रेहमत

सडक, रेल और वायु मार्गों के अलावा अब हमारी सरकार पारंपरिक जल-परिवहन के लिए उत्साहित हुई है। कहा जा रहा है कि पानी के छोटे-बडे जहाजों से माल ढुलाई सस्ती हो जाएगी। सवाल है कि क्या शुरुआती तैयारी के लिहाज से जल-परिवहन की यह योजना कारगर साबित होती दिखाई देती है? बडवानी स्थित ‘मंथन अध्ययन केन्द्र’ ने इसकी गहरी पडताल की है।

दुनिया में जल परिवहन का इतिहास पुराना है। सिंधु घाटी सभ्‍यता में भी जल परिवहन के प्रमाण मिले हैं, लेकिन कालांतर में परिवहन के उन्‍नत साधन विकसित होने से अंतर्देशीय जल परिवहन उतना लोकप्रिय नहीं रह गया है। अब भारत सरकार देश के तटीय क्षेत्रों और नदियों-नहरों में जल परिवहन को अत्‍यधिक प्राथमिकता दे रही है। इसके लिए नए सिरे से ‘राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम – 2016’ बनाकर देश की प्रमुख नदियों, खाड़ियों और मुहानों में कोई 111 राष्ट्रीय अंतर्देशीय जलमार्ग घोषित किए गए हैं। जल परिवहन को ईंधन कुशल, पर्यावरण के अनुकूल एवं सड़क और रेल परिवहन के मुकाबले किफायती साधन बताया जा रहा है।

इन जलमार्गों से सडक़ एवं रेल नेटवर्क पर भार कम कर देश के आर्थिक विकास को गति देने का दावा भी किया जा रहा है। लेकिन, शोध संस्‍था मंथन अध्‍ययन केन्‍द्र द्वारा हाल ही में जारी अध्‍ययन रिपोर्ट राष्‍ट्रीय अंतर्देशीय जलमार्ग कार्यक्रम: दावोंप्रगति और प्रभावों की समीक्षा के अनुसार आसमानी दावों के साथ जोर-शोर से शुरु की गई इस योजना की सफलता के दावे सच्‍चाई से कोसों दूर है। इन जलमार्गों के लाभों के दावे या तो अधूरे विश्लेषणों पर आधारित हैं या गलतबयानियों से भरे हैं। सबसे दु:खद है कि निहित उद्देश्‍य के लिए पर्यावरण संरक्षण संबंधी उन प्रावधानों को धोखाधड़ी से निष्‍प्रभावी कर दिया गया है जो समाज की लंबी लड़ाई के बाद देश में लागू किए गए थे।

राष्ट्रीय अंतर्देशीय जलमार्गों के शुरुआती पांच वर्षों के अध्‍ययन के आधार पर ‘मंथन‘ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पहले चरण में घोषित 106 नए जलमार्गों में से 63 जलमार्गों को इसकी निर्माण एजेंसी ‘भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण’ (आईडब्ल्यूएआई) ने खुद ही माल/यात्री परिवहन और पर्यटन के लिए अव्यवहारिक पाया है। इसी प्रकार गंडक, घाघरा और कोसी जलमार्गों को लेकर बड़े-बड़े दावे किये गए हैं, लेकिन ‘आईडब्ल्यूएआई’ द्वारा जारी 17 राष्ट्रीय जलमार्गों की 2020 की कार्ययोजना में इन जलमार्गों का उल्लेख तक नहीं है। उल्‍लेखनीय है कि ‘मंथन‘ की जुलाई 2018 की एक पूर्व अध्ययन रिपोर्ट भी इन जलमार्गों की व्यवहारिकता पर गंभीर सवाल उठा चुकी है।

इन अंतर्देशीय जलमार्गों की अव्‍यवहारिकता के कारण ही इनके बारे में किए गए सरकारी दावे गलत साबित हो रहे हैं। देश के नौवहन, सड़क यातायात एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने जलमार्गों के लिए 2,000 करोड़ रुपए सालाना के हिसाब से 12,000 करोड़ रुपये निवेश का दावा किया था, जो दूर-दूर तक पूरा होता नज़र नहीं आ रहा है। 2021-22 के बजट में अंतर्देशीय जलमार्गों के लिए सिर्फ 623 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। हालांकि, यह अल्‍प निवेश भी केवल वर्ल्ड बैंक समर्थित ‘राष्ट्रीय जलमार्ग-1’ (गंगा) और ‘राष्ट्रीय जलमार्ग-2’ (ब्रह्मपुत्र) जैसे कुछ जलमार्गों तक ही सीमित है। जलमार्गों के विकास की अब तक धीमी प्रगति से स्‍पष्‍ट है कि आगे भी यही स्थिति रहने वाली है। 2016 के बाद के 3 वर्षों में जो 37 जलमार्ग प्रस्‍तावित थे उनमें से 21 जलमार्गों पर अभी तक काम शुरू नहीं हो पाया है। इनमें से जिन 16 जलमार्गों को कुछ हद तक प्रांरभ घोषित किया गया है उनमें से ‘अंबा जलमार्ग’ (अब ‘राष्ट्रीय जलमार्ग-10’), ‘गोवा जलमार्ग’ (अब ‘राष्ट्रीय जलमार्ग-68,111’), ‘सुंदरबन जलमार्ग’ (अब ‘राष्ट्रीय जलमार्ग -97’) आदि तो पहले से ही संचालित थे।

वाराणसी और साहिबगंज (झारखण्‍ड) के बहु-उद्देशीय टर्मिनलों को प्रारंभ करते हुए जो बड़े-बड़े दावे किए गए थे, वे अभी से खोखले साबित हो चुके हैं। नवंबर 2018 में प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटित वाराणसी टर्मिनल का सालाना लक्ष्‍य 35 लाख टन माल ढुलाई का रखा गया था, लेकिन वास्‍तव में शुरुआती 14 महीनों में यहाँ से केवल 280 टन माल की ढुलाई हो पाई। इन दावों में जल परिवहन को सड़क परिवहन के मुकाबले काफी किफायती बताया जाना भी शामिल है। सड़क और रेल परिवहन की औसत लागत क्रमश: 2.50 रुपये और 1.36 रुपये प्रति टन-किमी के मुकाबले जलमार्ग परिवहन की लागत महज 1.06 रुपये प्रति टन-किमी होने का दावा किया गया है।

‘मंथन’ की रिपोर्ट के अनुसार इस सरकारी दावे के पक्ष में किसी भी चालू जलमार्गों के संबंध में आँकड़े उपलब्‍ध नहीं है। इससे संदेह होता है कि अंतर्देशीय जल परिवहन की लागत सरकारी दावों से अधिक है। विश्‍व बैंक की एक रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि हल्दिया और वाराणसी के बीच अंतर्देशीय जलमार्ग पर माल परिवहन की लागत 1.11 रुपये प्रति टन-किमी है। यदि स्रोत से गंतव्य तक माल पहुँचाने के लिए सड़क परिवहन की भी जरुरत हो तो यह लागत रेल परिवहन के बराबर पहुँच जाती है। इसके अलावा जलमार्गों में पानी की अपेक्षित गहराई न होने या नदियों का प्रवाह अधिक होने पर नौका संचालन बाधित होता रहता है। इस तरह देश में जलमार्गों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

जलमार्गों का विकास बड़े पैमाने पर होने वाले पर्यावरणीय और सामाजिक दुष्‍प्रभावों की कीमत पर किया जा रहा है। ड्रेजिंग, नौचालन और नदी किनारे निर्मित टर्मिनलों से मछलियों और अन्‍य जलीय जीवों के साथ संपूर्ण जलीय पारिस्थिति तंत्र पर विपरीत प्रभाव का अंदेशा है। इसके अलावा लुप्तप्राय: गंगा डॉल्फिन पर खतरा मंडरा रहा है। नदियों और तटीय इलाकों में मछलियों की संख्‍या घटने से उन पर निर्भर मछुआरे आजीविका से बेदखल हो सकते हैं। ऐसी योजनाओं से देश में रोजगार की समस्‍या और विकराल होगी।

सबसे ज्‍यादा दु:खद है कि इनमें से ज्‍यादातर अव्‍यावहारिक जलमार्गों को कानूनी धोखाधड़ी से आगे बढ़ाया जा रहा है। पर्यावरण पर गंभीर असर डालने वाले राष्ट्रीय जलमार्गों और उनके बहु-उद्देशीय टर्मिनल जैसे बुनियादी ढाँचों को पर्यावरण मंत्रालय की ‘पर्यावरण प्रभाव आंकलन’ (‘ईआईए’) अधिसूचना – 2020 (मसौदा)’ में बी-2 श्रेणी में रखकर इन्‍हें पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन, मूल्यांकन या जन सुनवाई की प्रक्रिया से ही मुक्‍त कर दिया गया है। यह छूट तब दी गई है जब गंगा जलमार्ग की पर्यावरणीय मंजूरी की कानूनी जरुरत से संबंधित मामला ‘राष्ट्रीय हरित अधिकरण’ (एनजीटी) के समक्ष विचाराधीन है।

चिंता की बात है कि अब तक प्रारंभ हो चुके इन जलमार्गों से 90% ढुलाई पत्‍थर के कोयले, लौह अयस्‍क, चूना पत्‍थर और फ्लाई एश जैसे रासायनिक पदार्थों की हो रही है। किसी दुर्घटना की स्थिति में ये रसायन पानी में मिलकर पानी की गुणवत्‍ता और जलीय पारिस्‍थतिक तंत्र को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं। मार्च से मई 2020 के बीच राष्ट्रीय जलमार्ग-1 और राष्ट्रीय जलमार्ग-97 में फ्लाई एश (राख) से लदी 5 बड़ी नौकाएँ (बजरे) डूब गई थी।

‘मंथन’ की रिपोर्ट में उठाया गया सवाल प्रासंगिक है कि शक्तिशाली बड़े कॉर्पोरेट के हितों और स्थानीय समुदायों, मछुआरों आदि की आजीविका के बीच में अंतर्विरोध होने पर ‘अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण’ किसे प्राथमिकता देगा? हालाँकि ऐसी स्थिति निर्मित होने पर ‘सबका साथ-सबका विकास’ वाली सरकार किसके पक्ष में झुकेगी इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। इसका एक उदाहरण वाराणसी में देखा जा सकता है जहां छोटी नौका वाले मल्लाहों की आजीविका की कीमत पर क्रूज जहाजों को चलाने की योजना शुरू की जा चुकी है। (सप्रेस)

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