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बीज की मुट्ठी में किसान का भविष्य

बीज की मुट्ठी में किसान का भविष्य
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भारत के बीज उद्योग के विस्तार के साथ खेती के भविष्य से जुड़े कई सवाल भी सामने हैं। नई किस्में, अनुसंधान और तकनीक कृषि की उत्पादकता बढ़ा सकते हैं, लेकिन बीज को केवल बाजार की वस्तु मानना पर्याप्त नहीं। असली कसौटी यह है कि बदलते बीज बाजार में किसान की लागत, जोखिम, विकल्प और अपने बीज पर अधिकार कितना सुरक्षित रहता है।


बीज की मुट्ठी में केवल अगली फसल नहीं होती। उसमें किसान का अगला मौसम, उसके परिवार की रसोई और खेत की अगली उम्मीद भी छिपी होती है। इसीलिए बीज को केवल बाजार में बिकने वाली वस्तु मान लेना खेती के उस लंबे इतिहास को भुला देना है, जिसमें किसान ने बीज बचाया, चुना, बदला और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है।

आज भारत बीज के वैश्विक बाजार में बड़ी छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है। देश की वैश्विक बीज व्यापार में हिस्सेदारी करीब एक प्रतिशत से बढ़ाकर 2035 तक दस प्रतिशत करने का लक्ष्य सामने रखा गया है। बीज उद्योग के मुताबिक देश का बीज कारोबार फिलहाल करीब 3.6 अरब डॉलर का है और 2030 तक पांच अरब डॉलर से अधिक हो सकता है। यह विस्तार अनुसंधान, नई किस्मों और कृषि-तकनीक के लिए अवसर पैदा कर सकता है। लेकिन इसके साथ एक सवाल अनिवार्य है—यदि बीज का बाजार इतना बड़ा होगा, तो किसान का अधिकार कितना बड़ा होगा?

24 सितंबर को नई दिल्ली में फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया के दसवें वार्षिक आमसभा और ‘एफएसआईआई नॉलेज डे 2026’ में बीज उद्योग ने अपनी भविष्य की दिशा रखी। उद्योग की ओर से एक समान राष्ट्रीय नियामकीय व्यवस्था, समयबद्ध मंजूरी और बौद्धिक संपदा अधिकारों को मजबूत करने की जरूरत बताई गई। अनुसंधान में निवेश बढ़ाने और नई किस्मों तथा तकनीकों को किसानों तक तेजी से पहुंचाने पर भी जोर दिया गया।

इनमें से किसी जरूरत को खारिज नहीं किया जा सकता। खेती को बदलते मौसम, बढ़ती आबादी और पोषण की जरूरतों के बीच अधिक उत्पादक और टिकाऊ बनाना है तो विज्ञान और अनुसंधान की भूमिका बढ़ेगी। तिलहन और दलहन जैसी फसलों में उत्पादकता बढ़ाने के लिए नई किस्मों की जरूरत है। कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली, सूखे और अत्यधिक बारिश को सहने वाली तथा बदलती जलवायु के अनुकूल किस्में विकसित करनी होंगी।

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लेकिन यहीं से असली सवाल शुरू होता है।

बीज खेती की कुल लागत का लगभग पांच से सात प्रतिशत हो सकता है, जबकि बेहतर बीज संभावित उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकता है। मगर अधिक उपज और अधिक किसान आय एक ही बात नहीं हैं। खेत में उत्पादन बढ़ जाए और बाजार में कीमत गिर जाए तो किसान की आमदनी बढ़ना जरूरी नहीं। महंगे बीज के साथ खाद, कीटनाशक और सिंचाई का खर्च बढ़ जाए तो अतिरिक्त उपज का लाभ लागत में ही चला जा सकता है।

इसलिए बीज की सफलता को केवल उसकी उपज से नहीं मापा जा सकता। किसान के लिए असली सवाल है—इस बीज से उसका जोखिम कितना घटा, लागत कितनी बढ़ी या घटी और उसकी आमदनी पर क्या असर पड़ा?

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के आनुवंशिकी विभाग के पूर्व निदेशक और राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी के सचिव डॉ. ए.के. सिंह ने सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों और निजी कंपनियों के बीच सहयोग की जरूरत पर जोर दिया है। यह सहयोग जरूरी है। लेकिन सार्वजनिक विज्ञान की भूमिका केवल निजी अनुसंधान के लिए रास्ता आसान करने की नहीं हो सकती। सार्वजनिक अनुसंधान का एक उद्देश्य यह भी होना चाहिए कि उन फसलों और क्षेत्रों पर काम हो जिनमें व्यावसायिक बाजार भले छोटा हो, लेकिन किसानों और खाद्य सुरक्षा के लिए उनका महत्व बड़ा है।

छोटे और सीमांत किसान की जरूरत बड़ी कंपनी की बाजार-गणना से अलग होती है। उसे ऐसी किस्म चाहिए जो उसके खेत, मिट्टी, पानी और मौसम के अनुकूल हो। उसे यह भी जानना है कि खराब मौसम में उस बीज का व्यवहार कैसा होगा। इसलिए नई किस्मों को बाजार में उतारने से पहले स्वतंत्र, बहु-क्षेत्रीय और खेत-स्तरीय परीक्षण जरूरी हैं। परीक्षणों के परिणाम सार्वजनिक होने चाहिए। किसान को यह जानकारी उसकी अपनी भाषा में मिलनी चाहिए कि बीज कहां उपयोगी है, उसकी लागत क्या है और उसकी सीमाएं क्या हैं।

किसान नई तकनीक का विरोधी नहीं है। वह अपने जोखिम का हिसाब जानता है। प्रगतिशील कृषि मंच के राष्ट्रीय संयोजक,किसान और नेशनल फार्मर्स एम्पावरमेंट इनिशिएटिव के संयोजक किशोर जायसवाल का कहना है कि किसान बेहतर बीज तब अपनाता है जब उसे खेत में उसका परिणाम दिखाई देता है। यही बात नीति बनाने वालों को समझनी होगी। किसान को तकनीक से डराने या उसे पिछड़ा समझने के बजाय उसे जानकारी और विकल्प देने की जरूरत है।

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बीज के बाजार में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न बौद्धिक संपदा का है। नई किस्म विकसित करने में वर्षों का अनुसंधान और निवेश लगता है। शोधकर्ता और कंपनियां अपने निवेश की सुरक्षा चाहती हैं। यह अधिकार महत्वपूर्ण है। लेकिन कृषि में बीज केवल प्रयोगशाला में पैदा हुआ उत्पाद नहीं है। किसान समुदायों ने सदियों से बीजों को बचाया और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उन्हें विकसित किया है।

इसलिए बौद्धिक संपदा की रक्षा और किसान के पारंपरिक अधिकारों के बीच संतुलन आवश्यक है। आधुनिक विज्ञान और किसान का पारंपरिक ज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। भारत की कृषि विविधता को बचाने के लिए दोनों का संवाद जरूरी है।

आज जब जलवायु परिवर्तन खेती की अनिश्चितता बढ़ा रहा है, स्थानीय बीजों की विविधता का महत्व भी बढ़ गया है। एक जैसी किस्मों पर अत्यधिक निर्भरता किसी बीमारी, कीट या मौसम की असामान्य घटना के समय बड़ा जोखिम पैदा कर सकती है। स्थानीय बीजों का संरक्षण इसलिए केवल अतीत को बचाना नहीं, भविष्य की कृषि को सुरक्षित करना भी है।

यहीं गांधी की ग्राम स्वराज की दृष्टि प्रासंगिक हो जाती है। स्वराज का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था। उसका अर्थ जीवन के जरूरी साधनों पर स्थानीय समाज की क्षमता और नियंत्रण भी था। किसान यदि हर मौसम में बीज के लिए बाजार पर पूरी तरह निर्भर होता जाए, तो उत्पादन बढ़ने के बावजूद उसकी स्वायत्तता घट सकती है। दूसरी ओर, यदि किसान को गुणवत्तापूर्ण बाजारू बीज के साथ अपने बीज को बचाने, चुनने और इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता भी मिले, तो उसके विकल्प बढ़ते हैं।

बीज नीति का लक्ष्य इसलिए किसान को बाजार से अलग करना नहीं, बल्कि बाजार में उसकी स्थिति मजबूत करना होना चाहिए।

एक समान राष्ट्रीय नियामकीय ढांचा बनाने की बात हो रही है। इसका उद्देश्य मंजूरी की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाना हो सकता है। लेकिन ऐसी व्यवस्था में किसान की आवाज भी शामिल होनी चाहिए। किसान संगठनों, राज्यों, सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों, कृषि वैज्ञानिकों और उपभोक्ता हितों का प्रतिनिधित्व नियामकीय व्यवस्था में होना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात शिकायत और जवाबदेही की है। यदि किसी बीज की गुणवत्ता खराब निकलती है और फसल नष्ट होती है तो किसान को न्याय पाने में वर्षों नहीं लगने चाहिए। शिकायत दर्ज करने, परीक्षण कराने, जिम्मेदारी तय करने और उचित मुआवजा देने की स्पष्ट और समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए। बीज बेचने वाला बाजार लाभ का भागीदार है तो जोखिम की जिम्मेदारी से पूरी तरह बाहर नहीं रह सकता।

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भारत को वैश्विक बीज व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी है तो अनुसंधान और उद्योग के बीच सहयोग बढ़ाना ही होगा। अंतरराष्ट्रीय सहयोग से नई तकनीक और ज्ञान भी आएगा। लेकिन वैश्विक बाजार में सफलता का अर्थ यह नहीं कि हर नई तकनीक हर किसान के लिए उपयोगी होगी। एक बीज किसी क्षेत्र में बहुत अच्छा प्रदर्शन कर सकता है और दूसरे क्षेत्र में नहीं। इसलिए कृषि की विविधता को बाजार की एकरूपता में बदलने से बचना होगा।

2035 के लक्ष्य की सफलता को केवल निर्यात और बाजार हिस्सेदारी से क्यों मापा जाए? यह भी पूछा जाना चाहिए कि कितने छोटे किसानों तक गुणवत्तापूर्ण बीज पहुंचा। कितने किसानों को नई किस्मों की सही जानकारी मिली। खराब बीज की शिकायतों का निपटारा कितने दिनों में हुआ। फसल खराब होने पर किसान को कितनी राहत मिली। सार्वजनिक अनुसंधान में कितना निवेश बढ़ा। स्थानीय बीजों और जैव-विविधता के संरक्षण के लिए क्या किया गया।

यही वे सवाल हैं जो बीज उद्योग की आर्थिक सफलता को किसान की सामाजिक सफलता से जोड़ सकते हैं।

भारत का बीज उद्योग बड़ा हो, भारतीय कंपनियां दुनिया के बाजार में जाएं और देश बीज अनुसंधान का महत्वपूर्ण केंद्र बने—इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। विरोधाभास तब पैदा होता है जब बाजार का विस्तार किसान की निर्भरता बढ़ाने लगे और किसान की अपनी पसंद, जानकारी और अधिकार पीछे छूट जाएं।

बीज की मुट्ठी छोटी है, लेकिन उसमें बहुत कुछ समाया है—खाद्य सुरक्षा, जैव-विविधता, किसान की आजीविका और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य। इसलिए भारत को ऐसा बीज तंत्र चाहिए जिसमें निजी अनुसंधान की गति हो, सार्वजनिक विज्ञान की जिम्मेदारी हो और किसान के अधिकार की रक्षा हो।

बाजार बढ़े, यह जरूरी हो सकता है। लेकिन उससे भी जरूरी है कि किसान की क्षमता बढ़े। उसके पास विकल्प बढ़ें। उसे सही जानकारी मिले। जोखिम में वह अकेला न छोड़ा जाए।

बीज तभी भविष्य का बीज बनेगा, जब उसमें किसान का अधिकार भी सुरक्षित रहेगा।

लेखक का परिचय

कुमार कृष्णन

कुमार कृष्णन स्‍वतंत्र पत्रकार है।

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