डॉ. ओ.पी.जोशी

दुनियाभर को प्राणवायु यानि ऑक्सीजन मुहैय्या करवाने वाले अमेजान के जंगलों में लगी आग इन दिनों सर्वत्र चर्चा और चिंता का विषय बनी हुई है। अमीर देशों के ‘ग्रुप-7’ और ‘ग्रुप-20’ जैसे वैश्विक मंचों तक को हलाकान करने वाली इस आग को लेकर कहा जा रहा है कि अमेजान को आग के हवाले करने में वहां के मौजूदा राष्ट्रपति जेर बोल्सोनारो की औद्योगिक विकास की हवस जिम्मेदार है। दूसरी तरफ, राष्ट्रपति बोल्सोनारो का कहना है कि इसमें वहां काम कर रहे एनजीओ की प्रसिद्धि पाने की ललक का हाथ है। सवाल है कि कैसे लगती है ऐसी भीषण आग और क्या होते हैं उसके नतीजे?

दुनिया के सबसे बड़े अमेजन के वर्षा-वन अपनी प्राकृतिक नमी के कारण आमतौर पर आग के लिए प्रतिरोधी होते हैं, परंतु शुष्क मौसम होने से वहां जून से अक्टूबर तक आग लगती रहती है। इस वर्ष भी 13 अगस्त से लगी आग अब तक 75 हजार से भी अधिक स्थानों तक फैल चुकी है। जीवधारियों के श्वसन के लिए जरूरी प्राणवायु (ऑक्सीजन) का 20 प्रतिशत भाग इन्हीं वर्षा-वनों द्वारा प्रदान किये जाने के कारण इन्हें ’’विश्व का फेफड़ा’’ भी कहा जाता है। अमेजन के वर्षा वन लगभग एक अरब एकड़ में फैले हैं एवं लेटिन-अमरीका के नौ देश (ब्राजील, बोलिविया, कोलंबिया, गिनी, इक्वाडोर, पेरू, सूरीनाम व वेनेजुएला) इनसे जुड़े हैं। इन वर्षा-वनों का सबसे अधिक क्षेत्र ब्राजील में है जहां इस वर्ष लगभग 78,000 अग्निकांड हुए हैं जिनमें से  आधे वर्षा-वनों में पाये गये। मौजूदा आग की गंभीरता इसी बात से लगाई जा सकती है कि वहां प्रति मिनट तीन फुटबाल के मैदानों के बराबर क्षेत्रों में आग फैल रही है।

ब्राजील तथा बोलिविया के बाद यह आग और आगे तक फैल गयी है तथा इससे वर्षा-वन का 9,50000 हेक्टर क्षेत्र नष्ट हो गया है। ब्राजील के साओ-पाउलो तथा अन्य शहरों में आग का धुंआ फैल गया है जो हवा के साथ अन्य देशों में भी फैलेगा। वनों की आग से पैदा धुंए में विषैली गैसें तथा जहरीले पदार्थों के बारीक कण पाये जाते हैं। विषैली गैसों में कार्बन डाय-ऑक्साइड तथा कार्बन मोनो-ऑक्साइड, नाइट्रोजन-ऑक्साइड्स, मीथेन तथा हाईड्रो- कार्बन्स प्रमुख हैं। ब्राजील के ‘अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र’ ने इस आग से पैदा धुएं को स्थानीय पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी-तंत्र (इकोसिस्टम) के लिए आपदा बताया है। अमेरीकन एजेंसी ‘नासा’ (नेशनल एरोनाटिक स्पेस एडमिनिस्टेशन) के अनुसार मानवीय हस्तक्षेप से पैदा हुई यह आग वैश्विक कार्बन संतुलन को बिगाडे़गी। कुछ लोग वहां के राष्ट्रपति जेर बोल्सोनारो की पर्यावरण विरोधी नीतियों को भी इसका कारण मान रहे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति ने जी-7 शिखर सम्मेलन में इसे एक अंतरराष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति बताया है।

वर्षा-वन में फैली यह आग ‘शिखर-आग’ (क्राउन फायर) है। यह पेड़ों की ऊपरी शाखाओं तथा पत्तियों से मिलकर बनी छतरी (केनोपी) में लगकर एक-से-दूसरे पेड़ तक फैलती है। वनों में वैसे भूतल-आग (ग्रांउड फायर) तथा सतही-आग (सरफेस फायर) भी लगती है जो वन के धरातल पर फैले सूखे पदार्थांे को जला देती है। सतही आग में कभी-कभी लपटें भी पैदा हो जाती हैं। सामान्यतः आग का प्रभाव फैले हुए क्षेत्र, तीव्रता, ज्वलनशील पदार्थ की गुणवत्ता, मौसम तथा भौगोलिक स्थिति (टोपोग्राफी) पर निर्भर रहता है।

वर्षोंं से आग विश्व पर्यावरण का एक हिस्सा रही है, जो प्राकृतिक या मानवीय कारणों से लगती है। आकाशीय विद्युत, ज्वालामुखी का फटना तथा सूखे तनों की रगड़ या घर्षण (बांस में) आदि इसके     प्राकृतिक कारण हैं। मानवीय कारणों में प्रमुख हैं, विकास कार्य, जैसे-बांध, सड़क, राजमार्ग, विद्युत या जल-प्रदाय पाईप लाईन एवं विमानतलों का निर्माण आदि। कई देशों में वन एवं पर्यावरण के कानून सख्त होने से जब किसी निर्माण कार्य हेतु पेड़ काटने की अनुमति नहीं मिलती तो गुपचुप तरीके से निर्धारित क्षेत्र में आग लगवाकर उसे प्राकृतिक कारण बतलाकर अपना कार्य सिद्ध कर लिया जाता है। ग्वाले, चरवाहे या वन विभाग के कर्मचारी जब भूल से बीड़ी-सिगरेट का कोई जलता टुकड़ा फेंक देते हैं तो वह भी आग का एक कारण बन जाता है। वन क्षेत्र में पिकनिक मनाने गये लोगों के भोजन आदि पकाने में की गयी लापरवाही भी आग को जन्म देती है। वैसे प्रकृति ने कुछ पेड़ों में ऐसी विशेषताएं या अनुकूलन दिये हैं जिससे या तो वे आग से बच जाते हैं या आग के बाद फिर पैदा हो जाते हैं। सिकोईया (दुनिया के ऊंचे पेड़), ओक (बांज) तथा चीड़ की कुछ प्रजातियों की छाल आग प्रतिरोधी होती है। आस्ट्रेलिया में यूकोलिप्टस की कुछ प्रजातियों में भूमिगत प्रमुख कलिकाएं (डारमेंट-बड्स) पायी जाती हैं जो आग के बाद नई शाखाओं को जन्म देती हैं। यहीं पर फैली कुछ झाडियों में भी इसी प्रकार की रचनाएं (लिग्नोट्यूबर) पायी जाती हैं।

ज्यादातर वैज्ञानिक वनों की आग को हानिकारक ही मानते हैं। इससे पैदा विषैली गैसें व कणीय पदार्थ वायु प्रदूषण पैदा करने के साथ-साथ मौसम व जलवायु को भी प्रभावित करते हैं। जैव-विविधता घटने के साथ शाकाहारी पशुओं का चारा समाप्त हो जाता है एवं कई पक्षियों के घोंसले, अंडे एवं बच्चे समाप्त हो जाते हैं। पादप अनुऋमण तथा परितंत्र का विकास भी रूक जाता है। भूमि क्षरण (इरोजन) तथा घसान की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार नियंत्रित आग से अनचाहे पौधे समाप्त हो जाते हैं तथा मिट्टी में कुछ पोषक पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है।

आग से लाभ-हानि पर कुछ भी विवाद हो, परंतु सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि उपलब्ध संसाधनों से इस पर तुरंत काबू पाया जाए। कई देशों की सरकारों ने वनों को सरकारी सम्पत्ति मानकर वहां के वनवासियों को शरणार्थी बना दिया है। इस हालत में आग लगने पर वे वनों में जाते ही नहीं हैं एवं आग फैलती रहती है। अतः यह जरूरी है कि वनवासियों को या आसपास के गांवों के रहवासियों को विश्वास में लेकर सरकारें वन सुरक्षा समितियां बनाएं एवं वनों को बचाने की जिम्मेदारी उन्हें प्रदान की जाए। शुष्क मौसम प्रारंभ होने के पूर्व वन क्षेत्र में फैले सूखे पदार्थों को एकत्र कर उनके उपयोग की कोई योजना भी आग के नियंत्रण में एक अच्छा प्रयास हो सकता है।

वनों की प्रकृति के अनुसार अग्नि-रेखाएं (फायर लाईन) तथा जलाशय भी बनाये जाने चाहिये। अग्नि-रेखाएं वे स्थान होती है जहां पेड़ काट दिये जाते हैं ताकि आग का फैलाव न हो। जलाशय भूमि में नमी बनाये रखते हैं जिससे भूतल तथा सतही-आग की सम्भावनाएं कम हो जाती हैं। वर्तमान समय में हवाई जहाज, हेलिकाप्टर तथा ड्रोन का उपयोग भी वनों की आग के नियंत्रण में किया जाने लगा है। ब्राजील के वर्षा-वन में फैली आग से सबक लेकर दुनिया के अन्य देश अपने वनों को आग से बचाने की ठोस योजनाएं बनायें। वन तो हर देश के फेफड़े ही होते हैं, उन्हें बचाना सबसे ज्यादा जरूरी है। (सप्रेस)                    

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