरों के जल को भी नहीं बचा पाएगा।

अनुपम मिश्र को शरीर छोड़े दस वर्ष हो चुके हैं. लेकिन लगता है वह अशरीरी होकर भी अपने को अधिक व्यापक रूप में अर्थवान कर रहे हैं। बाढ़-सुखाड़, पानी और पर्यावरण जब जीवन का संकट बनते जा रहे हैं तो समझिए अनुपम मिश्र इस संकट में हर क्षण समाधान बनकर सामने खड़े हैं।

देश भर में पानी की कमी का रोना रोने वालों को अनुपम जी ने बार – बार झूठा कर दिखाया। उन्होंने ऐसे सैकड़ों लोगों को पहचाना, जोउनकी तरह प्रकृति से कट कर विकास का कनस्तर कूटने वाले विकल्प तलाश रहे थे। बिना किसी नेतृत्व के अनुपम जी ने उन तमाम लोगों और संस्थाओं को अपने आत्मीय व्यवहार से संबल दिया, जो सरकारी नीतियों के जंजाल और ग़ैर सरकारी संस्थाओं के मकड़जाल में ख़ुद को पराया और खोया समझ रहे थे।

अनुपम जी ने जो भी किताबें लिखीं, चाहे वह ‘आज भी खरे हैं तालाब’ हो, ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ हो या फिर ‘ हमारा पर्यावरण’, किसी में भी ख़ुद को लेखक घोषित किया और न ही कॉपीराइट के जंजाल में उलझे। उनकी किताबों में उनका नाम ढूढ़ने के लिए मैग्नीफाइंग लेंस की ज़रुरत होती है। कई प्रकाशकों ने उनसे बिना पूछे यानी साधारण शिष्टाचार की परवाह किये बिना ही उनके जीते-जी उनकी किताबें छाप लाखों रुपये कमाए भी, लेकिन शिष्टाचारवश अनुपम जी तक पुस्तक की कम्लिमेंट्री प्रति तक नहीं पहुंचाई। ऐसे मित्र प्रकाशकों के यहां जाकर वे गपशप करते-करते अपनी किताब  की ही प्रति खरीद लाते।

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व्यक्तिगत प्रचार से कोसों दूर रहने वाले अनुपम जी न स्वयं किसी के बारे में लिखते थे, न ही ख़ुद के बारे में लिखवाना पसंद करते थे। अपने पिता विख्यात कवि भवानी प्रसाद मिश्र के बारे में भी उन्होंने मात्र एक आलेख के सिवाय कभी कुछ नहीं लिखा। अनेक पत्रकार अक्सर उनसे पानी, पर्यावरण पर बात करने जब आते तो पूरी विनम्रता के साथ वह उन्हें अन्य पर्यावरण के बुद्धिजीवियों के फोन नंबर तक देकर उनके पास भेज देते। अनुपम जी ने जो कुछ लिखा, जो भी बोला सब उनके व्यवहार और दैनिक जीवन का अभिन्न अंग था।

2006 में गांधी मार्ग का पुनः प्रकाशन शुरू हुआ तो उसमें भी उन्होंने अपना नाम संपादक की बजाय ‘ संपादन ‘ के नाते ही दिया. मित्रों ने जब उन्हें याद दिलाया कि पत्रिका में संपादक की जगह संपादन जा रहा है,तो अनुपम जी ने विनम्रता के साथ कहा कि “यह ग़लती नहीं है, मैं तो संपादन ही करता हूं.” और वे जीवनपर्यंत संज्ञा के बजाय क्रिया बन कर ही जिए।

सत्ता, संपत्ति और पद का रंचमात्र मोह उनके मन में नहीं था। अपनी कर्तव्य परायणता की अनेक उपलब्धियों पर उन्होंने कभी कोई हक़ नहीं जताया। जीवन भर मिले ढेरों सम्मानों, पुरस्कारों को भी वे किन्हीं अज्ञात दराज़ों में छिपाते रहे। उन्हें जीवन में जो मिला, उससे अनेक गुना अधिक वह लौटा कर गए। वह अपने हरेक साथी से कहते, ” भैया जी हमें आगे तो बढ़ना ही है, लेकिन किसी के पीछे हरग़िज़ नहीं चलना। ”

आदमकद कवि के आदमकद बेटे अनुपम मिश्र को कभी किसी ने किसी भी चीज़ के प्रति आग्रही होते नहीं देखा। वे अधिकार पाने के लिए मोर्चो, आंदोलनों से अलग रहते थे। सिर्फ कर्मयोगी बने रहने का  अधिकार ही जानते थे। मिलने आए प्रत्येक मित्र से वह सहज ही अपनी पुस्तक ’आज भी खरे हैं तालाब’ में लिखा संदेश कहते ” राजा जहां भी हो ,बस अच्छे-अच्छे काम करते जाना,काम तो करने से ही होगा, अधिकार मांगने से कुछ नहीं मिलने वाला। वे अक्सर यह भी कहते,” पानी या पर्यावरण को स्वच्छ सुंदर बनाने का काम तभी पूरा होगा, जब हम इसके बारे सुंदर संवाद, सुंदर भाषा का भी निर्माण करेंगे। यानी भक्ति भी हो तो सूरदास जैसी। जहां छोटे-बड़े या ग़रीब – अमीर का कोई भाव ही न हो -सबसे कृष्ण-सुदामा सा सखाभाव ।”

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अनुपम जी ने जीने के लिए प्रकृति सम्मत अपने मूल्य निर्मित किए, शायद इसीलिए वे  आजीवन अमूल्य बने रहे। उनमें किसी भी वस्तु, विषय को मूल्यवान बनाने का अद्भुत कौशल था। पानी के इस अद्भुत पुरोधा को पानी ने जैसे अपनी सारी अविरल ऊर्जा का वरदान ही दे दिया हो। वे पानी के बुद्धिजीवी, विशेषज्ञ नहीं बल्कि ‘ जल-पुरोधा ‘ बने। अपने परिवेश में निरंतर उपजते संकटों से डरती , सिकुड़ती और दिन ब दिन खुश्क होती दुनिया में  पूरी अविरलता और जीवन का सारस्वत स्रोत बन कर जिए। उनका मानना था कि भले दुनिया अपनी सुख-सुविधाओं के कितने भी ग़ैर -ज़रूरी या अप्राकृतिक साज़ो-सामान जुटा ले, लेकिन आख़िर में जीतेगी प्रकृति ही। उनका दृढ़ विश्वास था कि दुनिया को कुछ विशेष होने के भ्र्म से साधारण की ओर लौटना ही होगा।

अनुपम जी  जीवन पर्यन्त हरबोलों की तरह तालाबों का यशोगान करते हुए कहते रहे ,” जो समाज को जीवन दे, उसे निर्जीव कैसे माना जा सकता है? तालाबों में, जलस्रोत में जीवन माना गया और समाज ने उनके चारों ओर अपने जीवन को रचा। जिसके साथ जितना निकट का संबंध, जितना स्नेह, मन उसके उतने ही नाम रख लेता है। देश के अलग-अलग राज्यों में, भाषाओं में, बोलियों में तालाब के कई नाम हैं। बोलियों के कोष में, ग्रंथों में पर्यायवाची शब्दों की सूची में तालाब के नामों का एक भरा-पूरा परिवार देखने को मिलता है। ग्रंथ हमीर नाम-माला तालाब के पर्यायवाची नाम तो गिनाता ही है, साथ ही उनके स्वभाव का भी वर्णन करते हुए तालाबों को ‘धरम सुभाव’ कहता है।

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अनुपम जी ने अपनी कैंसर व्याधि को सहज भाव से झेला, दीन नहीं बने। अंतिम समय में भी वे कहते रहे कि ,” मैंने तो समाज की कलर्की मात्र की है , इसमें मेरा क्या ”. विदाई से कुछ दिन पूर्व बिमारी की असहनीय पीड़ा झेलते हुए कहा था ,” अगर इस अंधी  सुरंग के छोर पर कहीं कोई रोशनी की किरण देती है तो ठीक , वरना क्यों न इस यात्रा को विराम दिया जाये। ” अथाह पीड़ा के बीच ऐसी सहजता से कहना भी संभव हुआ सही-सही जीने से। भवानी भाई की लिखी इन पंक्तियों से शायद जिसे कुछ अधिक समझा जा सकता है–” जीता रहूं जब तक/पीता रहूं तब तक/नाम रूप रस गंध/विलास को सोचे बिना/छूटने लगे जब सांस/ऐसा न लगे/हाय जीवन जा रहा है छीना/ जीवन का सबसे बड़ा सुख लगे/जीवन को छोड़ना।”

मन से बेहद सुरुचि संपन्न , वृत्ति से संन्यासी, शिल्पी की निष्ठा वाले अनुपम जी के देहावसान का समाचार सुन उनसे जुड़े देश- विदेश के साथियों को मानो यों लगा था, जैसे अनुपम जी ने जीवन में पहली बार कोई मनमानी की हो।

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