दशहरा और दीपावली के बीच उल्लुओं को लेकर प्रचलित अंधविश्वास वन्यजीव संरक्षण के लिए चुनौती बन जाते हैं। बेहद शांत उड़ान और अंधेरे में शिकार करने की अद्भुत क्षमता वाला यह पक्षी चूहों की संख्या नियंत्रित कर फसलों की रक्षा करता है। इसके बावजूद तंत्र-मंत्र और टोने-टोटके के नाम पर इसका शिकार और तस्करी जारी है।
उल्लू को लेकर हमेशा इंसानी समझ और लोक चेतना में एक विरोधाभास रहा है। जहां एक ओर भारतीय संस्कृति और पौराणिक परंपराओं में उल्लू को अत्यंत पूजनीय माना गया है—विशेष रूप से धन और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी के पवित्र वाहन के रूप में — वहीं इस सांस्कृतिक आदर के ठीक विपरीत वास्तविकता यह है कि उल्लू को आज भी बड़ा अशुभ माना जाता है। नतीजा यह है कि यह निशाचर पक्षी प्राकृतिक दुनिया के सबसे उपेक्षित, गलत समझे गए और भयानक शिकार बनने वाले जीवों में शामिल है।
दीवाली में जादू टोने और अंधविश्वास के कारण कई लोग उल्लुओं को मारते हैं और उनकी स्मगलिंग होती है। अपने यूट्यूब चैनल ‘Eco N Energy Talk‘ के एक नए और विशेष एपिसोड में मैंने जानी-मानी वन्यजीव वैज्ञानिक डॉ. प्राची मेहता से बात की जो पुणे स्थित वाइल्डलाइफ रिसर्च एंड कंजर्वेशन सोसाइटी में रिसर्च डायरेक्टर हैं। उन्होंने भारतीय उल्लुओं, विशेष रूप से संकटग्रस्त ‘फॉरेस्ट ऑवेलेट‘ (Forest Owlets) की रहस्यमयी और अनोखी दुनिया के बारे में कई जानकारियां दी हैं।
डॉ प्राची कहती हैं, “उल्लुओं के बार में रिसर्च बहुत कम है। इसके कई कारण हैं उनमें से एक यह है कि इनके अध्ययन के लिए आपको रात में जागकर जंगलों में रहना पड़ता है।”

पूरी दुनिया में उल्लुओं की 240 प्रजातियां पाई जाती हैं और अंटार्कटिका को छोड़कर वह दुनिया के हर महाद्वीप में हैं। भारत में 36 तरह के उल्लू मिलते हैं जो दुनिया में पाई जाने वाली प्रजातियों का करीब 14 प्रतिशत है।
डॉ प्राची कहती हैं कि उल्लू को अशुभ मानकर या उसके मांस के लिए या काले जादू के लिए उसके पंजों को हासिल करने के लिए उन्हें मारा जाता है। वह बताती हैं कि दीवाली के समय यह मांग बहुत बढ़ जाती है। इस संकट से निपटने के लिए, डॉ. प्राची मेहता ने महाराष्ट्र और आसपास के क्षेत्रों में चलाए जा रहे समुदाय-आधारित संरक्षण प्रयासों का खाका पेश किया। इन दुर्लभ पक्षियों की सुरक्षा के लिए स्थानीय आजीविका, वन्यजीव विज्ञान और जन जागरूकता के बीच तालमेल बिठाना बेहद जरूरी है क्योंकि ये प्राणी अशुभ नहीं बल्कि इंसान का मददगार है।
उनके मुताबिक, “जैसे बाघ जानवरों में शीर्ष परभक्षी (Apex Predator) है उसी तरह पक्षियों में उल्लू को शीर्ष परभक्षी माना जाता है। इसका प्रिय आहार चूहे होते हैं और यह चूहों और कीड़ों की संख्या को नियंत्रित करके फसलों को सुरक्षित रखते हैं।”
एक अनुमान के मुताबिक एक उल्लू साल में कम से कम 1000 चूहे खाता सकता है।
प्राची कहती हैं, “इस तरह से फसल को सुरक्षित रख वह हमारे लिए समृद्धि लाते हैं। शायद इसीलिए इसे लक्ष्मी का वाहन भी कहा गया है।”
वैसे वैज्ञानिक रूप से देखें तो उल्लू की एक खासियत यह है कि ये अपने सिर को 260 डिग्री तक घुमा सकते हैं और अपने शिकार पर पैनी नज़र रखते हैं। इनके उड़ने में कोई आवाज़ नहीं होती और इस कारण यह बेहद प्रभावी शिकारी बन जाते हैं।
उल्लुओं से जुड़ी एक और विशेष और दिलचस्प बात है कि वह अपने साथी के प्रति वफादार होते हैं। अपवादों को छोड़ दें तो उल्लुओं की कई प्रजातियां जीवन भर एक ही साथी के साथ रहने (Monogamous) की अनोखी वफादारी निभाती हैं। असल में इस प्राणी के वजूद को आज जो खतरा है वह हमारी इकोलॉजी के लिए अच्छी बात नहीं है और इसके प्रभावी संरक्षण की शुरुआत इंसानी सोच को बदलने से होती है। अंधविश्वास की जगह वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर ही हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि प्रकृति के ये अनोखे रक्षक हमारे आसमान में सुरक्षित रूप से उड़ान भरते रहें।