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देश में जिस तरह से संविधान के नाम पर राजनीति की जा रही है, वह कल्पना से परे – वरिष्‍ठ पत्रकार उर्मिलेश

भारत की डेमोक्रेसी को कागज से जमीन पर उतारने की जरूरत इंदौर, 26 नवंबर। वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने कहा है कि भारत की डेमोक्रेसी को कागज से जमीन पर उतारने की जरूरत है । हमारे संविधान में देश को धर्मनिरपेक्ष…

जिला अस्पतालों को निजी हितधारकों को न देकर मेडिकल कॉलेजों को जमीन दिये जाने हेतु सरकार के निर्णय का स्‍वागत

जन स्वास्थ्य अभियान की मांग प्रदेश में सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र मजबूत करें भोपाल 26 नवमबर 2024। हाल ही में मध्‍यप्रदेश सरकार द्वारा जिला अस्पतालों को निजी हितधारकों के हाथों देने का निर्णय बदलकर अब उन्हें मेडिकल कॉलेज के लिए जमीन…

कलायें सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मरंजन और ईश आराधना का माध्यम होती है- डॉ. सच्चिदानंद जोशी

22 वीं अ.भा.सद्भावना व्याख्यानमाला की सप्त दिवसीय वैचारिक यात्रा का हुआ समापन उज्जैन, 26 नवंंबर। भारत में कला का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मरंजन और ईश्वर आराधना रहा है। दुर्भाग्यवश, औपनिवेशिक शिक्षा पद्धति ने हमारे कला के प्रति दृष्टिकोण…

प्रकृति प्रदत्त वाणी एवं मनुष्य कृत भाषा !

प्रकृति प्रदत्त ज्ञानेंद्रियों और मनुष्य की सृजनात्मक एवं विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों की निरन्तर जुगलबंदी ने आज की दुनिया को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया है कि जहां तक पहुंच कर हम समूची सभ्यता की सृजनात्मक शक्ति बढ़ा और नष्ट-भ्रष्ट भी…

वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत सुंदरलाल बहुगुणा सम्मान से सम्मानित

नई दिल्ली, 24 नवंबर । काका साहब कालेलकर और विष्णु प्रभाकर की स्मृति में गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान की ओर से सन्निधि सभागार में आयोजित एक समारोह में पर्यावरण के क्षेत्र में निरंतर रचनात्मक लेखन करने…

द साबरमती रिपोर्ट : सिनेमा के पर्दे पर राजनीति का खेल

भारती पंडित फिल्‍म समीक्षा मीडिया में तो राजनीति का दखल हम देख ही रहे थे, अब फिल्मों में राजनीतिक दखल के क्या मायने होते हैं, इस फिल्म को देखने से आप समझ पाएँगे | सीधे और छुपे रूप से नफरत…

सावधान! आपकी थाली के शाकाहार में छुपा हो सकता है मांसाहार

मालवा निमाड़ के खेतों में पैदा होने वाली सरसों के साथ बैंगन, सोयाबीन आदि जैसी फसलों और साग-भाजी के साथ फल आपकी थाली में परोसे जाएं और इनके शाकाहारी या मांसाहार होने का भेद नहीं कर पाए तो क्या होगा? ऐसे प्रकृति…

जीवन से जुड़ी आजीविका

जीवन की तरफ पीठ देकर खड़ी की जा रही समृद्धि ने क्या हमें उस बुनियादी सुख से भी वंचित कर दिया है, जो इस तमाम खटराग का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए? और यदि यह सही है तो फिर क्या हमें…

पलायन और विस्थापन नियति है आदिवासियों की

निमिषा सिंह देश की आबादी में अनुसूचित जनजाति के लोगों की तादाद 8.6% है, लेकिन विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वाले लोगों की कुल संख्या में अनुसूचित जनजाति के लोगों की तादाद 40 प्रतिशत है। जाहिर है, जनजातीय लोगों को जो भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची से आच्छादित हैं, भूमि-अधिग्रहण, विस्थापन…

देश का पिछड़ता पर्यावरण

जिन वन और वन्यप्राणियों को इंसानी हस्तक्षेप से बचाने की खातिर समूची सरकारी ताकत जंगलों में बसे इक्का-दुक्का गांवों को खदेड़ने में लगी है, उन्हीं वनों को दान-दक्षिणा में पूंजीपतियों को सौंपा जा रहा है। क्या इस तरह की मौजूदा…