बाढ़-नियंत्रण की बजाए बाढ़ की वजह बनता, सरदार सरोवर बाँध

हिमांशु ठक्कर

बड़े बांधों के घोषित उद्देश्‍यों में जल-विद्युत और सिंचाई के बलावा बाढ़-नियंत्रण भी शामिल है, लेकिन देशभर में कहीं बांधों से बाढ़ को नियंत्रित करने का कोई ठोस उदाहरण सामने नहीं आया है। मध्‍यप्रदेश में जहां नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर अब तक कई बड़े बांध बन चुके हैं, बाढ़ रोकने की बजाए उनकी वजह से बाढें आती और कई-कई दिनों तक जमी रहती हैं। हाल में ‘सरदार सरोवर बांध’ गुजरात के भरूच और आसपास के अन्‍य इलाकों में बाढ़ लाने की वजह बना है।

नर्मदा नदी के कारण दक्षिण गुजरात में हाल ही में आई अप्रत्याशित बाढ़ से स्पष्ट हुआ है कि ‘सरदार सरोवर बाँध’ प्रबंधन ने बिना सोचे-समझे, अमानवीय तरीके से निचवास में रहने वाले समुदायों की चिंता किए बिना पानी छोड़ने का निर्णय लिया था। 16 से 18 अगस्त, 21 से 22 अगस्त और उसके बाद 26 अगस्त 2020 को अधिकृत सूचना थी कि नर्मदा के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में भारी बारिश से बाँध का जलस्तर बढ़ेगा जिसके आधार पर बाँध से पानी छोड़ना प्रारंभ किया जा सकता था, लेकिन 70% बाँध भरा होने के बावजूद 28 अगस्त 2020 की शाम तक न तो बाँध के गेट खोले गए और न ही तीन सितंबर तक पूर्ण क्षमता से बिजलीघर चलाया गया।

28 अगस्त की रात अचानक गेट खोलकर 1.53 लाख क्यूसेक (घन फुट/प्रति सेकंड) पानी छोड़ना शुरु कर दिया गया। छोड़े जा रहे पानी की मात्रा 29 अगस्त की शाम तक बढ़ाकर 10 लाख क्यूसेक से अधिक कर दी गई थी। एकदम से इतना ज्यादा पानी छोड़े जाने के कारण ‘सरदार सरोवर बाँध’ के नीचे स्थित भरुच शहर के अलावा गरुड़ेश्वर, चांदोद, शिनोर, करनाली आदि शहर, कस्‍बे जलमग्न हो गए। इतनी बड़ी मानव निर्मित आपदा पर भरुच के नागरिकों के लिए दुख प्रकट करने के बजाय नहर में भरे पानी की मात्रा, खुले गेट से छूटते पानी के फव्वारे, भरे जलाशय को निहारती सरदार पटेल की मूर्ति और बारिश के दिनों में बनाई गई बिजली के आँकड़ों की खबरें जारी कर सच्चाई से ध्यान भटकाया जाता रहा।

‘सरदार सरोवर बाँध’ से अचानक छोड़े गए पानी के कारण 31 अगस्त को 30-40 गाँवों के 6600 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाना पड़ा। भरुच के लिए तो यह पिछले 50 वर्षों की 7वीं बड़ी बाढ़ साबित हुई, जिससे पुराने शहर समेत अन्य कई हिस्से बुरी तरह प्रभावित हुए। भरुच में नुकसान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हजारों घरों के अलावा वहाँ चार हजार दुकानें भी जलमग्न हो गईं। कई इलाकों में तो सड़कों और गलियों में नावें चलानी पड़ीं। ग्रामीण क्षेत्र में 20 हजार हेक्टर की फसलें भी बर्बाद हुईं। इसके अलावा नर्मदा के दोनों किनारों से मिट्टी कटाव और नर्मदा के मुहाने पर बसे मछली मारने वाले समुदायों की आजीविका भी प्रभावित हुई। महत्‍वपूर्ण यह है कि इस बार ‘केंद्रीय जल आयोग’ (सीडब्‍ल्‍यूसी) ने भी स्वीकार किया कि ‘सरदार सरोवर बाँध’ से छोड़े गए पानी के कारण निचले क्षेत्रों में बाढ़ आई थी।

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स्पष्ट है कि इस बारिश के बारे में ‘भारतीय मौसम विभाग’ (आईएमडी) और ‘सीडब्‍ल्‍यूसी’ के पूर्वानुमान, ‘नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण’ (एनसीए) के दैनिक बुलेटिन तथा अन्य अधिकृत जानकारियाँ उपलब्ध थीं, लेकिन ‘सरदार सरोवर बांध’ प्रबंधन ने इन पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। मध्यप्रदेश में भारी बारिश के पूर्वानुमान के बावजूद 28 अगस्त की शाम के बाद पहली बार बाँध के गेट से बहुत अधिक पानी छोड़ा गया।

बाढ़ का खतरा कम करने के लिए बिजली उत्पादन से भी धीरे-धीरे पानी छोड़ा जा सकता था, लेकिन ‘एनसीए’ के बुलेटिनों से स्पष्ट है कि 26 अगस्त तक भूमिगत बिजली घर चलाया ही नहीं गया। 10-15 दिन पहले जारी पूर्वानुमानों के आधार पर यदि पूर्ण क्षमता से बिजलीघर चलाया जाता तो बारिश के दौरान बाँध में पानी को रोकने की गुंजाईश होती और घबराहट में एक साथ अत्यधिक पानी छोड़ने से पैदा हुई बाढ़-आपदा से बचा जा सकता था।

कम मात्रा में नियमित पानी छोड़ने के बजाय जल्दबाजी में अत्यधिक पानी छोड़ने का असर बाँध के निचले क्षेत्र में आई बाढ़ के रुप में देखने को मिला। ‘सीडब्‍ल्‍यूसी’ के आँकड़ों से स्पष्ट है कि गरुड़ेश्वर में 29 अगस्त को शाम 4 बजे जलस्तर 22 मीटर था, जो 30 अगस्त की शाम 7 बजे 30.50 मीटर, यानी खतरे के निशान को पार कर गया था। यह जलस्तर एक सितंबर को दोपहर 3 बजे तक 33.10 मीटर के उच्चतम स्तर पर पहुँच चुका था। इसी प्रकार भरुच शहर में 29 अगस्त को रात 8 बजे नर्मदा का जलस्त‍र 4.85 मीटर था, जो एक सितंबर को बढ़कर 10.72 मीटर तक पहुँच गया था।

मौसम विभाग के आँकड़ों के अनुसार 26 अगस्त को मध्यप्रदेश स्थित नर्मदा कछार में भारी बारिश हुई थी। डिंडोरी, जबलपुर, मंडला, कटनी और सिवनी जिलों में सामान्‍य से क्रमश: 416%, 315%, 254%, 147%, और 135% अधिक बारिश दर्ज हुई थी। अगले 2 दिनों में इन जिलों के अलावा नरसिंहपुर, रायसेन, होशंगाबाद, बैतूल, बालाघाट और छिंदवाड़ा में भी भारी बारिश हुई थी। मौसम विभाग संभावित बारिश के काफी पहले पूर्वानुमान जारी कर देता है। ‘सीडब्‍ल्‍यूसी’ भी लगातार पूर्वानुमान और परामर्श जारी करता रहता है। वास्तव में इन पूर्वानुमानों, चेतावनियों और सलाहों के आधार पर ‘सरदार सरोवर बांध’ प्रबंधन गुजरात के एक बड़े इलाके में मानव निर्मित जलप्रलय को रोक सकता था, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं किया गया।

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मौसम विभाग और ‘सीडब्‍ल्‍यूसी’ ने जैसी चेतावनी ‘सरदार सरोवर बांध’ के लिए दी थी, ‘रेड अलर्ट’ के साथ वैसी ही चेतावनी मध्यप्रदेश के तवा, बरगी, बारना, इंदिरा सागर और औंकारेश्वर के लिए भी जारी की थी, लेकिन ‘सरदार सरोवर बांध’ प्रबंधन की तरह ही मध्यप्रदेश के इन बाँधों का प्रबंधन भी अंतिम समय तक हाथ-पर-हाथ धरे बैठा रहा और ठीक गुजरात की तरह मध्यप्रदेश में भी बाढ़ का ताण्डव निर्मित होने दिया गया।

बाढ़ नियंत्रण बड़े बाँधों का एक महत्वपूर्ण घोषित लाभ है। वैसे, यदि इच्छा-शक्ति हो तो बाँधों से कुछ हद तक बाढ़ नियंत्रण किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए जल-भण्डारण का बहुत अच्छा प्रबंधन जरुरी है। ऐसे प्रबंधन के लिए जलग्रहण क्षेत्र में बारिश का स्वरुप, बारिश के वास्‍तविक आँकड़े, जलग्रहण क्षेत्र की स्थिति, नदियों में प्रवाह, ऊपरी बाँधों में भण्डारण की स्थिति के अलावा सरकारी विभागों के पूर्वानुमानों और सलाहों के अनुरुप संचालन जरुरी है।

गुजरात की इस बाढ़ का ‘सरदार सरोवर बांध’ से संबंध साबित करने वाली हमारी तथ्यात्मक शोध-रिपोर्ट जारी होने के बाद इस पर राजनैतिक प्रक्रियाएं भी हुईं। चार सितंबर को बाँध का संचालन/प्रबंधन करने वाली कंपनी ‘सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड’ (संक्षेप में ‘एसएसएनएल’) ने अपने ट्वीट में गुजरात सरकार के चार सेवानिवृत्त अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर दावा किया कि ‘सरदार सरोवर बांध’ के गेटों के व्यवस्थित संचालन से भरुच को गंभीर बाढ़ से बचाया गया। पांच सितंबर की रात में निगम ने इन सेवानिवृत्त अधिकारियों की रपट के हवाले से एक दो पेज का, बिना नाम-हस्ताक्षर और बिना तारीख वाला बयान जारी किया, लेकिन न तो निगम ने इसे ट्वीट किया और न ही अपनी वेबसाईट पर डाला।

सेवानिवृत्त अधिकारियों की चार पेज की रपट में “अत्याधुनिक तकनीक,” “वैज्ञानिक विश्लेषण,”  “समन्वित संचालन,” “सुरक्षात्मक वैज्ञानिक तरीके से बाढ़ बचाव” आदि आकर्षक जुमलों का इस्तेमाल तो जरुर किया गया, लेकिन कोई तथ्य नहीं दिए गए। रिपोर्ट तैयार करने वाले जिन लोगों को “स्वतंत्र विशेषज्ञ” बताया गया है, वास्तव में वे गुजरात सरकार के पूर्व अधिकारी हैं और इस बात का कोई उल्लेख नहीं था कि वे किस तरह से बाँध संचालन और संबंधित मामलों के विशेषज्ञ हैं। रिपोर्ट की शुरुआत इस बयान से की गई है कि पिछले 2 सप्ताहों (16-31 अगस्त 2020) में अमरकंटक से भरुच तक संपूर्ण नर्मदा घाटी में भारी बारिश हुई, लेकिन बारिश के दैनिक आँकड़ों का न तो कोई उल्लेख है और न ही विश्लेषण। यदि 16 अगस्त  से बारिश जारी थी तो फि‍र बाँध के गेट खोलने के लिए निगम की नींद 28 अगस्त तक क्यों नहीं खुली?

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रिपोर्ट में ‘सरदार सरोवर बांध’ के ऊपर मध्यप्रदेश स्थित इंदिरासागर, औंकारेश्वर, बरगी, तवा, बारना आदि बाँधों के भी पूरे भर चुके होने का उल्लेख है। हालांकि इनमें से कई बाँध काफी समय पहले ही भर चुके थे, लेकिन इसके बावजूद ‘सरदार सरोवर बांध’ से समय रहते पानी नहीं छोड़े जाने का कोई कारण नहीं बताया गया है।

वास्तव में 21-22 अगस्त को मध्यप्रदेश के सीहोर, खण्डवा, रायसेन, धार, होशंगाबाद, हरदा आदि जिलों में अच्छी बारिश हुई थी और निगम चाहता तो तभी से तीन लाख क्यूसेक पानी छोड़ना शुरु कर सकता था। यदि ऐसा किया जाता तो भरुच शहर और कई गाँवों को बाढ़ से बचाने के साथ ही उपलब्ध जल संसाधन से करीब 85 करोड़ रुपए की बिजली भी बनाई जा सकती थी। कम मात्रा में लम्बे समय तक पानी छोड़े जाने से बाँध के नीचे करीब 150 किमी क्षेत्र में भूजल रिचार्ज के साथ स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र पर भी सकारात्मक प्रभाव होता।

रिपोर्ट में इस थोपी गई बाढ़ से प्रभावित लाखों भरुचवासियों तथा अन्य ग्रामीणों के प्रति संवेदना प्रकट करने के बजाय “भरुच और नर्मदा किनारे के 30 अन्य गाँवों के लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखने” और “बाढ़ के विपरीत प्रभावों से 30 हजार हेक्टर की फसलें बचाने” जैसे आधारहीन दावे भी किए गए हैं।

इस बाढ़ से नर्मदा और अन्य सहायक नदियों से बड़े पैमाने पर मिट्टी कटाव हुआ है। नर्मदा के मुहाने पर स्थित मछली मारने वाले समुदायों को बहुत नुकसान हुआ है। इसके कई और नकारात्मक प्रभाव आगे जाकर दिखाई देंगे। ऐसे में इस अवांछित तथा जबरन थोपी गई बाढ़ और इसके सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय नुकसानों की निष्पक्ष जाँच कर इसके लिए जवाबदेही तय की जानी जरुरी है, अन्यथा ऐसी मानव-निर्मित आपदाएँ लाई जाती रहेंगी और समाज के हाशिए पर जीने वाले कमजोर समुदाय उसकी कीमत चुकाते रहेंगे। (सप्रेस)  

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