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आँकड़ों की चमक के पीछे छिपी सच्चाई : क्या हम सच से मुँह मोड़ रहे हैं?

आँकड़ों की चमक के पीछे छिपी सच्चाई : क्या हम सच से मुँह मोड़ रहे हैं?

भारतीय मध्यवर्ग आज मिथ्या गौरव और भय के मिश्रण से गढ़े आंकड़ों के सहारे एक वैकल्पिक यथार्थ रच रहा है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अर्थशास्त्रियों को अविश्वसनीय ठहराकर वह ऐसी चमकीली तस्वीर चाहता है जिसमें तेज़ विकास, बढ़ता ख़तरा और एक...

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भारतीय मध्यवर्ग आज मिथ्या गौरव और भय के मिश्रण से गढ़े आंकड़ों के सहारे एक वैकल्पिक यथार्थ रच रहा है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अर्थशास्त्रियों को अविश्वसनीय ठहराकर वह ऐसी चमकीली तस्वीर चाहता है जिसमें तेज़ विकास, बढ़ता ख़तरा और एक महिमामंडित राष्ट्र—सभी साथ-साथ दिखाई दें। इसी प्रवृत्ति में सरकारी आँकड़ों की साख पर गहरे सवाल खड़े हो रहे हैं।


असत्य और हिंसा को गले लगा चुका भारतीय मध्यवर्ग महज उपभोक्तावादी वस्तुओं का ही भूखा नहीं है। उसे प्राचीन भारत के गौरव-बोध के साथ ही चाहिए ऐसे आंकड़े जिससे हर क्षेत्र में भारत की तूती बोलती नजर आए। वह आंकड़ों का मायाजाल इस प्रकार रचना चाहता है जिससे एक ओर अल्पसंख्यकों की आबादी हिंदुओं के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ती दिखे तो दूसरी और घुसपैठियों से देश की सुरक्षा खतरे में दिखे। मध्ययुगीन भारत में हिंदुओं के उत्पीड़न की कहानी रचते हुए वह आधुनिक युग में हिंदू आबादी को खतरे में डालकर यह भी दिखाना चाहता है कि अघोषित रूप से हिंदू राष्ट्र हो चुका भारत आर्थिक क्षेत्र में तीव्र गति से तरक्की कर रहा है। इसीलिए वह न तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़ों में यकीन करता है और न ही अपने ही देश के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के आंकड़ों पर।

पिछली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की तरक्की की 8.2 प्रतिशत की दर ने दुनिया ही नहीं देश के अर्थशास्त्रियों को हैरत में डाल दिया है। हैरानी की बात यह है कि भारतीय सांख्यिकी कार्यालय ने यह आंकड़े तब जारी किए जब कुछ ही दिनों पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने भारतीय आंकड़ों की गुणवत्ता को ‘सी’ ग्रेड दे दिया था। इससे पहले कि भारतीय अर्थशास्त्री देश की अर्थव्यवस्था का सही आकलन करे सरकार ने आईएमएफ के जवाब में तोप का गोल दाग दिया। आईएमएफ ने कुल मिलाकर यही कहा था कि भारत सरकार के आंकड़े अनिश्चित और अविश्वसनीय हैं इसलिए उन्हें सावधानी से विश्लेषित करने की जरूरत है। यह बात भारतीय अर्थशास्त्री लंबे समय से कह रहे थे कि असंगठित क्षेत्र के आंकड़े सटीक नहीं हैं और न ही वस्तुनिष्ठ तरीके से जुटाए गए हैं। इसलिए उन पर संगठित क्षेत्र के आंकड़ों को आरोपित करके की जाने वाली जीडीपी की गणना दोषपूर्ण है।

लेकिन मौजूदा सरकार को जिस तरह से चुनावों में धड़ाधड़ विजय हासिल करने की पड़ी रहती है वैसे ही उसे अपनी अर्थव्यवस्था को तीव्र गति से बढ़ती हुई भी दिखाने की लगी रहती है। यह ‘मागा’ यानी अमेरिका को फिर से महान बनाने के साथ ‘मीगा’ यानी भारत को फिर से महान बनाने के नारे की जुगलबंदी है। हमेशा जीतते रहने और महान बनने का नशा ऐसा होता है कि उसमें सत्य और असत्य, हिंसा और अहिंसा, न्याय और अन्याय का ध्यान ही नहीं रखा जाता। उसमें सिर्फ ध्वजारोहण का एक सतत कार्यक्रम चलता रहता है। चाहे वह धर्मध्वजा का रोहण हो या फिर राजनीतिक और आर्थिक पताका का फहराया जाना हो।

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भारत सरकार के विकास के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार का तो कहना है कि सकल घरेलू उत्पाद में जो वास्तविक वृद्धि की जो दर है वह सरकारी दावे की 48 प्रतिशत है। यानी वास्तविक विकास दर 8.2 प्रतिशत नहीं बल्कि 3.5 प्रतिशत और चार प्रतिशत के बीच है। वे तो यह भी कहते हैं कि भारत के चौथी अर्थव्यवस्था बन जाने का दावा भी खोखला है। हमारी अर्थव्यवस्था का वास्तविक आकार 3.8 खरब डॉलर नहीं बल्कि 2.5 खरब डॉलर के आसपास है। एक अन्य अर्थशास्त्री प्रणव सेन का कहना है कि हमारे पास तिमाही के प्रामाणिक आंकड़े नहीं हैं। क्योंकि ज्यादातर वस्तुओं के उत्पादन और बिक्री का सटीक ज्ञान नहीं है। इसलिए हम असंगठित क्षेत्र को बढ़ाचढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं। यही वजह है कि वृद्धि दर दो गुनी दिखाई पड़ती है। वे कहते हैं कि हमने यह वादा किया था कि हर पांच साल पर मूल्य सूचकांक को संशोधित करेंगे। लेकिन वैसा नहीं कर रहे हैं। इसके अलावा यह कैसे हो सकता है कि नोमिनल जीडीपी 8.7 प्रतिशत है और मुद्रास्फीति 0.5 प्रतिशत।

वास्तव में मौजूदा सरकार एक तरफ अपने को पहले की यूपीए सरकार से श्रेष्ठ दिखाने के लिए यह साबित करने पर तुली रहती है कि एनडीए के कार्यकाल में यूपीए के कार्यकाल से अधिक तेजी से तरक्की हो रही है। दूसरी ओर वह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की नजर में अपने को श्रेष्ठ दर्शाने के लिए तमाम आंकड़ों को अतिरेकपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करती रहती है। हालांकि यूपीए के कार्यकाल में भी गरीबी मापने के लिए जो आंकड़े पेश किए जाते थे उस पर निरंतर सवाल उठते थे। सरकार उन सवालों का जवाब भी देती थी। लेकिन अच्छी बात है कि वे सवाल सरकार की ओर से नियुक्त की गई कमेटियां उठाती थीं और इसीलिए उन पर सरकारी दायरे में भी चर्चा होती थी। इसी के साथ यह तथ्य भी गौरतलब है कि डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल में दो समितियां बनी थीं। एक थी इकॉनमिक एडवाइजरी कमेटी तो दूसरी थी पोलिटिकल एडवाइजरी कमेटी। आर्थिक सलाहकार समिति प्रधानमंत्री को सलाह देती थी और राजनीतिक सलाहकार समिति यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी को सलाह देती थी। राजनीतिक सलाहकार समिति अक्सर आर्थिक सलाहकार समिति से टकराव की स्थिति में रहती थी। इससे एक तरफ सही तथ्य बाहर आते थे तो दूसरी ओर जनता का कल्याण भी होता था।

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असंगठित क्षेत्र पर काम करने वाली अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी ने तो यहां तक कह दिया था कि भारत में 80 प्रतिशत लोगों की रोजाना की आय 20 रुपए है। इसी तरह से तेंदुलकर कमेटी ने गरीबी मापने का जो पैमाना तय किया था उस पर भी गंभीर चर्चाएं होती थीं। आजकल सरकार जो आंकड़े पेश कर देती है उसी पर लोगों को यकीन हो जाता है। मीडिया बिना की सवाल उठाए उसे जनता के समक्ष परोसता रहता है।

जबकि मौजूदा सरकार के पास न तो ऐसी कोई मर्यादा है और न ही लोकलाज। उसके मातहत काम करने वाली संस्थाएं वास्तव में संघ परिवार के प्रचार की संस्थाएं बन कर रह गई हैं। वे कभी इतिहास के तथ्यों को मनमाने ढंग से उलटती हैं तो कभी समाजशास्त्र के। कभी राजनीति शास्त्र तो कभी अर्थशास्त्र के। इस सरकार ने 2014 में सत्ताग्रहण करते ही 2011-12 के विकास संबंधी आंकड़ों में संशोधन करना शुरू किया। उसका उद्देश्य यह साबित करना था कि एनडीए के कार्यकाल में यूपीए के कार्यकाल के मुकाबले ज्यादा तेजी से विकास हो रहा है। अर्थशास्त्री इन आंकड़ों को मानने को तैयार नहीं थे। सरकार ने यह काम नीति आयोग को सौंप दिया की वह गणना करके बताया कि सही स्थिति क्या है। नीति आयोग जो योजना आयोग को भंग करके बना था उसे अपने प्रचार के काम में लाया जाने लगा और उसने कह दिया कि एनडीए के कार्यकाल की वृद्धि दर यूपीए के कार्यकाल के मुकाबले तीव्र थी। जबकि इस तरह की गणना के लिए नीति आयोग न तो सक्षम है और न ही अधिकृत। स्वयं तत्कालीन सरकार के आर्थिक सलाहकार के सुब्रहमण्यम का कहना था कि इन आंकड़ों को 2.5 प्रतिशत बढ़ाकर दर्शाया गया है।

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दरअसल मौजूदा सरकार की सारी कोशिश अपने उस पाप को ढकने की रही है जो उसने अर्थव्यवस्था के साथ किया है। उन पापों में नोटबंदी और जीएसटी के साथ कोविड-19 के दौरान उठाए गए गलत कदम शामिल हैं। सरकार को अगर किसी प्रकार का अपराधबोध है तो वह उसके नाते अतिश्योक्तिपूर्ण आंकड़ों से उसे ढकती रहती है। या फिर वह यह दिखाना चाहती है कि उसके वे कदम सही थे जिसने असंगठित क्षेत्र और मझोले और लघु स्तर के उद्योगों को तबाह किया और भारी संख्या में लोगों को बेरोजगार किया। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कृषि के अलावा असंगठित क्षेत्र का आकार भारतीय अर्थव्यवस्था का 30 प्रतिशत है। उसकी स्थिति तब से खराब है जबसे सरकार ने नोटबंदी की। वह लगातार पतन की ओर अग्रसर है। लेकिन सरकारी आंकड़ों में वह संगठित क्षेत्र की तरह ही तरक्की कर रहा है। जब नोटबंदी के कारण 2016 में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में दो प्रतिशत की कमी आई तब भी सरकार ने उसे 8 प्रतिशत की दर से बढ़ता हुआ दिखा दिया।

विडंबना देखिए कि पांच किलो राशन पर जिंदा रहने वाले आम आदमी को इस पर सवाल करने की फुर्सत नहीं है और असत्य के फास्टफूड पर पलने वाले मध्यवर्ग के पास इन आंकड़ों की भारी भूख है। इसलिए वह वैसे ही अर्थव्यवस्था के साथ भी खेलना चाहता है जैसे कि इतिहास और धर्म के साथ खेल रहा है। उदारीकरण के आरंभ में यह कहा जाता था कि अर्थव्यवस्था इतनी महत्त्वपूर्ण चीज है कि उसे महज राजनेताओं के हाथ में नहीं छोड़ा जा सकता। तब तमाम लोकतांत्रिक और समाजवादी सोच के लोग इस कथन का विरोध करते थे। कभी डॉ लोहिया नेहरू सरकार के आंकड़ों को चुनौती देते थे और उस पर लोकसभा में बहसें होती थीं। लेकिन क्या आज इस अर्थव्यवस्था को राजनेताओं के हवाले छोड़ा जा सकता है? या फिर आर्थिक प्रोपेगंडा से अपने को दूर रखने वाले अर्थशास्त्री कितने बचे हैं जिनके हाथों में इस अर्थव्यवस्था को छोड़ा जाए?

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