द साबरमती रिपोर्ट : सिनेमा के पर्दे पर राजनीति का खेल

भारती पंडित

फिल्‍म समीक्षा

मीडिया में तो राजनीति का दखल हम देख ही रहे थे, अब फिल्मों में राजनीतिक दखल के क्या मायने होते हैं, इस फिल्म को देखने से आप समझ पाएँगे | सीधे और छुपे रूप से नफरत को कैसे भड़काया जा सकता है, यह फिल्म इसका बढ़िया उदाहरण है | साथ ही कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर फिल्म को कैसे खिचड़ी बनाया जा सकता है, यह भी समझने को मिलेगा |

इस फिल्म के शुरू होने के पहले और यहाँ तक कि इसके विज्ञापन और पोस्टर के साथ यह डिस्क्लेमर अवश्य दिखाया जाना चाहिए कि यह फिल्म एक धर्म विशेष के लोगों के लिए बनाई गई है, दूसरे धर्म के लोग इसे थिएटर में जाकर देखने का दुस्साहस न करें अन्यथा…यह फिल्म दावा करती है कि इसका किसी भी सच्ची घटना से संबंध नहीं है, यह किसी धर्म-जाति-संप्रदाय को आहत नहीं करती मगर इसका हर फ्रेम हमारे और उनके की ही बात करता है |  

विक्रांत मैसी जिसने हाल ही में बारहवी फेल जैसी शानदार फिल्म दी है, उसी के नाम पर फिल्म देखने गई थी पर समझ नहीं आया कि रुपयों के लिए कोई कुछ भी कैसे कर सकता है | भाई संवाद बोलते समय उन्हें थोड़ा समझते तो होंगे न, कुछ तो आत्मसात करते होंगे? यह नहीं लगता कि ऐसी फिल्में भी उनके नाम इतिहास में दर्ज होंगी जिन्हें कुछ सालों बाद खुद ही देखने में शर्म आएगी?

तो फिल्म पर आते हैं… फिल्म बनी है फरवरी 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के दो डिब्बों जिनमें अयोध्या से लौट रहे कारसेवक बैठे थे, को जलाने की घटना को लेकर जिसे तात्कालिक प्रशासन, मीडिया और रेलवे विभाग ने दुर्घटना बताया था और बाद में कुछ लोगों पर मामला दायर हुआ, कुछ को सज़ा हुई | इस षड्यंत्र में पाकिस्तान का हाथ था, यह भी तथाकथित सूत्रों के हवाले से कहा गया | फिल्म शुरू होती है समर कुमार नाम के टीवी के हिन्दी पत्रकार पर अदालत में दायर हुए मुकदमों की सुनवाई से, और इसी दृश्य से फिल्म का कमजोर निर्देशन सामने आ जाता है | अपनी सफाई में समर कुमार अपने विपक्षियों पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने भी सच को दबाया है और यहाँ से फिल्म फ्लैश बैक में जाती है जहाँ उन्हें न्यूज चैनल की एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ गोधरा रेल दुर्घटना के स्थल पर रिपोर्टिंग के लिए भेजा जाता है | पत्रकार किसी ऊपरी दबाव के चलते घटना को दुर्घटना में तब्दील करके रिपोर्टिंग करती है, जबकि समर कुमार दुर्घटना में घायल लोगों का अलग से वीडियो बना लेते हैं | पर टीवी पर खबर कुछ और ही प्रसारित की जाती है | समर के विरोध करने पर उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है | ऊपरी दबाव के चलते उसे कहीं भी नौकरी नहीं मिलती और वह शराब के नशे में खुद को डुबो देता है |

ट्रेन जलाने का घटनाक्रम विपक्षी दल का षड्यंत्र था, इसे पहले ही दिखा दिया जाता है | ध्यान रहे, इस समय केंद्र और राज्य दोनों में एक ही दल की सरकार थी और फिल्म के मुताबिक प्रशासन ने भी इसे दुर्घटना करार दिया था |

पाँच साल बाद राजनीतिक हलचल और दबाव के चलते गोधरा कांड की पाँचवी बरसी पर वही न्यूज चैनल इस मुद्दे को अलग तरीके से, घायल हुए लोगों से बातचीत करके दिखाना चाहता है और इसके लिए एक नई इंटर्न को लिया जाता है | उस इंटर्न को समर की बनाई वीडियो भी मिलती है और वह समर से सहायता का अनुरोध करती है |

किसी घटना की वास्तविकता की जाँच करना ठीक है पर उसके माध्यम से दूसरे मुद्दे की चिंगारी भड़काना? गोधरा में पूछताछ के दौरान टीवी पर भारत पाकिस्तान का मैच चलते हुए दिखाना, ये लोग तो उनकी जीत पर जश्न मानते हैं जैसे संवाद, फिर अचानक भारत की जीत पर बच्चों का मिल-जुलकर पटाखे चलना और समर का संवाद कि नया भारत बदल रहा है, पुराने को हटाकर नई सोच ला रहा है….यह दृश्य कतई जरूरी नहीं था… 

अनावश्यक दृश्यों की और भी भरमार है इसमें- 2007 से 2017 के बीच फिर भारत की राजनीति में बड़ा बदलाव, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के चित्र, गुजरात का विकास का मॉडल, इस तरह के दृश्य कहानी की मांग नहीं वरन सिर्फ प्रोपेगेंडा है | इससे भी खराब यह कि अंत के दस मिनिट केवल राम राम जय राम की धुन बजती रहती है, राम मंदिर का बनना और उसकी भव्यता दिखाई जाती है और इसके साथ फिल्म खत्म होती है | यदि आप थोड़े भी विचारशील है तो इसके पीछे का संकेत आसानी से समझ सकते हैं |

गोधरा में जो हुआ वह भयावह ही था मगर यदि एक निष्पक्ष फिल्म बनानी थी तो उसके बाद पूरे गुजरात में जो भयानक मारकाट मची, उसका भी उल्लेख किया जाना चाहिए था, ट्रेन घटना में मारे गए 59 लोगों के साथ-साथ इन दंगों में मारे गए 2500 लोगों का भी उल्लेख होना था और यह संदेश दिया जाना चाहिए था कि दंगे सत्ता द्वारा प्रायोजित और संरक्षित होते हैं और दंगों में जान आम आदमी की ही जाती है, जो बेकसूर होता है, जिसका इस सबसे कोई लेना-देना नहीं है |

एक और मूर्खतापूर्ण मुद्दा समर बेवजह उठाते हैं- हिन्दी और अंग्रेज़ी का— भाई मेरे, देश के अधिकांश लोग हिन्दी समझते हैं और इसीलिए बेवकूफी भरे हिन्दी न्यूज़ चैनल देखते हैं, अंग्रेज़ी का दर्जा भले ही ऊंचा हो पर देखने-सुनने वाले कम है | लगता है फिल्म के स्क्रिप्ट लेखक ने अंग्रेज़ी न आने के कारण काफी प्रताड़ना झेली है और उसका यही दर्द फिल्म में यत्र-तत्र बिना किसी वजह के टपक पड़ता है |      

मध्यांतर तक फिल्म थोड़ी ठीक चलती है, लगता है मुद्दे की बात हो रही है, उसके बाद जो फैलती है, सहन नहीं हो पाता | ऐसा भी सुनने में आया है कि फिल्म के पहले निर्देशक ने फिल्म आधी छोड़ दी थी और इसे बाद में दूसरे निर्देशक ने निर्देशित किया | स्क्रिप्ट खराब हो तो निर्देशक भी क्या ही कर लेगा |

विक्रांत मैसी ने निराश किया, बाकी कोई उलेखनीय है नहीं, गीत केवल एक है जो पार्श्व में चलता है, बाकी राम धुन चलती रहती है…कुल मिलाकर यही कि फिल्म बुरी तरह निराश करेगी।

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