औद्योगिक ज़हर से जलवायु ज़हर तक : महिलाओं की सुरक्षा अब भी नीतियों के हाशिये पर

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2 दिसंबर सिर्फ एक स्मृति-दिवस नहीं, उस सच का आईना है जिसे भोपाल गैस त्रासदी ने उजागर किया था—पर्यावरणीय संकट कभी बराबरी से नहीं चोट पहुँचाते। विषैली हवा, बढ़ती गर्मी, जल-संकट और घरेलू धुएँ का सबसे भारी बोझ आज भी महिलाओं पर ही पड़ता है। चार दशक बाद भी नीतियों में उनकी आवाज़ सबसे कमजोर, लेकिन जोखिम सबसे गहरा है।


2-3 दिसंबर : भोपाल गैस त्रासदी पर विशेष

सत्‍यप्रकाश नायक

2 दिसंबर राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस सिर्फ कैलेंडर की एक तिथि नहीं है। यह उस रात की स्मृति है जिसने देश को झिंझोड़ दिया था। देश ने 1984 की भोपाल गैस त्रासदी से बहुत कुछ सीखा, लेकिन एक सीख आज भी अधूरी है पर्यावरणीय संकटों की मार सबसे गहराई से महिलाओं पर पड़ती है, जिनकी आवाज़ नीतियों में सबसे कमजोर होती है। उस भयावह रात के बाद दशकों तक चली श्वसन बीमारियाँ, गर्भ संबंधी जटिलताएँ और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़े असर यह साफ बताते हैं कि जब भी कोई प्रदूषण या औद्योगिक संकट आता है, घर और समाज दोनों की पहली पंक्ति में खड़ी महिलाएँ ही उसकी सबसे बड़ी शिकार होती हैं। आज राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस पर यह विरोधाभास पहले से ज्यादा तीखा नज़र आता है।

चार दशक बीत चुके हैं, लेकिन व्यवस्था की संरचना अब भी नहीं बदली। वायु-प्रदूषण की बढ़ती तीव्रता, गर्मी की नई लहरें, जल संकट और घरों में ठोस ईंधन का धुआँ—इन सभी का बोझ एक बार फिर उसी वर्ग पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है, जो नीति-निर्माण की मेज पर सबसे कम मौजूद है।

भारत के जिन शहरों में हवा जहरीली हो चुकी है, वहाँ अध्ययन साफ बताते हैं कि लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने वाली महिलाओं में एनीमिया, फेफड़ों की बीमारियाँ और हार्मोनल असंतुलन पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक दर्ज किए जा रहे हैं। WHO और ICMR की चेतावनियाँ ठोस ईंधन से भरे रसोईघरों को महिलाओं के लिए “अदृश्य आपदा” बताती हैं। वहीं Lancet के दक्षिण एशिया विश्लेषण बताता है कि प्रदूषण के कारण प्री-टर्म बर्थ, कम वज़न वाले बच्चों का जन्म और गर्भावस्था संबंधी स्वास्थ्य जोखिम—महिलाओं में कहीं अधिक दर्ज होते हैं। गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों पर प्रदूषण का असर लैंगिक असमानता का सबसे मौन, लेकिन सबसे घातक रूप लेकर सामने आता है।

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इन शोधों में कहीं कोई अतिशयोक्ति नहीं ये वही वास्तविकताएँ हैं, जिन्हें भारत की करोड़ों महिलाएँ रोज़मर्रा में झेलती हैं।

भारत में पर्यावरणीय नीतियाँ अभी भी तकनीकी दस्तावेज़ों की तरह लिखी जाती हैं, जहाँ “नागरिक” एक अमूर्त इकाई है, और व्यवहार में वह “पुरुष नागरिक” मान लिया जाता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों, शहरी योजना समितियों, वायु-गुणवत्ता प्रकोष्ठों और राज्य जलवायु मिशनों में महिलाओं की उपस्थिति बेहद सीमित है। कई राज्यों में यह 10–15% से भी कम है।

विडंबना यह है कि जोखिम महिलाएँ झेलती हैं, पर नीति उनकी नहीं बनती। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हों या शहरी विकास की इकाइयाँ, जलवायु मिशन हों या नगर-योजनाएँ—निर्णय-स्तर पर महिलाओं की उपस्थिति आज भी बेहद सीमित है। नतीजतन शहरों के लिए बनाई गई वायु-गुणवत्ता योजनाओं में सड़क किनारे काम करने वाली महिलाओं की स्थिति अदृश्य रह जाती है। हीट-एक्शन प्लान में गर्भवती मजदूरों का उल्लेख तक नहीं होता। जलसंकट के दस्तावेज़ यह मानकर चलते हैं कि पानी एक नल वाला संसाधन है, जबकि ग्रामीण भारत की हकीकत यह है कि पानी भरने का बोझ आज भी लड़कियों और महिलाओं के कंधों पर टिका हुआ है।

दुनिया अब यह समझने लगी है कि जलवायु न्याय और जेंडर न्याय दो अलग चीजें नहीं एक-दूसरे की पूरक शर्तें हैं। कोप 30 जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में यह स्वीकारोक्ति बढ़ी है कि महिलाएँ सिर्फ संकट की ‘पीड़ित’ नहीं, बल्कि समाधान की साझेदार हैं। भारत ने इस विचार का समर्थन तो किया है, पर घरेलू नीतियों में यह प्रतिबद्धता अभी अधूरी है।

महिलाओं को केंद्र में रखकर पर्यावरण-शासन कैसा दिख सकता है? इसके लिए किसी “चमत्कारिक” मॉडल की आवश्यकता नहीं, बल्कि स्पष्ट दृष्टि की ज़रूरत है। एक ऐसा ढाँचा जहाँ निर्णय-स्तरों पर महिलाएँ मौजूद हों, जहाँ स्वास्थ्य और श्रम नीतियाँ प्रदूषण को जेंडर नज़र से देखें, और जहाँ बजट आवंटन यह समझे कि सस्ती स्वच्छ ऊर्जा, सुरक्षित पानी, विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन और ताप-सहिष्णु कार्यस्थल सिर्फ पर्यावरणीय सुधार नहीं—महिला स्वास्थ्य और समानता के आधार-स्तंभ हैं।

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देश के कई राज्यों में महिला स्वयं सहायता समूहों ने जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा में जो काम किया है, वह यह साबित करता है कि मंच मिले तो महिलाएँ नेतृत्व करने में किसी से पीछे नहीं हैं।

2-3 दिसंबर भोपाल त्रासदी की स्मृति हमें याद दिलाती है कि पर्यावरणीय जोखिम कभी बराबरी से विभाजित नहीं होते। वर्ष 2025 का भारत यह दिखा रहा है कि असमानता का यह चेहरा आज भी उतना ही कठोर है, बस स्वरूप बदला है। यदि भारत स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी और टिकाऊ विकास की ओर सचमुच बढ़ना चाहता है, तो उसे वह कदम उठाना होगा जो सबसे लंबे समय से टाला गया है: महिलाओं को पर्यावरणीय नीति और शासन के केंद्र में लाना। जब तक ऐसा नहीं होता, हम न तो अतीत की त्रासदियों से सीख पाएँगे, न वर्तमान संकटों का सामना कर पाएँगे।

आज जब विषैली हवा, बढ़ती गर्मी और संसाधनों की कमी हमारे शहरों और गाँवों का भविष्य बदल रही है, तब यह स्पष्ट है कि जलवायु संकट किसी दूर की चेतावनी नहीं—बल्कि लाखों महिलाओं की रोज़मर्रा की हकीकत है। पानी भरने की लंबी कतारें, धुएँ से भरे रसोईघर, असुरक्षित आवास, अनियमित मजदूरी, और प्रदूषण से उपजती बीमारियाँ ये सब हमारे समय का सबसे चुपचाप लिखा जा रहा लैंगिक अध्याय हैं।

अब वक्त है कि इस संरचनात्मक चुप्पी को तोड़ा जाए। निर्णय-प्रक्रिया में महिलाओं की मजबूत उपस्थिति अब एक विकल्प नहीं, बल्कि नीति की बुनियादी शर्त होनी चाहिए। राष्ट्रीय योजनाओं से लेकर राज्यीय कार्यक्रमों और स्थानीय निकायों तक, जहाँ भी जलवायु, स्वास्थ्य या शहरी ढाँचे के फैसले लिए जाते हैं, वहाँ महिलाओं की भागीदारी को संख्या में भी और भूमिका में भी केंद्रीय स्थान मिलना चाहिए।

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पिछली दुर्घटनाओं और अनुभवों ने हमें यह सिखाया है कि पर्यावरणीय जोखिम हमेशा कमजोर समूहों को पहले और ज्यादा चोट पहुँचाते हैं। इसलिए अगला कदम यही है कि जेंडर-संवेदी डेटा, बजटिंग और नीति-निर्माण को भारत की विकास-रणनीति का मूल तत्व बनाया जाए, ऐसा तत्व जो सिर्फ सुरक्षा ही नहीं, बल्कि समान अवसर, स्वस्थ पर्यावरण और दीर्घकालिक न्याय भी सुनिश्चित करे।

समय आ गया है कि भागीदारी बढ़े, नजरिया बदले और जलवायु कार्रवाई में वह आवाज़ें भी सुनी जाएँ जो अब तक सिर्फ प्रभाव झेलती रही थीं। भारत तभी आगे बढ़ेगा जब यह मान लेगा कि स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी और टिकाऊ विकास की लड़ाई किसी “पर्यावरणीय” मुद्दे भर की लड़ाई नहीं यह महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और समान अवसरों की लड़ाई भी है।

सत्‍यप्रकाश नायक जेंडर के मुद्दों पर कार्यरत हैं।

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