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बजट 2026-27 : आम आदमी की आकांक्षाओं पर कितना खरा है बजट?

बजट 2026-27 : आम आदमी की आकांक्षाओं पर कितना खरा है बजट?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026-27 को सरकार ‘विकसित भारत’ की दिशा में दीर्घकालिक सोच का दस्तावेज़ बता रही है, जबकि विपक्ष ने इसे दिशाहीन करार दिया है। लगातार नौवीं बार बजट पेश कर इतिहास रचने वाली...

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026-27 को सरकार ‘विकसित भारत’ की दिशा में दीर्घकालिक सोच का दस्तावेज़ बता रही है, जबकि विपक्ष ने इसे दिशाहीन करार दिया है। लगातार नौवीं बार बजट पेश कर इतिहास रचने वाली सीतारमण के इस बजट में विकास, निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज़ोर दिखता है, लेकिन महंगाई, किसान और आम आदमी की तात्कालिक चिंताओं पर सीधी राहत सीमित नज़र आती है।


बजट विश्लेषण

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026-27 को एक ओर जहां सरकार के घटक दलों द्वारा विकसित भारत का बजट और बदलते भारत की राजनीतिक-आर्थिक प्राथमिकताओं तथा सरकार की दीर्घकालिक सोच का आईना बताया गया है, वहीं विपक्ष द्वारा इसे पूरी तरह दिशाहीन बजट करार दिया गया है। वैसे निर्मला सीतारमण ने लगातार नौवीं बार बजट पेश कर संसदीय इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।

सवाल यह नहीं है कि बजट कितना बड़ा है या कितने नए आंकड़े पेश किए गए हैं बल्कि यह है कि क्या यह बजट महंगाई से जूझ रहे आम नागरिक के वर्तमान को कुछ राहत देता है और भविष्य के लिए भरोसेमंद आधार तैयार करता है? बजट के तमाम महत्वपूर्ण प्रावधानों का आकलन किया जाए तो यह बजट विकास, निवेश, बुनियादी ढ़ांचे, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भर भारत की स्पष्ट झलक तो दिखाता है लेकिन इसके साथ ही इसमें कई ऐसे खाली स्थान भी हैं, जो आम आदमी और विशेषकर किसान, निम्न आय वर्ग और असंगठित क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए निराशा पैदा करते हैं। सरकार ने इस बार तात्कालिक लोकलुभावन उपायों से दूरी बनाते हुए दीर्घकालिक क्षमता निर्माण पर जोर दिया है। यह दृष्टिकोण आर्थिक रूप से समझदारी भरा हो सकता है लेकिन लोकतंत्र में बजट का मूल्यांकन केवल भविष्य के सपनों से नहीं, वर्तमान की चुनौतियों से भी होता है।

शिक्षा और रोजगार को जोड़ने वाला ‘एजुकेशन-टू-एम्प्लॉयमेंट’ मॉडल सरकार की उस सोच को सामने लाता है, जो कक्षा और कार्यस्थल के बीच की खाई को पाटने का दावा करती है। पहली नौकरी पाने वाले युवाओं के लिए 15,000 रुपये का डीबीटी बोनस और एक करोड़ इंटर्नशिप की घोषणा निश्चित रूप से आकर्षक लगती है। यह कदम युवाओं को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने और उन्हें सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने की दिशा में सकारात्मक है। लेकिन यहां भी सबसे बड़ा प्रश्न क्रियान्वयन का है। क्या ये इंटर्नशिप वास्तविक कौशल और स्थायी रोजगार की ओर ले जाएंगी या फिर यह योजना सस्ते श्रम तक सीमित रह जाएगी? भारत पहले भी कई बार योजनाओं के आकर्षक नाम और बड़े लक्ष्यों के बावजूद जमीनी स्तर पर कमजोर क्रियान्वयन का अनुभव कर चुका है।

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‘स्किल इंडिया 2.0’ के तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और मशीन लर्निंग जैसी उभरती तकनीकों को क्षेत्रीय भाषाओं में सिखाने की योजना डिजिटल डिवाइड को कम करने की दिशा में अहम कदम है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी युवाओं के लिए यह तकनीकी दुनिया में प्रवेश का द्वार खोल सकता है लेकिन प्रशिक्षकों की गुणवत्ता, पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता और उद्योग-सहयोग के बिना यह पहल भी सीमित असर तक सिमट सकती है। शिक्षा बजट को लगभग 1.35 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाने का प्रस्ताव सराहनीय है लेकिन बढ़ती छात्र संख्या, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और शोध की जरूरतों के सामने यह राशि अपर्याप्त प्रतीत होती है। मध्यम वर्ग के लिए यह बजट राहत और मायूसी का मिश्रण है। आयकर दरों में तो कोई बदलाव नहीं हुआ है लेकिन आयकर प्रणाली को सरल बनाने की दिशा में घोषणा अवश्य की गई है। सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है, कर व्यवस्था को जटिल छूटों के जाल से निकालकर सरल और पारदर्शी बनाना, ताकि उपभोग बढ़े और अर्थव्यवस्था में मांग का संचार हो। यह दृष्टिकोण आर्थिक सुस्ती के दौर में उपयोगी हो सकता है।

सरकार ने कुछ चुनिंदा वस्तुओं और क्षेत्रों में कर कटौती कर राहत देने की कोशिश की है। कैंसर और मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं का सस्ता होना निसंदेह करोड़ों परिवारों के लिए जीवनरक्षक कदम है। मोबाइल फोन, ईवी बैटरी और सौर पैनलों पर रियायतें हरित ऊर्जा और डिजिटल इंडिया को गति देने के साथ-साथ तकनीक को आम आदमी की पहुंच में लाने का प्रयास हैं। जूते, कपड़े और कुछ घरेलू उपकरणों के सस्ते होने से मध्यमवर्गीय खपत में हल्की तेजी आ सकती है लेकिन दूसरी ओर शराब, खनिज और स्क्रैप पर बढ़े शुल्क से उत्पादन लागत बढ़ने और अंततः उपभोक्ता कीमतों पर असर पड़ने की आशंका भी बनी हुई है।

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सबसे बड़ा झटका शेयर बाजार में देखने को मिला। फ्यूचर एंड ऑप्शन ट्रेडिंग पर बढ़े टैक्स ने खुदरा निवेशकों की धारणा को कमजोर किया और बजट के दौरान बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई। इससे यह संदेश गया कि सरकार सट्टात्मक गतिविधियों पर सख्ती चाहती है लेकिन इसके दुष्परिणाम अल्पकाल में निवेशकों और बाजार की स्थिरता पर पड़े। यह बजट महंगाई और निवेश के मोर्चे पर एक तरह का विरोधाभास प्रस्तुत करता है, एक ओर खपत बढ़ाने की कोशिश, दूसरी ओर निवेश भावना को झटका।

इंफ्रास्ट्रक्चर पर ₹12.2 लाख करोड़ का पूंजीगत व्यय सरकार की विकास रणनीति का सबसे मजबूत स्तंभ है। सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, जिनमें मुंबई-पुणे और दिल्ली-वाराणसी जैसे मार्ग शामिल हैं, भारत की कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय विकास की तस्वीर बदल सकते हैं। बेहतर परिवहन से उद्योग, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन और रियल एस्टेट को नई गति मिल सकती है। टियर-2 और टियर-3 शहरों पर फोकस शहरीकरण के असंतुलन को सुधारने की दिशा में सही कदम है। हालांकि, बुनियादी ढ़ांचे पर खर्च का लाभ आम आदमी तक पहुंचने में समय लगता है और तात्कालिक रूप से निर्माण सामग्री की कीमतों में बढ़ोतरी महंगाई का दबाव बढ़ा सकती है।

एमएसएमई और व्यापार जगत के लिए बजट में नई संजीवनी दिखाई देती है। 10,000 करोड़ रुपये का एसएमई ग्रोथ फंड छोटे उद्यमों को पूंजी की कमी से उबार सकता है। महिलाओं के लिए मुद्रा लोन की सीमा बढ़ाकर 20 लाख रुपये करना महिला उद्यमिता को वास्तविक आर्थिक ताकत देने की दिशा में अहम कदम है। टेक्निकल टेक्सटाइल पर विशेष फोकस भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थान दिला सकता है और ‘मेक इन इंडिया’ को व्यावहारिक आधार दे सकता है।

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डिजिटल अर्थव्यवस्था के संदर्भ में यह बजट ऐतिहासिक कहा जा सकता है क्योंकि पहली बार कंटेंट क्रिएटर्स और क्रिएटिव इकोनॉमी को औपचारिक मान्यता दी गई है। ‘रील’ और ‘रियल’ इकोनॉमी के बीच की दीवार लगभग गिर चुकी है। डिजिटल कंटेंट, गेमिंग, एनीमेशन और एजुकेशनल प्लेटफॉर्म को एमएसएमई जैसा दर्जा मिलने से युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर खुल सकते हैं। हालांकि बौद्धिक संपदा संरक्षण, आय की स्थिरता और नियमन जैसे सवाल भविष्य की बड़ी चुनौतियां बने रहेंगे। स्वास्थ्य और तकनीक के मोर्चे पर ‘बायो-फार्मा 2.0’ और सेमीकंडक्टर मिशन पर जोर भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच को दर्शाता है। दवा परीक्षण और अनुसंधान के लिए 1,000 टेस्टिंग साइट्स का नेटवर्क दवाओं की लागत कम कर सकता है। सेमीकंडक्टर निर्माण में आत्मनिर्भरता भारत को वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत बनाएगी। रक्षा बजट में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है लेकिन नई नीतिगत घोषणाओं के अभाव में बाजार की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकी।

इस पूरे बजट की सबसे बड़ी कमी किसानों को लेकर किसी ठोस और नई घोषणा का न होना है। कृषि क्षेत्र अभी भी महंगाई, लागत और आय की अनिश्चितता से जूझ रहा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किए बिना समग्र विकास अधूरा रहेगा, यह सच्चाई इस बजट में अपेक्षाकृत कम झलकती है।

कुल मिलाकर, बजट 2026-27 संतुलित प्रयास माना जा सकता है। यह न तो लोकलुभावन है और न ही कठोर सुधारवादी। सरकार ने भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए दिशा स्पष्ट की है लेकिन महंगाई, रोजमर्रा का खर्च और आय की सुरक्षा जैसी आम आदमी की तात्कालिक चिंताओं पर सीधी राहत सीमित है। यह बजट आम नागरिक को तुरंत सुकून देने के बजाय धैर्य रखने की सलाह देता है। आने वाले समय में इसका मूल्यांकन इस बात से होगा कि इसके वादे कितनी पारदर्शिता और गुणवत्ता के साथ जमीन पर उतरते हैं। अब असली परीक्षा बजट भाषण की नहीं बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है।

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