जनता के ‘बजट’से जनता की ही जासूसी ?प्रजातंत्र अमर रहे !
अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से उस सरकार द्वारा अपने ही उन नागरिकों की जासूसी करना जिसे कि उन्होंने पूरे विश्वास के साथ अपनी रक्षा की ज़िम्मेदारी सौंप रखी है एक ख़तरनाक क़िस्म का ख़ौफ़ उत्पन्न करता है। ख़ौफ़ यह कि…
कोविड संकट के बावजूद स्वास्थ्य बजट में गिरावट, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की अनदेखी : जन स्वास्थ्य अभियान
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य बजट और बढ़ाने की मांग की है, जन स्वास्थ्य अभियान के अनुसार, कुल बजट में स्वास्थ्य का हिस्सा पिछले वर्ष की तुलना में 2.35% से घटकर 2.26% हो गया है। इसका मतलब यह भी है…
पाखंडी टोटकों की तरह वापरने और पूजने वाले महात्मा गांधी
संसद में बजट प्रस्तुत करने वाली देश की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पास इस सहज सवाल का कोई जबाव है कि देश के कुल 63 अमीरों के पास उन्हीं के पिछले साल पेश किए गए केन्द्रीय बजट से ज्यादा सम्पत्ति…
गांधी शहादत दिवस : गांधी को प्रासंगिक बनाते ‘अन्नदाता’
30 जनवरी : गांधी शहादत दिवस गांधी की शहादत के लंबे 74 सालों बाद भी हम यदा-कदा उनकी प्रासंगिकता को लेकर सवाल सुनते-उठाते रहते हैं, लेकिन गांधी हैं कि तरह-तरह से हमें अपनी मौजूदगी जता देते हैं। हाल का, दिल्ली…
पंचायती राज में गांधी की प्रासंगिकता
गांधी के नजरिए से मौजूदा लोकतंत्र की समीक्षा की जाए तो उसमें राज्य की सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई ग्रामसभाएं और ग्राम-पंचायतें प्रमुखता से उभरती हैं, लेकिन धीरे-धीरे हमारे लोकतंत्र की बुराईयां गांव और उनके प्रशासनिक ताने-बाने तक पहुंच गई हैं।…
क्या देश में अब विस्मृत हैं गांधी
आचार्य राममूर्ति कर्मकांडों, मूर्तियों और खोखले ‘भजनों’ के बावजूद सब जानते हैं कि एक व्यक्ति और देश की हैसियत से हम गांधी को भूल गए हैं। यदि गांधी हमारे आसपास होते तो आज हमारी ऐसी आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक…
बजट 2022, लोग क्या चाहते हैं? | हमारा पैसा हमारा हिसाब
सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी एक स्वतंत्र मंच है जिसका उद्देश्य भारत के भीतर वित्तीय जवाबदेही को मजबूत और बेहतर बनाना है। संस्था ने बजट 2022 के पूर्व हमारा पैसा हमारा हिसाब श्रृखंला में देश के आम जन बजट से क्या…
‘फैशनेबल’ गांधी : टाई-सूट से लंगोट तक
अपने समय की जरूरतों के मुताबिक विशिष्ट रहन-सहन को फैशन माना जाए तो महात्मा गांधी सर्वाधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं। इंग्लेंड, दक्षिण-अफ्रीका और भारत के अपने भिन्न-भिन्न जीवन काल में वहां की जरूरतों के अनुसार अपना वस्त्र-विन्यास बदलने वाले गांधी…
मौसम की मार : बीमा और तकनीक में फंसा किसान
जिस कृषि क्षेत्र की बदौलत कोविड-19 की त्रासदी के बावजूद हमारा ‘सकल घरेलू उत्पाद’ यानि ‘जीडीपी’ उछलता नजर आ रहा था, उसी कृषि क्षेत्र को अब मौसम की मार झेलनी पड रही है और उसकी मदद को कोई नहीं है।…
पर्यावरण : प्रकृति को पछाड़ता प्लास्टिक
प्लास्टिक को बनाया तो इंसान ने ही है, लेकिन अब वही प्लास्टिक, भस्मासुर की तरह इंसान और उसके प्राकृतिक पर्यावास पर संकट बनकर खडा हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन ‘वर्ल्ड वाइड फंड’ (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार 2030…























