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आधी आबादी को अवसर से बदलेगी फिज़ा

आधी आबादी को अवसर से बदलेगी फिज़ा
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सामाजिक न्याय और टिकाऊ विकास की राह में महिलाओं का सशक्तिकरण निर्णायक भूमिका निभाता है। फिर भी वैश्विक स्तर पर महिलाएँ समान कार्य के बावजूद पुरुषों से कम वेतन पाती हैं और अवसरों तक उनकी पहुँच सीमित रहती है। ऐसे में सम्मानजनक रोजगार, तकनीकी क्षेत्रों में भागीदारी और नेतृत्व के अवसर बढ़ाना आवश्यक है, ताकि आधी आबादी की क्षमता समाज और अर्थव्यवस्था के परिवर्तन की वास्तविक ताकत बन सके।


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से ठीक दो दिन पहले महिला अधिकार पैरोकार, शिक्षाविद, समाज सुधारक और लेखिका डॉक्टर हंसा मेहता की स्मृति में, संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में यूएन महासभा की अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक का व्याख्यान हुआ है. ऐनालेना बेयरबॉक ने कहा कि डॉक्टर हँसा मेहता द्वारा सुझाए गए सिद्धाँत, मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के पारित होने के 77 वर्ष और यूएन चार्टर के पारित होने के 80 वर्ष बाद भी बहुपक्षवाद आधारित कामकाज को दिशा दिखा रहे हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हंसा मेहता के जीवन से तीन अहम सबक़ हम ले सकते हैं. पहला, यह बहुत ज़रूरी है कि अपने सिद्धान्तों के पक्ष में मज़बूती से खड़ा हुआ जाए. दूसरा, समानता की प्राप्ति के लिए प्रयास, सम्पूर्ण समाज के लिए निरन्तर जारी रहते हैं, और केवल आधी आबादी के लिए नहीं. तीसरा, यदि कोई एक व्यक्ति ही इतने बड़े बदलावों को आकार दे सकता है, तो यह कल्पना कीजिए कि यदि ऐसे अवसर पूरी मानवता को उपलब्ध कराए जाएं, तो कितनी गहराई तक समाज में परिवर्तन लाना सम्भव है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हंसा मेहता के लिए की गयी सकारात्मक टिप्पणी बहुत ही महत्वपूर्ण है. यह टिप्पणी उस समय आई है जब दुनिया में महिलाएं प्रत्येक दिन संघर्ष कर रही हैं.

सामाजिक न्याय से संघर्ष पर आंच

सामाजिक स्तर पर विश्व में महिलाओं के सशक्तीकरण की बातें हो रही हैं. विश्व श्रम संगठन-आईएलओ का खुद यह मानना रहा है कि सामाजिक न्याय का मूल आधार सम्मानजनक रोजगार है। हर व्यक्ति को, हर जगह सम्मानजनक रोजगार मिलना चाहिए। किंतु आज सम्मानजनक रोजगार की जगह श्रम के बदले श्रम मूल्य तो मिल नहीं रहे हैं. हाँ, युद्धरत देशों में जीवन से हाथ धोने ज़रूर पड़ रहे हैं. वैश्विक स्तर पर हुए अध्ययन बताते हैं कि महिलाएं अपने पुरुष समकक्षों द्वारा अर्जित प्रत्येक डॉलर के लिए 51 सेंट कमाती हैं। असमान वेतन, अवसरों तक सीमित पहुँच और ऐसी अपेक्षाएँ जो महिलाओं की महत्वाकाँक्षाओं व नेतृत्व को रोकती हैं, वे सामाजिक न्याय में बाधा हैं. इसी वर्ष विश्व उद्यमी और निवेश मंच में मनामा घोषणापत्र दृष्टिकोण सामने आया था. इसमें महिला उद्यमियों को, आर्थिक बदलाव की शिल्पकार के रूप में मान्यता दिए जाने की वकालत हुई और यह कहा गया कि महिलाओं को आर्थिक बदलाव की केवल लाभार्थी समझा जाए अपितु उन्हें इसके लिए सशक्त हस्तक्षेपकर्ता माना जाए. कुछ समय पहले ही तो यूएनडीपी ने कहा था कि लैंगिक समानता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद, वैश्विक स्तर पर महिलाएं औसतन पुरुषों से 20% कम कमाती हैं। हम समान मूल्य के काम के लिए समान वेतन की मांग करते हैं।

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दुनिया भर में महिलाओं के लिए वित्त, प्रौद्योगिक और उच्च कौशलयुक्त भूमिकाओं के क्षेत्र में संकल्प को दोहराना अब ज़रूरी हो गया है जिससे टिकाऊ विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए महिलाओं का सशक्तिकरण करके लक्ष्य को हासिल किया जाए. सामाजिक न्याय की यह एक सशक्त कोशिश हो सकती है वरना संघर्ष के जिस आंच में महिलाओं के ऊपर खतरे मंडरा रहे हैं, वे बहुत ही कठिन दौर में हमें ले जाने वाले हैं.

विज्ञान जगत में महिलाएँ व लड़कियों के बढ़ते मज़बूत क़दम

दुनिया में बदलाव के बीच परंपराएँ, संस्कृतियों और सभ्यताओं का संघर्ष चल रहा है. महिलाएं इसमें प्रायः पिस जाती हैं और लक्ष्य से दूर चली जाती हैं. इस सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने यह चिंता जताई थी कि यह असमानता तकनीकी क्षेत्र में और अधिक गहरी है. डेटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े कार्यों में महिलाएँ केवल 26 प्रतिशत हैं, जबकि ‘क्लाउड कम्प्यूटिंग’ में उनकी भागेदारी महज़ 12 प्रतिशत है. अब तो हम इन्हीं तकनीकी सभ्यता में जीने के लिए तैयार हैं तो हमारी महिलाओं व लड़कियों को खासकर किशोर महिलाओं के भीतर स्वप्न जगाना नितांत आवश्यक है.

विज्ञान क्षेत्र में महिलाओं व लड़कियों के इनोवेशन भी हो रहे हैं और समावेशन भी. महिलाओं व लड़कियों ने कई बड़े वैज्ञानिक उपलब्धियों को अर्जित कर चौंकाया है. किन्तु साथ ही डिजिटल कौशल में लैंगिक अंतर कैसे कम किया जा सकता है. महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों को कैसे प्रोत्साहन मिल सकता है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानि एआई संबंधी नीतियों को कैसे अधिक संवेदनशील बनाया जा सकता है, इस पर रणनीतिकार विचार कर रहे हैं.

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भारत में महिला अधिकारों की संवेदना

भारत में महिलाओं के बारे में भ्रामक बातें अगर न हो तो यहाँ की स्त्रियाँ काफी आगे बढ़ती हुई दिख रही हैं. देश के प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील का नाम सुनहरे अक्षरों में अंकित है तो आज श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जो कि आदिवासी समाज से आती हैं, भारत की राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रही हैं. भारतीय वैज्ञानिक महिलाओं का भी अपना स्थान है. चंद्रयान 2 के कुशलतापूर्वक सफलता में महिलाएं रही हैं. हाल ही में सफलता की कहानियां संयुक्त राष्ट्र ने प्रकाशित किया था कि भारत में ओडिशा के एक छोटे से गाँव की चमेली जेना के पास हमेशा आवाज़, आत्मविश्वास और लोगों से बात करने की क्षमता थी. कमी थी तो केवल एक अवसर की. उनके परिवार ने जैसे ही चेमेली जेना के फ़ैसलों में उनका साथ दिया और उनकी घर की कुछ ज़िम्मेदारियाँ उनसे हटाईं तो चमेली की दुनिया बदल गई. चमेली अब केवल अपने घर के लिए ही नहीं, पूरे समुदाय के लिए काम कर रही हैं.

भारत में असंख्य सफलता की कहानियां हैं. ये कहानियां हैं महिलाओं की, लड़कियों की, किशोरियों की जो न केवल चेंजमेकर के रूप में सामने आ रही हैं बल्कि वे भारत की तस्वीर बदलने की भूमिका में हैं. भारत सरकार ने बहुत पहले बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा दिया, उससे भी बदलाव आया है. लैंगिक भेदभाव कम हुए हैं लेकिन एक सच यह भी है कि उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाली भी लड़कियां अभी अपने अधिकारों को ठीक-ठीक नहीं जानतीं. राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, नई दिल्ली के लिए बतौर स्पेशल मॉनिटर, मानवाधिकार शिक्षा एवं लैंगिक समानता पर कार्य करते हुए विभिन्न संस्थाओं में जांच के दौरान ऐसा महसूस हुआ कि भारत में लैंगिक समानता के लिए अभी व्यापक जागरूकता ज़रूरी है. प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों में भी ऐसी जागरूकता नितांत आवश्यक है.

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बदलाव से बदलेगी फिज़ा

विश्व भर में स्त्रियों को सशक्त बनाने की मुहिम चल रही है लेकिन संकटों से गुजर रहे देशों के भी स्त्रियों के जीने के हक से लेकर गरिमा भी सुरक्षित करने का कार्य अभी शेष है. ऐनालेना संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष बन गयीं मात्र 44 वर्ष की अवस्था में. हम अगर न्यायपूर्ण सोच के साथ स्त्रियों को अवसर दें और स्त्रियाँ मेहनत, निष्ठा व ज़ज्बे के साथ आगे बढ़ें तो बहुत सी संभावनाएं दिख रही हैं. केवल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उनके लिए आयोजन करने से औपचारिकताएं पूरी होती हैं लक्ष्य नहीं हासिल होते. इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम उस दिशा में सोचें जिससे आधी आबादी के सम्मान व भागीदारी में अभिवृद्धि हो. हम एक ऐसे युग की ओर बढ़ें जिसमें स्त्रियों के लिए सुअवसर के साथ नेतृत्व का मार्ग सहज व सुलभ हो. इस बदलाव के साथ ही हमारी पृथ्वी की स्त्रियाँ पूरी मानवता के लिए श्रेष्ठ कार्य करेंगी और इसी में हम सबकी उन्नति समाहित है.

लेखक राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी रह चुके हैं. एनएचआरसी (इण्डिया) में स्पेशल मॉनिटर व केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब में चेयर प्रोफेसर हैं।

लेखक का परिचय

प्रो. कन्हैया त्रिपाठी

लेखक पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय भटिंडा के डॉ. आंबेडकर चेयर ऑन इनवायरमेंटल वैल्यूज एंड ह्यूमन राइट्स के चेयर प्रोफ़ेसर हैं। आप भारत के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का भी दायित्व निभा चुके हैं।

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