सुरेश भाई

आंकडे बताते हैं कि कोविड-19 महामारी के दौर में लगे लॉकडाउन में गंगा और यमुना सरीखी उसकी सहायक नदियां निर्मल हो गई थीं। इस भुलावे में रहकर कि महामारी के चलते गंगा साफ हो जायेगी, यह सवाल नागरिकों के जिन्दा रहने व न रहने पर भी खडा है। क्योंकि मनुष्य और जीवधारियों की मौजूदगी को ही पर्यावरण का सुखद अहसास होता है।

मोक्षदायिनी गंगा गौमुख से चलकर 2550 किलोमीटर दूर गंगासागर में समुद्र (बंगाल की खाडी) से मिल जाती हैं। वहां गंगा का ऐसा अनुपम दृश्य है कि समुद्र के बीच लगभग 500 मीटर दूर तक गंगा की लहरें देखने को मिलती हैं।

पुराणों में गंगा के धरती पर पहुंचने की कहानी बहुत ही दिलचस्प है, लेकिन आज के समय में मान सकते हैं कि उस समय धरती-पुत्रों के रूप में जन्मे मानवों ने कुछ ऐसा किया होगा कि उनकी आत्मा को स्वर्ग में स्थापित करने के लिये भगीरथ प्रयास से ही मोक्ष मिले। कालान्तर में यह आस्था बन गयी, जिसमें दुनियाभर के लोग गंगाजल को माथे पर रखकर पूजा करते हैं।

अब जिस तरह से मनुष्य अपनी भोगवादी जीवनशैली को जल, जंगल, जमीन की कीमत पर खडा कर रहा है और बेपरवाह होकर इसके शोषण पर ही अपने को संपन्‍न समझने लगा है, उससे बहुत कम समय में गंगा और अन्‍य नदियां अपना पवित्र जल तक देने से इंकार करने वाली हैं।

वैसे गंगा का स्रोत हिमालय में है जहां से गंगा विशुद्ध रूप में केवल आंखों से देखी जा सकती हैं, लेकिन आधुनिक विकास के नाम पर हो रहे भारी निर्माण कार्य से उदगम की जैव-विविधता खतरे में पड गयी है। इसके दुष्प्रपरिणामों को जानते हुये भी कुछ समय की सुख-सुविधाओं की खातिर गंगा की छाती पर सुरंग-बांध, सडकों का मलवा, पेडों का कटान, दुर्लभ वन्य-प्रजातियो का शिकार, क्षमता से अधिक मनुष्यों की आवाजाही और इस नाम पर बन रहे कूडे के ढेर बेहिचक नदियो में डाले जाते हैं। फिर कोई आकर सांकेतिक रूप में इसकी सफाई करके अपनी फोटो फेसबुक, वाटसऐप आदि में डाल देते हैं। दूसरे दिन पता चलता है कि जो कूडे का ढेर और निर्माण का मलवा एक किनारे पर एकत्रित हुआ था वह थोडी दूर, आगे ले जाकर गंगा में ही विसर्जित कर दिया गया है। इसके बाद यहां जिलाधिकारी की अध्यक्षता में बैठक हुई जिसमें आदेश दिया गया कि भागीरथी में गिर रहे गंदे नाले व सीवर की निकासी रोकी जाय।

वर्तमान में दुनियां में आयी महामारियों की तरह कोविड-19 ने भारत में अपने पैर पसार दिये हैं। मरीजो की संख्या लाखों में हो रही है और लोग 24 मार्च से अब तक कई लॉकडाउन पूरे कर चुके है। इसके बाद, जून से अनलॉक भी प्रारम्भ हो गया है। कई लोगो ने बयान दिया है कि लॉकडाउन चलता रहे, तो गंगा साफ हो जायेगी। लेकिन इस दौरान गंगा कितनी साफ हुई, यह जानना जरूरी है।

उत्तराखण्ड की बात कहूं तो गंगा और इसकी सहायक नदियों के किनारे भारी निर्माण कार्यो से निकला लाखों टन मलवा गंगा में बेहिचक डाला गया है। निर्माण मजदूरों के लिए शौचालय कहीं दिखाई नहीं देते। उत्तरकाशी शहर में लॉकडाउन के दौरान शौचालय के गडडों में जमा भारी मलमूत्र को गंगा में उडेला गया था। इसकी फोटो और वीडियो ‘गंगा विचार मंच’ से जुडे सामाजिक कार्यकर्ता लेाकेन्द्र बिष्‍ट ने सोशल मीडिया पर डाली है। इसमें देखा गया है कि भागीरथी का रंग घंटों तक मलमूत्र जैसा दिखाई दिया है, जो आगे मनेरी भाली के बैराज में इकत्रित हुआ। बाद में इसको साफ करने के लिये बांध का गेट खोलकर आगे बहाया गया।

अरूणाचल प्रदेश की दिबांग घाटी घनी जैव-विविधता के लिये मशहूर है। यहां पर भी जल-विद्युत परियोजनाओं के लिये पौने तीन लाख से अधिक हरे पेडों को काटने की स्वीकृति दी जा रही है। इस घाटी में लगभग 1150 हेक्टेयर वनभूमि खत्म हो जायेगी जिसमें रहने वाले जीव-जन्तु, पेड-पौधे, तितलियां, स्पॉइडर, सांप, स्तनधारी आदि की सैकडों प्रजातियां अपना अस्तित्व खो देंगी। यहां आसपास के दो दर्जन गांव में रहने वाले लगभग 14 हजार आदिवासी बेजमीन हो जायेंगे। यह क्षेत्र भूकम्प और बाढ के लिये संवेदनशील भी है।

लॉकडाउन के समय लोगों ने जो भी कचरा बनाया है वह जैसा-का-तैसा गंगा में विसर्जित हुआ है। इस दौरान सफाई कर्मियों को संक्रमण से बचाना था, इसलिये जगह-जगह गंदगी के ढेरों को गंगा में ही डाला गया। यह इसलिये भी हुआ कि गंगा के किनारे बसे शहरों व गांवों के पास अपना कूडा फेंकने की कोई जगह ही नहीं थी। इसलिये सार्वजनिक स्थान, जो बैठकों और रामलीला के उपयोग में आते हैं, में लम्बे समय तक कूडे को जमा किया जाता रहा है। यह स्थिति अभी कई स्थानों पर बरकरार है। लॉकडाउन के दौरान पहाडों में बारिश बहुत हुयी है। इसलिये इस समय जंगल आग से बच गये हैं, लेकिन प्रथम लॉकडाउन तक गंगा के किनारे वनों का कटान और खनन बहुत तेजी से चल रहा था। जो पॉलीथीन पहले बंद हो गयी थी, वह भी लोगों के हाथों में वापस आ गयी है।

इस भुलावे में रहकर कि महामारी के चलते गंगा साफ हो जायेगी, यह सवाल नागरिकों के जिन्दा रहने व न रहने पर भी खडा है। क्योंकि मनुष्य और जीवधारियों की मौजूदगी को ही पर्यावरण का सुखद अहसास होता है। लॉकडाउन का सबक यह है कि घरों में मानवबंदी के कारण शहरो में कचरा पैदा करने वाले कारखाने भी बंद रहे हैं। अब इससे सबक लिया जाना चाहिये कि गंगा की सफाई के लिये बजट आवंटन करने की बजाए प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों पर नियंत्रण करना होगा, मलमूत्र और जैविक कचरा जल संरचनाओ में डालने से रोकना होगा। (सप्रेस) 

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