प्रकृति, संस्कृति और समाज के संतुलित भविष्य के लिए भू-सांस्कृतिक सम्मेलन में जारी हुआ जन-घोषणापत्र
नई दिल्ली। प्रकृति, संस्कृति और समाज के संतुलित भविष्य के लिए देश के विभिन्न भू-भागों से जुटे किसान, जल-संरक्षक, ग्रामीण कार्यकर्ता, महिलाएं, युवा, वैज्ञानिक, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, गांधीवादी-सर्वोदय कार्यकर्ता और चिंतकों ने स्थानीय ज्ञान, समुदाय की भागीदारी और प्रकृति के साथ संतुलित विकास को केंद्र में रखने का संकल्प लिया। हरिजन सेवक संघ, नई दिल्ली में 11 से 13 सितंबर तक आयोजित तीन दिवसीय भू-सांस्कृतिक सम्मेलन के समापन पर जारी जन-घोषणापत्र में धरती, जल, जंगल, जमीन, मिट्टी, नदियों, जैव-विविधता और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा को जन-जीवन का केंद्रीय विषय बनाने पर जोर दिया गया।
सम्मेलन में प्रतिभागियों ने कहा कि असीमित भौतिक लालच और प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से जल, जंगल, जमीन, नदियों, मिट्टी और जैव-विविधता पर दबाव बढ़ रहा है। प्रकृति और संस्कृति से मनुष्य का संबंध कमजोर होना केवल पर्यावरण का संकट नहीं, बल्कि जीवन, समाज और भविष्य का संकट है। हालांकि, देश के विभिन्न हिस्सों में समुदायों द्वारा किए जा रहे प्रयास यह दिखाते हैं कि स्थानीय समाज अपनी धरती के लिए खड़ा हो तो परिवर्तन संभव है।
घोषणापत्र में चंबल में बंदूक छोड़कर खेती और हरियाली की राह अपनाने वाले लोगों, मेवात में पानी के लिए काम कर रही महिलाओं और अरवरी नदी को पुनर्जीवित करने वाले समुदायों के अनुभवों को ऐसे उदाहरणों के रूप में रेखांकित किया गया, जिनसे स्थानीय स्तर पर संकटों के समाधान की राह निकलती है। अरवरी संसद के माध्यम से विकेंद्रीकृत लोकतंत्र के प्रयोग को भी समुदाय की सामूहिक पहल का उदाहरण बताया गया।
‘धरती बचेगी तो समाज और संस्कृति बचेगी’
घोषणापत्र में कहा गया कि जल, जंगल, जमीन, मिट्टी, नदियां, पहाड़, जीव-जंतु और जैव-विविधता को केवल संसाधन के रूप में नहीं देखा जा सकता। ये मानव जीवन के आधार हैं। विकास की ऐसी दृष्टि जरूरी है जिसमें प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु न हो और विकास के प्रत्येक निर्णय में स्थानीय जल, भूमि, पर्यावरण, जैव-विविधता तथा समुदायों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को महत्व दिया जाए।
जन-घोषणापत्र में स्पष्ट कहा गया कि ‘धरती बचेगी तो समाज बचेगा; समाज बचेगा तो संस्कृति बचेगी।’ इसी सोच के आधार पर विकास की दिशा तय करने की जरूरत बताई गई।

86 भू-सांस्कृतिक क्षेत्रों की अवधारणा को गांवों तक ले जाने पर जोर
सम्मेलन में भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता को समझने के लिए ‘86 भू-सांस्कृतिक क्षेत्रों’ की अवधारणा को महत्वपूर्ण आधार बताया गया। घोषणापत्र में कहा गया कि भारत की हर धरती एक जैसी नहीं है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी मिट्टी, जलवायु, जल-व्यवस्था, खेती, वनस्पति, लोकज्ञान, जीवन-पद्धति और संस्कृति है। इसलिए विकास की दिशा भी स्थानीय प्रकृति और संस्कृति को समझकर तय होनी चाहिए।
सम्मेलन ने भू-सांस्कृतिक मानचित्र को शोध की सीमाओं से निकालकर गांवों, पंचायतों, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सामाजिक संगठनों और युवाओं के लिए उपयोगी जन-उपकरण बनाने का संकल्प लिया। इसके लिए स्थानीय धरती को समझने और उसके अनुरूप विकास की दिशा तय करने की जरूरत रेखांकित की गई।
धरती पर काम करने वालों के अनुभव को जीवित ज्ञान-संपदा माना
घोषणापत्र में कहा गया कि देश के अनेक हिस्सों में किसान, महिलाएं, ग्रामीण समुदाय और कार्यकर्ता अपने श्रम से जल बचाने, जंगल और नदियों को पुनर्जीवित करने, खेती सुधारने और गांवों में खुशहाली लाने का काम कर रहे हैं। इनके अनुभव को भारत की ‘जीवित ज्ञान-संपदा’ बताते हुए ऐसे प्रयासों के दस्तावेजीकरण, सम्मान और आपसी आदान-प्रदान की आवश्यकता बताई गई।
इन अनुभवों को भू-सांस्कृतिक मानचित्र से जोड़कर देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने का भी संकल्प लिया गया, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों के स्थानीय प्रयोगों और ज्ञान से व्यापक समाज लाभ उठा सके।
जल, जमीन और खेती को बाजार की वस्तु भर न मानने की अपील
जन-घोषणापत्र में जल और जमीन को केवल बाजार की वस्तु मानने के बजाय उनसे जुड़े जीवन, श्रम, आजीविका और संस्कृति को देखने की जरूरत पर जोर दिया गया। किसान को केवल उत्पादन और बाजार के आंकड़ों तक सीमित न रखने की बात कही गई। जमीन, पानी, मिट्टी, बीज, पशुधन, श्रम और संस्कृति को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ माना गया।
सम्मेलन ने ऐसी कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का संकल्प लिया, जो जल-सुरक्षित, मिट्टी-संरक्षक, जैव-विविध और स्थानीय समुदायों के लिए टिकाऊ हो।
विकास परियोजनाओं के प्रभाव का समग्र आकलन जरूरी
सम्मेलन में बड़े डेटा सेंटर, औद्योगिक परियोजनाओं और अन्य विकास कार्यों से भूमि और जल के उपयोग पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर किसानों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चिंताओं तथा अनुभवों पर भी चर्चा हुई। घोषणापत्र में कहा गया कि विकास जरूरी है, लेकिन किसी परियोजना का मूल्यांकन केवल निवेश, उत्पादन और आर्थिक वृद्धि के आधार पर नहीं किया जा सकता।
विकास की प्रत्येक परियोजना में जल, जमीन, खेती, जंगल, जैव-विविधता, स्थानीय समुदाय और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ने वाले प्रभाव का गंभीर आकलन जरूरी बताया गया। इसके लिए विज्ञान, कानून, स्थानीय अनुभव और जनभागीदारी पर आधारित विकास-संवाद को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया।
शिक्षा को स्थानीय प्रकृति और संस्कृति से जोड़ने की पहल
घोषणापत्र में नई पीढ़ी को प्रकृति के बारे में केवल किताबों के माध्यम से नहीं, बल्कि अपनी धरती से जुड़कर सीखने के अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत बताई गई। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में स्थानीय नदी, तालाब, जंगल, खेती, मिट्टी, जैव-विविधता और सांस्कृतिक विरासत को शिक्षा से जोड़ने की बात कही गई।
सम्मेलन का मानना रहा कि विद्यार्थियों को अपने ज्ञान को धरती और समाज के वास्तविक काम में लगाने का अवसर मिलना चाहिए। इसी संदर्भ में शिक्षा के लिए यह दृष्टि सामने रखी गई कि ‘शिक्षा सिर में ज्ञान, हाथों में श्रम और मन में संवेदना पैदा करे।’
युवाओं से रचनात्मक सामाजिक आंदोलन से जुड़ने का आह्वान
घोषणापत्र में युवाओं की भूमिका को भी विशेष महत्व दिया गया। इसमें ऐसे युवा आंदोलन की आवश्यकता बताई गई, जिसमें आनंद, शांति, सत्य, श्रम और रचनात्मकता को शक्ति बनाया जाए। युवाओं से पढ़ने, सीखने, शोध करने, रचना और निर्माण करने तथा अन्याय के विरुद्ध अहिंसक और सत्याग्रही ढंग से खड़े होने का आह्वान किया गया।
युवाओं से अपनी ज्ञान-क्षमता, समय और जीवन-शक्ति का एक हिस्सा अपनी धरती, समाज और साझा भविष्य के लिए समर्पित करने की अपील की गई। घोषणापत्र में कहा गया कि ‘युवा केवल भविष्य नहीं, आज के परिवर्तन के सहभागी हैं।’
विकेंद्रीकृत लोकतंत्र और स्थानीय भागीदारी पर जोर
सम्मेलन के साझा संकल्प में विकेंद्रीकृत लोकतंत्र और स्थानीय समुदायों की निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी को मजबूत करने की बात भी शामिल की गई। साथ ही प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने तथा स्थानीय संरक्षण प्रयासों को मजबूत करने का संकल्प लिया गया।
जन-घोषणापत्र में कहा गया कि धरती, जल, जंगल, जमीन और जैव-विविधता की रक्षा को जन-जीवन का केंद्रीय विषय बनाया जाएगा। भू-सांस्कृतिक मानचित्र को स्थानीय विकास, शोध और जन-शिक्षा का उपयोगी उपकरण बनाया जाएगा। किसानों, महिलाओं, युवाओं और धरती पर काम करने वाले समुदायों के ज्ञान और अनुभव को पहचानने, दर्ज करने और साझा करने के प्रयास किए जाएंगे।
सम्मेलन ने प्रकृति और संस्कृति को विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की शिक्षा से जोड़ने, युवाओं को रचनात्मक और शांतिपूर्ण सामाजिक कार्य से जोड़ने तथा विकास संबंधी निर्णयों में विज्ञान, कानून, स्थानीय ज्ञान और समुदाय की भागीदारी को महत्व देने का संकल्प भी लिया।
इस अवसर पर पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह, सत्यानारायण बुल्लीसे्टटी, एड. विराग गुप्ता, प्रो. डी. एन. सिंह, डॉ. आर. डी. त्रिपाठी, प्रमोद देशमुख, अनिकेत लोहिया, प्रो. मोहम्मद लतीफ खान, प्रो. रितेश कुमार चौधरी, प्रो. दिनेश मिश्रा, रीटा रॉड्रिक्स, विनोद रापतवार, प्रो. भरतराज, ब्रह्मा बोधी, एडवोकेट सेन, इंदिरा खुराना, अनिता चौहान, प्रो. के.एल श्रीवास्तव और डॉ. सुमंत पांडे आदि विशेष रूप से उपस्थित थे।