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मौसम की मार : बीमा और तकनीक में फंसा किसान

मौसम की मार : बीमा और तकनीक में फंसा किसान

जिस कृषि क्षेत्र की बदौलत कोविड-19 की त्रासदी के बावजूद हमारा ‘सकल घरेलू उत्पाद’ यानि ‘जीडीपी’ उछलता नजर आ रहा था, उसी कृषि क्षेत्र को अब मौसम की मार झेलनी पड रही है और उसकी मदद को कोई नहीं है।...

प्रमोद भार्गव

जिस कृषि क्षेत्र की बदौलत कोविड-19 की त्रासदी के बावजूद हमारा ‘सकल घरेलू उत्पाद’ यानि ‘जीडीपी’ उछलता नजर आ रहा था, उसी कृषि क्षेत्र को अब मौसम की मार झेलनी पड रही है और उसकी मदद को कोई नहीं है। दिखाने के लिए जो कुछ किया जा रहा है वह तकनीक और पूंजी के आधुनिक खेल में फंसा है। मुआवजे के लिए ‘एप’ और बीमा कंपनियों को कुछ इस तरकीब से लगाया गया है कि अव्वल तो मुआवजा देना ही न पडे या फिर बेहद कम मुआवजा देकर निपटा दिया जाए।

मध्यप्रदेश में बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि से खेती-किसानी जबरदस्त संकट में हैं। किसानों की आँखें पथरा गईं हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस संकट से पार पाने की दृष्टि से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए जिलाधिकारियों और संभाग आयुक्तों को सात दिन के भीतर नुकसान हुई फसल का सर्वे करने और 10 दिन में मुआवजे का भुगतान करने के निर्देश दिए हैं। यह प्रक्रिया ‘राजस्व पुस्तक परिपत्र’ अर्थात ‘आरबीसी’ के तहत होनी है।

हानि का सर्वे तकनीक, यानी मोबाइल एप से करना है और पटवारी इससे सर्वेक्षण करने को तैयार नहीं हैं। इस लक्ष्य की पूर्ती के लिए एक तो राजस्व अमले को मौके पर जाना होगा, दूसरे मनमानी नहीं कर पाएंगे। अब तक पटवारी घर बैठकर सर्वे रिपोर्ट बना लेने और रिश्वत लेकर नुकसान बढ़ा-चढ़ाकर दर्ज कर लेने के लिए बदनाम रहे हैं। अतएव निरंकुश अमले ने एप से सर्वे न करने के लिए सरकार पर ही दबाव बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने एप से डेटा फीड करने की दिक्कतें गिनाईं और जिला कलेक्टर को ज्ञापन देकर एप से सर्वे में असमर्थता जता दी। चूँकि राजस्व अमला ही कलेक्टर के हाथ-पैर होते हैं, इसलिए ज्यादातर कलेक्टर ढीले पड़ गए। प्रदेश में केवल भिंड जिला कलेक्टर ने इस बहाने को लापरवाही माना और सर्वे नहीं करने पर तीन पटवारियों को निलंबित कर दिया।

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खेतों में खून-पसीना बहाने और हाड़तोड़ मेहनत के बाद ओला व अतिवृष्टि से हताश किसान को सरकारी अमले से भी कोई उम्मीद नहीं दिखती। एप से सर्वे करने में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां हो सकती हैं, लेकिन एप पूरी तरह से सर्वे करने में व्यर्थ है, यह कहना पटवारियों की तकनीकी अज्ञानता तो है ही, बेईमानी की मंशा भी इस नकार में शामिल है। हालांकि जो परेशानियां पेश आ रही हैं, वे दूर न की जा सकें, ऐसा भी नहीं है? उन्हें एप बनाने वाली कंपनी के इंजीनियर दूर कर सकते हैं।

‘आरबीसी’ के नियमों की बात करें तो वे भी वाकई किसान हितकारी हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। ये नियम किसान से कहीं ज्यादा बीमा कंपनियों के हित में हैं। इसका मुआवजे से संबंधित पहला नियम तो यही है कि खेत में खड़ी फसल का 25 प्रतिशत नुकसान होना जरूरी है। इससे कम नुकसान होने पर किसान को मुआवजे की पात्रता नहीं होगी। यही नहीं, यदि 25 से 33 प्रतिशत के बीच नुकसान होता है तो प्रति हेक्टेयर न्यूनतम पाँच हज़ार रुपये मुआवजे की धनराशि मिलेगी। यह भी बारिश आधारित फसलों के लिए अधिकतम 16 हज़ार रुपए है। कुछ फसलों पर 50 फीसदी से ज्यादा नुकसान होने पर यह राशि अधिकतम 30 हज़ार रुपए हो सकती है।

कृषि विशेषज्ञों की मानें तो औसत 9 हज़ार रुपए का मुआवजा ही किसानों को मिलता है। इस हिसाब से यह कुल 90 करोड़ रुपए ही होगा, जबकि शुरुआती नुकसान के आकलन के मुताबिक किसानों की करीब 900 करोड़ रुपए की फसल प्रभावित हो चुकी है। फसल बीमा की राहत लंबी प्रक्रिया के ऊँट के मुँह में जीरे के बराबर ही मिल पाएगी। मुख्यमंत्री के साथ प्रदेश के कृषि मंत्री कमल पटेल ने भी आश्वस्त किया है कि किसानों के नुकसान की भरपाई राज्य सरकार करेगी। ‘आरबीसी’ के नियमों के तहत आर्थिक मदद देने के साथ ही ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ से भी 25 प्रतिशत राशि दिलाए जाने के प्रयास सरकार युद्धस्तर पर कर रही है। इसके अलावा अन्य रास्ते भी तलाशे जा रहे हैं।

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प्रदेश में फिलहाल एक लाख 4 हज़ार 611 हेक्टेयर क्षेत्र में रबी फसलों को भारी नुकसान पहुंचने का अनुमान है। ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ के अंतर्गत बीमा लेते वक्त किसानों को खरीफ की खाद्य और तिलहनी फसलों के लिए बीमित रकम का अधिकतम 2 प्रतिशत और रबी की खाद्य व तिलहन फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत प्रीमियम जमा करना होता है। इसी तरह वाणिज्यिक एवं बागवानी फसलों के लिए कुल प्रीमियम का अधिकतम 5 प्रतिशत भुगतान करना होता है, किंतु किसानों को बीमित राशि का पूरा भुगतान बीमा कंपनियां नहीं करती और सरकार उनके आगे नतमस्तक खड़ी दिखाई देती है। गोया किसानों की बजाय बीमा कंपनियां ही लाभ में रहती हैं।

‘केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय’ की रिपोर्ट के अनुसार यह हकीकत सामने भी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक बीते 5 साल में बीमा कंपनियों को कुल 1.38 लाख करोड़ रुपए की प्रीमियम राशि मिली, लेकिन जब बीमा राशि देने का अवसर आया तो किसानों को कुल 92 हज़ार 427 करोड़ रुपए की धनराशि दावा करने के बाद बमुश्किल दी गई। कंपनियां बीमा राशि देने में तो आनाकानी करती ही हैं, लेटलतीफी भी बरतती हैं। इस कारण कई किसानों को मुआवजे का हकदार होने के बावजूद राशि नहीं मिल पाती है। कंपनियां पूरा मुआवजा भी नहीं बांटती हैं। इन पांच सालों में बीमा कंपनियां 15 हज़ार 22 सौ करोड़ रुपए के लाभ में रही हैं। इस अतिवृष्टि से 20 प्रतिशत फसल पैदावार में कमी आने का अनुमान है, जो महंगाई बढ़ने का कारण भी बन सकती है।

गेहूं, चना और मसूर के साथ और सब्जियों के लिए भी यह बारिश जानलेवा साबित हुई है। प्रदेश में इस साल 54 लाख हेक्टेयर में गेहूं की बुआई की गई है। जिन किसानों ने सिंचाई सुविधा के चलते बोवनी पहले की थी, उनकी फसल पकने के करीब थी। अब यह अचानक बारिश की मार से खेतों में बिछ गई है। फसल का यह नुकसान ग्वालियर-चंबल संभाग से लेकर महाकौशल, विंध्य तथा मालवा-निमाड़ तक में है। मौसम की यह मार पश्चिमी विक्षोभ के कारण बने जलवायु प्रसार का असर बताया जा रहा है। इस विक्षोभ का 90 प्रतिशत तक गेंहू की फसल पर असर पड़ा है।

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मध्यप्रदेश में यह हालत उस किसान की है जिसका मध्यप्रदेश की जीडीपी दर में योगदान 24 फीसदी है और पिछले कई साल से लगातार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ‘कृषि कर्मण पुरष्कार’ ले रहे हैं। एक कृषि सर्वे के अनुसार पूरे प्रदेश में महज एक फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास 10 हेक्टेयर से ज्यादा खेती की जमीन है, जबकि लगभग 72 प्रतिशत किसान ऐसे हैं, जिनके खेतों का रकबा 2 हेक्टेयर से कम है। लघु व सीमांत किसान फसल बीमा के लिए सक्षम ही नहीं हैं। लिहाज़ा इन्हें केवल सरकार द्वारा दी जाने वाली राहत राशि की ही उम्मीद है। मध्यप्रदेश में सिंचाई का रकवा बढ़ने के बावजूद 64 प्रतिशत कृषि भूमि अभी भी असिंचित है। खेतों के आकार भी घट रहे हैं। 2000-01 में जहां प्रदेश में औसत जोत का आकार 2.22 हेक्टेयर था,वहीं 2010-11 में यह घटकर 1.78 हेक्टेयर रह गया है। ऐसे में सरकारी अमले द्वारा सर्वेक्षण को तकनीक के जंजाल में उलझाना और बीमा कंपनियों द्वारा किसानों को मुआवजा देने में ‘आरबीसी’ के नियमों में झोल तलाशना किसान और प्रदेश हित में नहीं है। मुख्यमंत्री को इस परिप्रेक्ष्य में कठोर होने की जरूरत है।(सप्रेस)

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