कमला भसीन  : स्‍मृति शेष

अंजना त्रिवेदी

अपने आसपास कुछ व्यक्तित्व ऐसे रहते हैं जो जीवन के कई पाठ सिखाते चलते हैं। वे स्वयं एक किताब होते हैं। ऐसी किताब जिसके हर पृष्ठ पर जीवन की आशाएं, उमंग, कामयाबी और बहनापा हो। बहनापा में कोई दिखावा नहीं, बल्कि जज्बा हो दुनिया को बदलने का। नारीवादी कमला भसीन और कल्पना मेहता ऐसे ही व्यक्तित्वों में शुमार हैं।

सामाजिक क्षेत्र में काम के मेरे शुरुआती वर्ष 1997 में ‘सहेली’ संस्था की संस्थापक कल्पना मेहता ने कमला भसीन से मेरी पहचान कुछ यूँ करवायी। उन्होंने कहा “नारीवादी महिलाओं की युवा पीढ़ी मैं इंदौर में खड़ा कर रही हूँ। इनमें से एक यह भी है।’ कमला जी ने मेरे सामने कहा “हम युवा लडकियों को आगे तो लाते हैं, लेकिन ये शादी होते ही “ए जी,” “ओ जी,” “इनको ये सब पसंद नहीं है” कहकर कट लेती हैं,  इसलिए आजकल मैं ऐसा नहीं करती हूँ।” कमला जी के चेहरे पर थोड़ा गुस्सा और चिढ़ के भाव थे।

उसी बैठक में ‘सर्वोदय प्रेस सर्विस’ के संपादक महेंद्र भाई भी मौजूद थे। उन्होंने कहा “आप पुरुषों के विरोध में युवा महिलाओं की फौज क्यों खड़ा करना चाहती हो?” इस बात पर दो नारीवादी महिलाओं और  गाँधीवादी महेंद्र भाई के बीच तीखी बहस छिड़ गयी। महेंद्र भाई गाँधी विचारों से समाज को बनाने की वकालत कर रहे थे, तो कल्पना और कमला जी नारीवादी दृष्टिकोण से समाज बनाने की पैरवी कर रही थीं। मैंने पहला कदम ही बाहर रखा था, इन तीनों की तीखी बहस का मतलब कुछ समझ में नहीं आया।

मैं, पहली बार अपने पारम्परिक घर से निकली थी। जहां चारों ओर सब कुछ नया-नया था। नये लोग, नयी विचारधारा। जिस पारम्परिक परिवार से मैं आ रही थी, उसमें छुआछुत, भगवान को भोग लगाये बिना खाना नहीं खाना, बाहर के कपड़ों में रसोईघर में आने की मनाही जैसे चलन थे। ऐसे रूढ़िवादी घर से एकदम खुले वातावरण में आने से कुछ अजीब लग रहा था। अजीब यह था कि मेरे घर में ना तो इतना खुलापन था, न ही हम यह मांग कर सकते थे कि मैं, एक वयस्क हूँ और मेरे निर्णय मैं ही लूंगी। कालेज के अंतिम पडाव तक कपड़ों का चयन भी मां -पिताजी की प्रसंद से ही होता रहा।

घर के सारे छोटे-बड़े निर्णय भाई और पिता ही कर रहे थे। मुझे कहाँ जाना है? क्या पहनना है? कितना पढ़ना है? कौन – सी नौकरी करनी है? किससे शादी करना है आदि। कुछ निर्णयों को बचपन से लड-झगड़कर बदला, किन्तु बडे बुनियादी बदलावों की हिम्मत खुद के अंदर से ही नहीं आ रही थी। जब अपने आप से बात करती थी तो समझ आता था – “हाँ, यह गलत हो रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है? यह कुछ समझ में नहीं आता था, किन्तु बोलूंगी कैसे?”

कल्पना मेहता की पहल पर बना ‘मानसी स्वास्थ्य संस्थान’ जो कि वैकल्पिक इलाज पर इंदौर में अपने काम की शुरुआत कर रहा था, उसमें जेंडर की ट्रेनिंग करने कमला जी इंदौर आयी थीं। उनकी ट्रेनिंग में “सत्ता के खेल” (पावर गेम) को पहली बार समझा। राजनीति-शास्त्र की विद्यार्थी होने के नाते सत्ता को सरकार, शासन और पोलिटिकल पार्टी के सीमित अर्थ में ही इस्तेमाल करती थी, पर कमला और कल्पना ने सत्ता को रोजाना के जीवन से जोड़कर बताया। सत्ता के खेल से परिचय करवाया. अब ये सत्ता पितृसत्ता के रूप  में समझ  आ रही थी।

उन्होंने हमें टास्क दिया कि 24 घंटे में “तुम सब लड़कियां देखो, कहां-कहां सत्ता है? और तुम और तुम्हारी मां कहाँ-कहां घर में कमजोर होती दिखायी देती हैं?” कल इस पर चर्चा करेंगे। रात भर उधेड़बुन चलती रही। दूसरे दिन, हम सब युवा लड़कियों की बात रखने की बारी आई। मैंने कहा कि मेरे घर में मां-पिताजी बराबर हैं, किन्तु मां कुछ ज्यादा काम करती हैं। मां को ज्यादा काम करने में कोई दिक्कत नहीं है। तो हम क्यों उनके अंदर यह जताएं या उनके मन में लेकर आयें कि तुम्हारे साथ बराबरी का व्यवहार नहीं हो रहा है?”

कमला जीने थोड़ा डांटते हुए कहा “अरे बहना, तुम्हें मालूम होगा तभी तो तुम प्रश्न करोगी।“ उल्टा अब उन्होंने मुझसे प्रश्न किया – “9.30 बजे आफिस आने के पहले तुम क्या-क्या काम करके आती हो ?” मैंने कहा ‘’झाड़ू-पोंछा, कपड़े धोकर और मां की खाने में मदद करके।‘’ उनका अगला सवाल था “तुम्हारा भाई उस समय तक क्या करता है?’’ मैंने कहा “वह सोता रहता है।” कमला जी – “वो क्यों सोता है?” मैंने कहा – “उसको अच्छा लगता है ?” “क्या तुमको सोना अच्छा नहीं लगता?” मैंने कहा – “ आफिस समय से आना होता है;’’

कमलाजी ने आगे कहा “हाँ, यही बात है, तुम्हें बचपन से जवाबदारी का बोध करवाया गया है। त्तुम्हारी रातों की नींद भी गायब कर दी गई है। तुम्हें बेचैन कर दिया गया है। इसलिए तुम अपनी दुनिया बनाने के लिए निकल गयी हो।”

मेरे जीवन में कोई पहली बार ऐसी बात कर रहा था तो वे कल्पना मेहता और कमला भसीन थीं। मैंने कल्पना दी की ओर देखकर डर के साथ कहा कि आप मेरे घर के बारे में सारी जानकारी लेकर सबको बता देंगे तो मेरे घर के लोग कहेंगे कि घर की बात को बाहर लेकर जाती है।”

कल्पना दी ने कहा – “तुम ही एक लड़की नहीं हो। तुम जैसी लाखों लडकियां जानती ही नहीं हैं कि हमारे निर्णय पुरुष समाज लेता है। यह भी एक पुरुष समाज की चालाकी है जो यह जुमला फेंकता है कि घर की बात बाहर जायेगी तो घर की बदनामी होगी। इससे वह जो चाहे, करता रहे और इज्जत की चौकीदारी महिलाओं से करवाता रहे।”

मेरे दिमाग में हथोड़े पड़ रहे थे। नारीवादी किताबों की एक सूची उन्होंने हम सब प्रशिक्षणार्थियों को पकड़ा दी। नारीवादी विचार कहीं-कहीं अच्छे लग रहे थे, तो कहीं-कहीं अत्यंत आक्रामक लग रहे थे। अंतिम दिन फीडबैक में मैंने कहा कि “समाज महिला और पुरुषों से मिलकर बना हुआ है, किन्तु हम एक पक्ष को ही देख रहे हैं। ऐसे तो समाज में टूटन होने लगेगी। अच्छा समाज बनाना है तो हमें कुछ नियम-कायदे मानना होंगे।”

कमलाजी ने अंतिम दिन थोड़ा हंसते हुए, थोड़ा नाचते हुए कहा – चलो ! “मेरी बहना, समाज बनाने का ठेका महिला ने ही लिया है क्या? कितने परिवारों में महिला के साथ इंसान जैसा व्यवहार  होता है? अच्छा समाज क्या है? इसको परिभाषित करो। मैंने कहा ‘’जहां घर में सब खुश रहें।‘’  कमला जी ने फिर कहा  “सब खुश कैसे रहेंगे ?” मैंने कहा – “जब सभी, एक-दूसरे को समझेंगे।” कमलाजी ने जोड़ा कि समझने के लिए पुरुषों के दिमाग में बराबरी की भावना लेकर आनी होगी।

यह मेरी पहली ओपन पाठशाला थी। ऐसी पाठशाला जहां शिक्षक गाना गा रहा है, डांस कर रहा है। मेरे दिमाग और मन में झाँकने का प्रयास कर रहा है और सवाल करने के लिए उकसा रहा है। कल्पना जी ने पूछा कि ‘’अच्छा बताओ, तुम्हें अपने मन का क्या करना अच्छा लगता है।‘’ हम सभी चुप थे। हमें वही अच्छा लगता है जो घर के लोगों को प्रसंद होता है। ‘’तुम्हें आराम करना है तो बोलो। तुम्हें रात में घर से बाहर निकलना है और खाली सड़कों पर सीटी मारनी है, या ठंड में सिगरेट पीने का मन होता है तो बोलो।‘’   

हमने कभी भी अपने बनाए दायरों के बाहर सोचा ही नहीं था, तो बोलते कैसे? कमलाजी हंसकर कहा कि “तू बोलेगी, मुंह खोलेगी, तभी तो जमाना बदलेगा।” कमला जी ने मुझ जैसी लाखों-लाख लड़कियों को अपनी सामाजिक-पारिवारिक स्थितियों पर ठहरकर गौर करने, उस पर सवाल उठाने के लिए तैयार किया। एक सामाजिक बुराई के रूप में इस पितृसत्ता को पहचानने की नजर दी। अपनी आजादी से प्यार करना सिखाया और फैसले लेने की हिम्मत भी दी। कमला जी औरत- मर्द की सामाजिक बराबरी की सबसे बड़ी पैरोकार रहीं। बराबरी उनका सबसे बड़ा सपना रहा। उनको और उनके सपने को लाखों-लाख सलाम।(सप्रेस) 

[block rendering halted]

  

2 टिप्पणी

  1. प्रिय अंजना
    कमलाजी के साथ बिताए वह पल एवं संवाद को आपने बखूबी बयान किया है। समाज में ठूस ठूस कर भरी पितृसत्ता का बोध युवा पीढ़ी को करवाने का असाध्य काम कमलाजी ने किया है।
    बहुत सुन्दर लिखा है आपने- पुरुष जो चाहे करें और उनकी इज्जत की चौकीदारी क्या महिलाएं करें।
    👍👍👍👍👍

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें