तकनीक-आधारित औद्योगीकरण, पूंजी का केन्द्रीकरण और उनके नतीजे में दो बडे युद्धों के बावजूद 20वीं और 21वीं शताब्दियां गांधीजी के नाम से जानी जाती हैं। कैसे थे वे और उनका जीवन? प्रस्तुत है, इसका खुलासा करता पत्रकार के. विक्रम सिंह…
पिता की सम्पत्ति में बेटियों की बराबरी की हिस्सेदारी को लेकर 2005 में बने कानून को हाल में सुप्रीम कोर्ट ने फिर से पुष्ट किया है। इस कानून को लेकर तरह-तरह की नकारात्मक- सकारात्मक बातें उठ रही हैं। ऐसा नहीं…
विनोबा भावे की 125वीं जयंती पर विनोबा विचार प्रवाह अंतर्राष्ट्रीय संगीति में सुश्री ज्योति बहन सभी के उदय का जिस शब्द में समावेश है वह सर्वोदय है। किसी भी समाज के विकास में वैचारिक स्वातंत्र्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।…
शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध गायक पंडित जसराज अब इस दुनिया में नहीं रहे है। मेवाती घराने के पंडित जसराज का 17 अगस्त को अमेरिका के न्यू जर्सी में अपनी अंतिम सांस ली । वे 90 साल के थे। अपने 80…
कहा जाता है कि इंसान की बुनियादी फितरत में आहार, निद्रा, क्रोध, भय और मैथुन शामिल हैं। इनमें से भय हमारे जीवन के सर्वाधिक करीब है। क्या होता है, भय? उसके क्या प्रभाव होते हैं? हमारे मन में भय क्यों,…
16 अगस्त को ‘जनता पार्लियामेंट’ वेबिनार में स्वास्थ्य के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा जन स्वास्थ्य अभियान राष्ट्रीय सचिवालय और जन सरोकार के तत्वावधान में 16 अगस्त को ‘जनता पार्लियामेंट’ (जनता संसद) वेबिनार के दौरान स्वास्थ्य के विभिन्न गंभीर मुद्दों और…
गंगा को अब लोक राजनीति से ही बचा सकते हैं। यह लोक राजनीति के लिए सर्वश्रेष्ठ समय है। इस हेतु सभी अपनी निजी पहचान भूलकर एकाकर संगठित होकर लोक राजनीति में जुटें। गंगत्व बचाने का काम लोकतन्त्र में लोक राजनीति…
बेबाक टिप्पणी एक प्रवक्ता की मौत से उपजी बहस का उम्मीद भरा सिरा यह भी है कि चैनलों की बहसों में जिस तरह की उत्तेजना पैदा हो रही है वैसा अख़बारों के एक संवेदनशील और साहसी वर्ग में (जब तक…
हमारे यहां समाज, संस्कृति और श्रम की एक धुरी हस्तशिल्प भी रही है। इसीलिए आजादी के पहले और बाद में भी हथकरघा उत्पादन स्थानीय संसाधनों के उपयोग, निजी श्रम और आपसी लेन-देन की खातिर अहमियत पाते रहे हैं। अब हस्तशिल्प…
कोविड-19 से बदहाल देश के सामने, बिना किसी संतोषजनक संवाद, बातचीत के, हड़बड़ी में लाई गई ‘शिक्षा नीति-2020’ आखिर क्या उपलब्ध करना चाहती है? क्या यह तेजी से बढ़ती निजी पूंजी को और बढाने की खातिर सस्ते मजदूरों की व्यवस्था…