वैश्विक पर्यावरण स्‍वास्‍थ्‍य

पर्यावरण और स्वास्थ्य की राह : क्यों जरूरी है वनस्पति-आधारित आहार?

पर्यावरण और स्वास्थ्य की राह : क्यों जरूरी है वनस्पति-आधारित आहार?

जलवायु परिवर्तन से निपटने के वैश्विक प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे, जबकि उपभोक्तावादी जीवनशैली ग्रीनहाउस गैसों को और बढ़ा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार पादप-आधारित आहार अपनाना उत्सर्जन घटाने का प्रभावी तरीका है। पेड़–पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थ...

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जलवायु परिवर्तन से निपटने के वैश्विक प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे, जबकि उपभोक्तावादी जीवनशैली ग्रीनहाउस गैसों को और बढ़ा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार पादप-आधारित आहार अपनाना उत्सर्जन घटाने का प्रभावी तरीका है। पेड़–पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थ न केवल पर्यावरण को बचाते हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाते हैं, जिससे स्थायी विकास की राह सुगम होती है।


ज्ञान चंद पाटनी

जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार प्रयास हो रहे हैं, लेकिन कोई खास सफलता नहीं मिल पा रही। आधुनिक विकास की परिभाषा और उपभोक्तावाद के चलते ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना अब भी बड़ी चुनौती है। इस दौर में पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली को अपनाना जरूरी हो गया है। इसके लिए आम जन को खुद भी जागरूक होना पड़ेगा। खानपान की आदतों को पर्यावरण अनुकूल बनाकर हम जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने में अपना योगदान दे सकते हैं। इस बात को समझना होगा कि पेड़-पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देने से जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटना संभव है और यह इंसानों के स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर है। 

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मांस और अन्य पशु उत्पादों की बजाय वनस्पति-आधारित आहार अपनाने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में काफी कमी आती है। इससे वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इसके साथ ही ऐसे आहार से हृदय रोग, टाइप 2 मधुमेह जैसे रोगों का जोखिम भी कम होता है, जिससे इंसानी सेहत में भी सुधार होता है।

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असल में पशु ग्रीनहाउस गैसों के बड़े स्रोतों में से एक हैं। मवेशी मीथेन जैसी गैसों का उत्सर्जन करते हैं, जो तापमान में कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना अधिक वृद्धि करती हैं। मीथेन का उत्पादन पशुओं की सामान्य पाचन प्रक्रिया का हिस्सा है और पशु आधारित खाद भी मीथेन उत्सर्जन को बढ़ावा देती है।

पेड़ पौधे यानी पादप आधारित खाद्य पदार्थों के उत्पादन में पशु आधारित उत्पादों की तुलना में कम भूमि, कम पानी और कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम होता है। वि​भिन्न रिपोर्टों से यह भी पता चलता है कि 2050 तक अगर मांस और डेयरी की खपत में उल्लेखनीय कमी आ जाए और लोग केवल पादप-आधारित खाद्य पदार्थों को अपनाएं, तो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 70% तक की आश्चर्यजनक कमी हो सकती है।

पादप आधारित आहार एक संतुलित और पौष्टिक आहार माना जाता है, जो शरीर को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है। इस आहार में फलों, सब्जियों, दालों, मेवों और साबुत अनाज की प्रचुर मात्रा होती है, जो शरीर को कैंसर, उच्च रक्तचाप और मोटापे जैसी बीमारियों से बचाते हैं।  

 कई प्रमुख रिपोर्टों और सर्वेक्षणों से पता चलता है कि पादप आधारित आहार अपनाने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है और यह प्रवृत्ति भविष्य में और भी तेज हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थान पादप आधारित आहार को जलवायु परिवर्तन से लड़ने में एक प्रभावी उपाय मानते हैं। पशु आधारित उत्पादों के कारण पैदा होने वाली मीथेन को कम करने के लिए न्यूजीलैंड और डेनमार्क जैसे कुछ देशों ने कर नीति भी लागू करने की योजना बनाई है, ताकि लोग मांस की बजाय पादप आधारित आहार की ओर बढ़ें। पर्यावरणीय हितों के कारण विश्वभर में शाकाहार ही नहीं, वीगन आहार की तरफ भी झुकाव बढ़ रहा है। वीगन आहार एक ऐसा शाकाहारी आहार है जिसमें केवल पेड़-पौधों से प्राप्त खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं। इसमें कोई भी पशु-उत्पाद जैसे मांस, मछली, डेयरी (दूध, दही, पनीर), अंडे और शहद आदि शामिल नहीं होते। यह आहार पशु-आधारित पदार्थों से मुक्त होता है।    

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इसमें दोराय नहीं है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए पशु आधारित आहार की बजाय पादप आधारित आहार को बढ़ावा देना होगा। पशु उत्पादों पर सब्सिडी को कम करने के साथ फलों, अनाज और सब्जियों की खेती को बढ़ावा देना जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य दोनों के लिहाज से आवश्यक है।

पेड़—पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देकर न केवल पर्यावरण और जलवायु को संरक्षित किया जा सकता है बल्कि मानव स्वास्थ्य में भी सुधार किया जा सकता है। इसके जरिए प्राकृतिक संसाधनों की बचत, पर्यावरण संरक्षण तथा स्वास्थ्य सुधार संभव है। इसलिए, सरकारों, नीति निर्माताओं और समाज को इस दिशा में सार्थक कदम उठाने चाहिए। जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए सरकारों को तो सक्रियता दिखानी ही होगी, आम आदमी को भी इस कार्य में अपना योगदान देना होगा।

ज्ञान चंद पाटनी पिछले साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय है।

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