वैश्विक पर्यावरण

वर्ष 2025 : प्राकृतिक आपदाओं का घटनाक्रम

इंसानी गतिविधियों ने प्रकृति को इस कदर बेचैन कर दिया है कि अब खुद इंसान ही संकट का सामना कर रहा है। विकास की हड़बड़ी में लगातार बढ़ रहे जलवायु परिवर्तन ने इस बदहाली को और भी बढ़ा दिया है।…

अरावली की परिभाषा अब संवैधानिक सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह की हस्तक्षेप याचिका स्वीकार की

नईदिल्‍ली, 20 जनवरी। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और संरक्षण से जुड़ी अपनी चल रही सुओ मोटो कार्यवाही में हस्तक्षेप की मांग करने वाली दायर एक अर्जी को स्वीकार कर लिया है। नियामक विखंडन और पारिस्थितिक…

अरावली मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम

नई उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति के गठन का आदेश, 20 नवंबर के फैसले पर लगी रोक नई दिल्ली, 29 दिसंबर। अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील और दूरगामी प्रभाव वाले मामले में Supreme Court ने बड़ा हस्तक्षेप…

अरावली बचाने के लिए पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह की सुप्रीम कोर्ट से गुहार, स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह

नई दिल्ली 27 दिसंबर।  देश की प्राचीन और जीवनदायिनी अरावली पर्वतमाला पर गहराते संकट को लेकर प्रसिद्ध पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने न्यायालय से अरावली के संरक्षण के लिए…

अरावली पर बढ़ते खनन संकट के विरुद्ध संकल्प : अरावली पर्वतमाला को बचाने की पुकार

विश्व पर्वत दिवस पर अरावली का संकट राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है। निर्णयों ने पर्वतमाला के बड़े हिस्से को खनन के लिए सौंपने का रास्ता खोल दिया है, जिससे गाँवों की जल–कृषि व्यवस्था, वन्यजीवों का जीवन और पर्यावरणीय…

देश की रीढ़ अरावली : दर्द न जाने कोय

अरावली की जिस पर्वतमाला को बचाने के लिए नब्बे के दशक में समाज के साथ साक्षात सुप्रीम कोर्ट तक आगे आया था, आज उसके हाल बेहाल हैं। तरह-तरह की कोशिशों के बावजूद भारत की इस ‘रीढ़’ को बर्बाद किया जा…

मिट्टी मौन है, पर संकट मुखर : हम कब जागेंगे?

विश्व मृदा दिवस हमें चेताता है कि मिट्टी का संकट केवल पर्यावरण नहीं, मानव अस्तित्व का प्रश्न है। प्लास्टिक, रसायनों और उपेक्षा से खोखली होती धरती को अब पुनर्जीवन चाहिए—केंचुओं की वापसी, जैविक खाद, नमी-संरक्षण और मिट्टी की ओर लौटता…

भोपाल गैस कांड : महिलाएँ अब भी झेल रही हैं अदृश्य ज़हर का असर

21वीं सदी की दुनिया जलवायु संकट, विषैली हवा और औद्योगिक जोखिमों की भयावह सच्चाइयों से घिरी है, जिनका सबसे तीखा असर महिलाओं पर पड़ता है। वैश्विक शोध जहाँ आपदाओं में महिलाओं की मृत्यु दर चौदह गुना अधिक बताते हैं, वहीं…

औद्योगिक ज़हर से जलवायु ज़हर तक : महिलाओं की सुरक्षा अब भी नीतियों के हाशिये पर

2 दिसंबर सिर्फ एक स्मृति-दिवस नहीं, उस सच का आईना है जिसे भोपाल गैस त्रासदी ने उजागर किया था—पर्यावरणीय संकट कभी बराबरी से नहीं चोट पहुँचाते। विषैली हवा, बढ़ती गर्मी, जल-संकट और घरेलू धुएँ का सबसे भारी बोझ आज भी…

चरम मौसम की घटनाएं जानलेवा साबित हो रहा है

भारत में चरम मौसम घटनाओं की रफ्तार भयावह स्तर तक बढ़ चुकी है। हीटवेव, बाढ़, चक्रवात, बादल फटना और बिजली गिरने जैसी आपदाएँ अब लगभग पूरे साल देश के किसी न किसी हिस्से को प्रभावित कर रही हैं। इनकी बढ़ती…