Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

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नागरिकता साबित करने के ताजा कानून

जाति, भाषा, लिंग, क्षेत्र आदि की कठोर मानी जाने वाली वर्जनाओं को तोड़कर देशभर को आंदोलन के लिए मजबूर करने वाला ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम’ (सीएए) और ‘राष्ट्रीय नागरिकता पंजी’ (एनआरसी) आखिर क्या करने वाले हैं? क्या ‘राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी’ (एनपीआर)…

ग्रामीण पत्रकारिता के खतरे

सर्वाधिक खतरे उठाते हुए न्यूनतम संसाधनों में पत्रकारिता करने वाले हमारे कस्बाई, ग्रामीण पत्रकारों की हालत किसी से छिपी नहीं है। कई बार सत्ता और सेठों की खबर देते, लेते हुए अपनी जान तक की बाजी लगाने वाले ऐसे पत्रकारों…

असली सोना तो देश की मिट्टी है

बाजार और उसके लिए विपुल उत्पादन के हल्ले में हमारी खेती धीरे-धीरे अपनी उत्पादकता और गुणवत्ता खोती जा रही है। अब ना तो रासायनिक खाद, दवाओं, कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से मुक्त फसलें बची हैं और ना ही उसे पैदा करने…

Social Media -निजता में सेंध लगाती कंपनियां और सरकारें

लेखक जार्ज ऑरवेल ने अपने उपन्यास ‘1984’ में समाज पर नजर रखने की जिस तकनीक का जिक्र किया है, आज उससे कई गुना शक्तिशाली, प्रभावी और व्यापक तकनीक की मार्फत सत्ता और सेठ हमारे आम जीवन पर नियंत्रण करने की…

विस्थापन का जबाव विद्यालय

मध्यप्रदेश में आदिवासी बहुल अलीराजपुर जिले में नर्मदा-तट के गांव ककराना को भी, आसपास के कई गांवों की तरह, सरदार सरोवर परियोजना की डूब का सामना करना पडा था, लेकिन इलाके में सक्रिय ‘खेडूत मजदूर चेतना संगठ’ से जुडे कुछ…

पराली के प्रदूषण को मात देती कुछ तकनीकें

जाडा आते-आते देश की राजधानी और उससे सटे इलाके पराली जलाए जाने से पैदा होते धुंए की तकलीफों से दो-चार होने लगते हैं। जमीन को सांस तक नहीं लेने देती आधुनिक ताबड-तोड़ खेती रबी फसलों की कटाई के तुरंत बाद…

अब हिंदी में भी मिल सकेंगे सुप्रीम कोर्ट के फैसले

अदालतों में हिंदी और स्थानीय भाषाओं में कार्रवाई की मांग को लेकर बरसों से बहस चलती रही है, लेकिन अब सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की पहल पर इसे मंजूर किया गया है। न्याय की आस में अदालतों के दरवाजे ठक-ठकाते…

संकट में साबरमती आश्रम

क्या गांधी को कोई ‘वल्र्ड क्लास’ बना सकता है? सब जानते हैं कि गांधी ने बार-बार अपने जीवन को ही अपना संदेश निरूपित किया है, यानि वे जहां, जैसे रहे-बसे, वह उनके संदेश के दर्जे का हो गया। आजकल अहमदाबाद…

गांधी की प्रासंगिकता

गांधी के विचार आज के दौर में कितने कारगर हैं? उनका पालन करके क्या हम वापस पुराने समय में तो नहीं चले जाएंगे? गांधी की सीख को लेकर उठने वाले ये सवाल मौजूदा समय में सर्वाधिक प्रासंगिक और जरूरी हो…

‘आरे जंगल’ की कटाई – पेड़ों का जलियांवाला बाग

मुम्बई में मेट्रो-शेड के लिए जिस हड़बड़ी, कानून और पर्यावरण की अनदेखी के साथ ‘हरित फेफडे़’ माने जाने वाले आरे कॉलोनी के जंगल काटे गए, उसने एक बार फिर मौजूदा विकास की बेहूदी, खाऊ-उडाऊ अवधारणा के साथ यह भी साबित…