विज्ञान, साक्षरता और सामाजिक बदलाव को जनभागीदारी से जोड़ने वाले डॉ. एम.पी. परमेश्वरन की स्मृति
विज्ञान को आम लोगों तक ले जाने और वैज्ञानिक चेतना को समाज में फैलाने में लगे रहे प्रख्यात परमाणु वैज्ञानिक और जन विज्ञान आंदोलन के पुरोधा डॉ. एम.पी. परमेश्वरन का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा। हमारे लिए वे केवल एक प्रख्यात परमाणु वैज्ञानिक या जनविज्ञान आंदोलन के प्रमुख व्यक्ति नहीं थे। 1987 के दौर से हम उन्हें सम्मान और प्यार से ‘एमपी’ के नाम से संबोधित करते रहे। 11 अगस्त 2026 को केरल के त्रिशूर में 91 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ जनविज्ञान आंदोलन ने अपने एक ऐसे साथी को खो दिया है, जिसकी भूमिका किसी एक संस्था या अभियान तक सीमित नहीं थी। एक वैज्ञानिक के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले एमपी ने बाद में विज्ञान को आम लोगों तक पहुँचाने और वैज्ञानिक चेतना विकसित करने को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था। उनके साथ काम करने और उनके विचारों को करीब से देखने वालों के लिए एमपी हमेशा ऐसे व्यक्ति रहे, जो लगातार नए विचारों को जन्म देते, उन्हें लोगों तक पहुँचाते और फिर उन विचारों को जमीन पर उतारने वाले कार्यकर्ताओं को तैयार करते थे।
1956 में त्रिवेंद्रम के इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने 1965 में मॉस्को पावर इंस्टीट्यूट से परमाणु इंजीनियरिंग में पीएचडी की। 1957 से 1975 तक उन्होंने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) में वैज्ञानिक के रूप में काम किया। सोवियत संघ में प्रशिक्षण लेने और देश के प्रमुख परमाणु अनुसंधान केंद्र में वैज्ञानिक के रूप में काम करने के बाद एमपी ने अपनी नौकरी छोड़ दी और खुद को सामाजिक बदलाव के काम के लिए समर्पित कर दिया। बाद में विज्ञान के लोकप्रियकरण का काम उनके जीवन का प्रमुख उद्देश्य बन गया। 1969 से 1973 के बीच उन्होंने केरल के राज्य भाषा संस्थान में सहायक निदेशक के रूप में भी कार्य किया। उन्होंने मलयालम और अंग्रेजी में विज्ञान और सामाजिक मुद्दों पर पुस्तकें भी लिखीं।
एमपी, केरल शास्त्र साहित्य परिषद (KSSP) के संस्थापक नेताओं में से एक थे। उनके द्वारा बोए गए परिवर्तन के बीजों की गिनती नहीं की जा सकती। ‘संपूर्ण साक्षरता और जनविज्ञान आंदोलन’ तथा ‘समन्वित विकास और मानव संसाधन के नियोजन’ की अवधारणा उनके सबसे चर्चित कार्यक्रमों में रही, लेकिन उनके नेतृत्व में ऐसे कई अन्य प्रयोग भी हुए, जिन्होंने केरल के सामाजिक निर्माण की नींव रखने में भूमिका निभाई।
केरल और राष्ट्रीय स्तर पर चले साक्षरता अभियानों में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के साथ मिलकर काम करते हुए उन्होंने एर्नाकुलम जिले में साक्षरता आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1990 में एर्नाकुलम देश का पहला पूर्णतः साक्षर जिला घोषित हुआ। इसी दौर में भारत ज्ञान विज्ञान जत्था के आयोजन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसने आगे चलकर देशव्यापी साक्षरता अभियान के विस्तार का रास्ता तैयार किया।
ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क (AIPSN) और भारत ज्ञान विज्ञान समिति (BGVS) के निर्माण में भी एमपी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। जनविज्ञान आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए वे केवल किसी संगठन के वरिष्ठ व्यक्ति नहीं थे, बल्कि विचार और दिशा देने वाले साथी थे। संयुक्त मध्यप्रदेश में मध्यप्रदेश विज्ञान सभा से जुड़कर वैज्ञानिक चेतना फैलाने के काम में भी उनका जिक्र देश भर में हमेशा सम्मान से लिया जाता था।
पी. सी. रथ, जो छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं, एमपी को याद करते हुए बताते हैं कि वे चमकदार और विचारोत्तेजक विचार पैदा करते थे और फिर उन्हें उन लोगों तक पहुँचाते थे, जो उन्हें जमीन पर उतार सकें। शायद यही उनके काम करने की सबसे बड़ी विशेषता थी। वे हर काम अपने हाथ में रखने के बजाय लोगों को तैयार करते थे, जिम्मेदारियाँ सौंपते थे और विचारों को आगे बढ़ने का अवसर देते थे। उन्होंने ढेर सारी किताबें, पेपर और कार्य योजनाएँ लिखीं। अपने 91 वर्षों के जीवन में, जब तक वे पूरी तरह अस्वस्थ नहीं होते थे, वे लगभग हर दिन नए विचारों को जीवन देते रहे, संप्रेषण करते रहे, लिखते रहे।
उनके अधिकांश पेपर और नोट्स नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी के एमपी परमेश्वरन आर्काइव में संग्रहित किए जा रहे हैं। ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क (AIPSN) के अंतर्गत संयुक्त मध्यप्रदेश में मध्यप्रदेश विज्ञान सभा से जुड़ कर वैज्ञानिक चेतना फैलाने के कार्यों में उनका जिक्र देश भर में हमेशा सम्मान से लिया जाता।
वे जनविज्ञान आंदोलन से जुड़े हर कार्यकर्ता के लिए एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे, जिन्होंने शुरू से ही इसकी व्यवहारिकताओं को समझा और अलग अलग व्यक्तित्वों को जिम्मेदारियों तक पहुँचने के लिए आकार दिया , जिससे देश में 90 के दशक से यह आंदोलन फैल सका।
उम्र और पद में भारी वरिष्ठता होने के बावजूद, अधिकांश युवाओं तथा अन्य लोगों में उनका नाम सिर्फ ‘एमपी’ ही प्रचलित था। हिंदी भाषी राज्यों में लोग अक्सर प्यार से इसे ‘महापुरुष’ के रूप में व्याख्यायित करते थे।
देश में विज्ञान आंदोलन के विस्तार की उनकी परिकल्पना सही साबित हुई या नहीं, यह एक अलग सवाल है, लेकिन आज हम देखते हैं ज्ञानविज्ञान , जन विज्ञान आंदोलन ने देश में अपेक्षाकृत बड़े पैमाने की कई क्षेत्रों में विकास की नीतियों और योजनाओं को इसने प्रभावित किया है।
एमपी ने विज्ञान, पर्यावरण, सामाजिक मुद्दों और राजनीति पर 30 से अधिक पुस्तकें लिखीं। ‘चौथी दुनिया’ (Fourth World) का उनका सामाजिक-आर्थिक सिद्धांत काफी चर्चा में रहा। समाज में उनके योगदान के लिए उन्हें केरल सरकार के ‘केरल श्री’ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। KSSP को 1996 में राइट लाइवलीहुड अवार्ड, 1990 में यूनेस्को लिटरेसी अवार्ड, UNEP के ग्लोबल 500 और वृक्ष मित्र पुरस्कार जैसे सम्मान मिले।
एमपी के 91 वर्षों के जीवन को देखते हुए सबसे महत्वपूर्ण बात शायद यही है कि उन्होंने विज्ञान को केवल प्रयोगशाला की चीज बने रहने नहीं दिया। उन्होंने उसे समाज, शिक्षा, साक्षरता और जनभागीदारी से जोड़ने की कोशिश की। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान और शायद सबसे स्थायी स्मृति भी है।


