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जलवायु-परिवर्तन से जीत सकती हैं, महिलाएं

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प्राकृतिक आपदाओं के अनुभव बताते हैं कि यदि दुनिया की आधी, महिलाओं की आबादी को अवसर मुहैय्या करवाए जाएं तो जलवायु-परिवर्तन से निपटा जा सकता है। यदि उन्हें शिक्षा, शारीरिक सक्षमता और व्यवहारिक ज्ञान प्राप्‍त करने का मौका मिले तो वे प्राकृतिक आपदाओं का मजबूती से सामना कर सकती हैं और दूसरे अपने दैनिक, स्थानीय ज्ञान से जलवायु-परिवर्तन को बरका सकती हैं। क्या हैं, पर्यावरण को बचाए रखने की महिलाओं की खासियतें?


‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’  : 8 मार्च

अपूर्वा श्रीवास्तव

महिलाओं के लिए ऐसा वातावरण बनाया जाए कि वे सुरक्षित रह सकें – यह वाक्य हम अक्सर सुनते हैं, लेकिन आए दिन ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं जो महिलाओं को असुरक्षित महसूस कराने के लिए पर्याप्त हैं। ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ (एनसीआरबी) के आँकड़े भी महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा की ओर संकेत करते हैं। जब हम महिलाओं की सुरक्षा की बात करते हैं तो यह केवल सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि उस व्यापक वातावरण से भी जुड़ जाता है जिसमें हम सभी रहते हैं।

वातावरण हमारे चारों ओर का वह परिवेश है जिसमें सभी जैविक और अजैविक तत्व शामिल हैं। यह वही बाहरी घेरा है जो हमारे जीवन, व्यवहार और विकास को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है, जिसे अक्सर पर्यावरण भी कहा जाता है। आज यह वातावरण संतुलित नहीं रह गया है। तापमान बढ़ रहा है और जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हो रही है। इसका खामियाजा भी भेदभाव से भरा हुआ है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन जेंडर-न्यूट्रल नहीं है। यानी इसके नकारात्मक प्रभाव महिलाओं पर सबसे अधिक पड़ते हैं। कई मायनों में जलवायु परिवर्तन मानवीय अधिकारों को भी पीछे धकेल देता है।

जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो महिलाओं के खिलाफ अत्याचार नाटकीय रूप से बढ़ जाते हैं। उदाहरण के लिए बाढ़ में महिलाओं की मृत्यु अधिक होती है क्योंकि उन्हें जिन्दा रहने के कौशलों की ट्रेनिंग नहीं दी जाती। ग्रामीण परिवेश में महिलाओं को खेल-कूद से दूर रखा जाता है। महिलाओं के खानपान का कम ख्याल रखा जाता है जिसके चलते भोजन में जरूरी पोषक तत्वों की कमी हमेशा होती है। परिवारों में वे आखिर में खाना खाती हैं। इस तरह की सामाजिक संरचनाएँ संकट के समय में उनकी स्थिति को और कमजोर बना देती हैं। स्पष्ट है, जलवायु परिवर्तन की मार महिलाओं पर अधिक पड़ रही है।

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गर्मी, सूखा, तूफान और बाढ़ जैसी आपदाओं की वजह से महिलाओं को ज्यादा मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं। 1991 में बांग्लादेश में आए चक्रवाती तूफान में मरने वालों में लगभग 91 प्रतिशत महिलाएँ थीं। इसका एक कारण यह भी था कि उनमें से बहुत सी महिलाएँ तैरना नहीं जानती थीं। तैरना इसलिए नहीं जानती थीं, क्योंकि वे घर के भीतर ही रहती थीं और अकेले बाहर जाने की अनुमति नहीं होती थी। इसी तरह 2003 में यूरोप में जब भीषण हीट-वेव आई, मरने वालों में महिलाओं की संख्या सबसे अधिक थी। महिलाओं की मृत्यु-दर पुरुषों की तुलना में डीहाइड्रेशन और हृदय संबंधी समस्याओं के कारण लगभग 15-20% अधिक थी। 

जलवायु परिवर्तन के कारण महिलाओं पर हिंसा भी बढ़ती है। कई द्वीपीय देशों में चक्रवाती तूफानों के बाद घरेलू हिंसा के मामलों में वृद्धि देखी गई है। कई स्थानों पर अस्थायी राहत शिविरों में भी महिलाओं को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों में मौसम के चलते फसल खराब होने के बाद परिवारों द्वारा लड़कियों को बेचकर मवेशी खरीदने जैसी घटनाएँ भी सामने आई हैं। दक्षिण केन्या में ‘फिश फॉर सेक्स’ जैसी प्रथा का उल्लेख मिलता है, जहाँ मछली के बदले लड़कियों का शारीरिक शोषण किया जाता है।

एक स्वीडिश अध्ययन के अनुसार पुरुष औसतन केवल दो प्रतिशत अधिक खर्च करते हैं, लेकिन कार्बन उत्सर्जन के लिए वे लगभग 16 प्रतिशत अधिक जिम्मेदार होते हैं। इसका कारण यह है कि पुरुष अधिक बाहर निकलते हैं और पेट्रोल-डीजल का अधिक उपयोग करते हैं, जिससे ‘ग्रीनहाउस गैसों’ का उत्सर्जन बढ़ता है। जलवायु परिवर्तन के चलते और गहरी होती लैंगिक असमानता को समझना जरूरी है।

उड़ीसा में आए एक साइक्लोन की केस-स्टडी में सामने आया कि प्राकृतिक आपदा के बाद आर्थिक संकट के कारण एक परिवार ने अपनी बेटी को नौकरी के लिए बाहर भेज दिया, लेकिन बाद में पता चला कि उसे बांग्लादेश में बेच दिया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि साइक्लोन के कारण उनकी कृषि भूमि लगभग 10 साल के लिए उपज के लायक नहीं बची थी। वहीं महाराष्ट्र में ‘वॉटर वाइफ’ यानी ‘पानी-बाई’ देखने मिलतीं हैं, जिसमें पानी भरने के लिए पुरुष कई महिलाओं से विवाह करते हैं। यह जलवायु संकट से जुड़ा एक सामाजिक और लैंगिक अन्याय है।

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ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर पुरुष रोजगार के लिए शहरों की ओर चले जाते हैं। ऐसे में परिवार, खेती और बुजुर्गों की जिम्मेदारी महिलाओं पर आ जाती है। इसलिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि उन्हें जलवायु परिवर्तन से बचाने के उपाय किए जाएँ। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि लगभग 33 प्रतिशत महिलाएँ कृषि कार्य से जुड़ी हुई हैं, लेकिन उनमें से केवल 15 प्रतिशत के पास ही जमीन का मालिकाना अधिकार है।

‘इकोफेमिनिज्म’ पुस्तक की लेखक, पर्यावरणविद् वंदना शिवा ने जलवायु परिवर्तन पर विस्तार से लिखा है। उनका कहना है कि ‘ग्लोबल साउथ’ की महिलाएँ केवल पर्यावरण विनाश से पीड़ित नहीं हैं, बल्कि वे पर्यावरण की अग्रिम पंक्ति की रक्षक भी हैं। वंदना शिवा कहती हैं कि जिसे हम आधुनिक विज्ञान कहते हैं, वह इतिहास के एक छोटे से दौर में विकसित हुआ एक संकीर्ण पितृसत्तात्मक प्रोजेक्ट है। आधुनिक विज्ञान की यह धारा प्रकृति को एक यांत्रिक और शोषण योग्य वस्तु के रूप में देखती है। औद्योगिक क्रांति के समय ऐसी ज्ञान-प्रणाली विकसित हुई जिसने प्रकृति के दोहन को बढ़ावा दिया। इसके विपरीत संरक्षण, पुनर्जीवन और संतुलन से जुड़ा ज्ञान, जो अक्सर महिलाओं, किसानों, आदिवासियों और स्थानीय समुदायों के पास था, उसे हाशिए पर डाल दिया गया।

समस्याओं से बचने का सबसे महत्वपूर्ण उपाय शिक्षा है, लेकिन यहाँ केवल सामान्य या जेनेरिक शिक्षा की बात नहीं हो रही, बल्कि ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो जलवायु से जुड़ी हो। लोगों को अपने स्थानीय जलवायु, भूगोल और पर्यावरण की समझ होना बेहद जरूरी है। जब व्यक्ति अपने आसपास के पर्यावरण को समझेगा, तभी वह उसके संरक्षण के लिए जिम्मेदार व्यवहार भी अपनाएगा। जलवायु आधारित शिक्षा केवल किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि समाज के हर तबके और हर उम्र के लोगों के लिए आवश्यक है।

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जलवायु परिवर्तन की समस्या को कम करने के लिए बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। इसे केवल चर्चा का विषय बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे प्राथमिकता के साथ लागू करने की जरूरत है। इसके साथ ही लोगों के व्यवहार में भी आमूलचूल बदलाव लाना जरूरी है। संसाधनों का समझदारी से उपयोग करना, ऊर्जा की बचत करना और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार रवैया अपनाना एक जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी होनी चाहिए। ऐसा करने से न केवल वर्तमान समाज को लाभ होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी सुरक्षित भविष्य मिल सकेगा। महिलाओं की बुनियादी शिक्षा, उनके खान-पान और खेलकूद पर पर्याप्त ध्यान दिया जाए तो वे शारीरिक रूप से मजबूत बन पातीं हैं।महिलाएँ शिक्षित और जागरूक होंगी, तो वे प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को बेहतर ढंग से समझ पाएंगी। वे जनसंख्या वृद्धि, स्वास्थ्य संबंधी निर्णयों और घरेलू निर्णय-प्रक्रिया में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकेंगी। इसके साथ ही वे उपभोग के पैटर्न में भी सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं। खाद्य, ऊर्जा और अन्य संसाधनों के उपयोग के संबंध में वे अधिक समझदारी और संतुलन के साथ निर्णय लेने में सक्षम होंगी।

महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण न केवल समाज में लैंगिक समानता को बढ़ावा देगा, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। मेलिंडा गेट्स ने अपनी किताब ‘द मूमेंट यू लिफ्ट – हाउ एंपावरिंग वुमेन चेंज द वर्ल्ड’ में कहा है, ‘जब आप एक महिला को ऊपर उठाते हैं तो पूरी मानवता ऊपर उठती है।’ (सप्रेस)

अपूर्वा श्रीवास्तव सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हिमाचल प्रदेश के न्यू मीडिया विभाग में क्लाइमेट चेंज और मीडिया विषय पर शोधार्थी है।

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