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विजयादशमी : राम की शक्ति पूजा-आस्था से आदर्श तक

विजयादशमी : राम की शक्ति पूजा-आस्था से आदर्श तक
कविता त्रिवेदी

राम भारतीय जनमानस में आस्था के साथ न्याय, समता, करुणा और लोककल्याण के प्रतीक हैं। लेकिन राम के नाम पर राजनीति करने वाले समाज में क्या उनके आदर्शों के लिए भी जगह है? तुलसी, निराला, गांधी और लोहिया के राम के बहाने यह आलेख रामराज की अवधारणा और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्विरोधों को सामने रखता है।


कहती थीं माता मुझको सदा राजीव-नयन।

दो नीलकमल हैं शेष अभी यह पुरश्चरण,

पूरा करता हूँ देकर मात: एक नयन।।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कालजयी रचना ‘राम की शक्ति पूजा’ की यह अद्भुत पंक्तियाँ, युगों-युगों से आस्था के प्रतीक, लोकनायक, जनश्रुति के नायक, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के उस विराट स्वरूप को दर्शाती हैं जो मानवीय संवेदनाओं के प्रति आस्था, समर्पण, श्रद्धा, विश्वास एवं त्याग का संदेश देते हुए एक सशक्त रामराज की नींव रखते हैं!

तुलसीदास जी मानस में कहते हैं – हरि व्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।

श्रीराम चैतन्य हैं, वे मानव शरीर धारण कर, सर्व कल्याण की भावना से राजकुल में जन्मे। जीवन पर्यंत त्याग, संयम, तपस्या, समर्पण, क्षमा, दया, धैर्य और मर्यादा सबका पालन करते हुए राष्ट्रधर्म और राजधर्म दोनों का निर्वहन किया।

राम, राजा भी हैं, वनवासी भी! वे मर्यादा भी हैं, विद्रोह भी! मानव की पीड़ा सहते ईश्वर का रूप भी! प्रेम से जो प्रकट हो, शस्त्र से जो धर्म को बचाए! एक नाम नहीं पूरा युग है, एक संपूर्ण आदर्श वही तो श्रीराम है!

त्रेतायुग के रघुवीर कलियुग में प्रातः वंदन में ‘जय सियाराम’ हैं तो रात्रि शयन के समय ‘राम नाम’ हैं! वे वर्तमान में भी समाज का आईना हैं, जो राम की अवधारणा में विश्वास रखते हैं या राम के नाम पर सत्ता में काबिज हुए हैं!

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राम कहते हैं – जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी।। यानि राजा प्रजा का सेवक है मालिक नहीं! रामराज का दूसरा नाम समाजवाद है!

राम कहते हैं – दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि व्यापा।। राम राज में किसी को बुनियादी कष्ट नहीं हो, न कोई भूखा न कोई वंचित! केवट, शबरी, निषाद, वानर सबका यथोचित सम्मान, यही समता यही समाजवाद का मूलमंत्र है!

रामराज में केंद्र में प्रजा थी! आज केंद्र में पूँजी है! पैसा तय करता है कि नीति क्या बनेगी? खबर क्या चलेगी? नेता क्या बोलेगा? सब सत्ता के इर्द-गिर्द! सबका चरित्र एक-सा, सिर्फ झंडे अलग-अलग!

तुलसी के राम सर्वशक्तिमान हैं, वे राजा थे लेकिन अधिनायकवादी नहीं थे। वे प्रजा की भलाई के लिए भरत, लक्ष्मण, हनुमान आदि से सलाह लेते थे। उनके रामराज का असली धर्म था – परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।

मानस के उत्तरकांड में रामराज का उल्लेख है। तुलसी शासन के तीन स्तम्भों के बिगड़ने पर कहते हैं  सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।

यानि मंत्री, सलाहकार एवं ज्ञानी यदि डर या लालच से केवल हाँ में हाँ मिलाता है तो राज्य, धर्म और शरीर तीनों का नाश होता है! वर्तमान के राजनीतिक परिदृश्य में इन तीनों स्तंभों के साथ चौथे स्तंभ पर भी यह चौपाई अक्षरशः सत्य है!

तुलसी कहते हैं – बैरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई।। राम के प्रताप से विषमता खत्म हुई, किसी का किसी से बैर नहीं रहा। लेकिन आज धर्म, जाति, भाषा के नाम पर जो ध्रुवीकरण हो रहा है, वह निश्चित ही चिंताजनक है। जनप्रतिनिधि जाति देखकर वोट बैंक की राजनीति करते हैं। सभी राजनीतिक दलों में इस मुद्दे पर कोई विरोधाभास नहीं है, जैसे संसदीय भत्तों में सबके स्वर एक हो जाते हैं।

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तुलसी के राम पुरुषोत्तम स्वरूप में हैं, वाल्मीकि और निराला के राम साधारण मनुष्य! वे आज भी भारत के उस सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो दुखी है, दुविधा में है, अवसाद और अनिश्चितता में जी रहा है।

राजा बनते ही वनवासी, पिता का विछोह, सीता हरण और उनका विलाप। सीता का त्याग – राजधर्म और निजधर्म का सबसे बड़ा द्वंद्व जिसमें राम की मनोदशा में आम आदमी का संघर्ष नजर आता है।

लंका विजय के समय राम को एक समय अपनी पराजय की आशंका दिखाई देती है। जामवंत उन्हें शक्ति की आराधना के लिए प्रेरित करते हैं, वे अपनी एक आँख भी भगवती को समर्पित करने को कहते हैं। क्योंकि जब सब तरफ से निराशा हाथ लगती है तो मनुष्य स्वयं को दाव पर लगा देता है, वही आत्मबल एवं निज शक्ति – भगवान होने का नहीं मनुष्य बने रहने का नाम ही श्रीराम है।

राम आज भी आस्था हैं, राम आज भी आदर्श हैं। वे भारतीय लोक संस्कृति में इतने गहरे बसे हुए हैं कि – राम-सीता, राम-लक्ष्मण, राम-भरत, राम-हनुमान का नाम निज संवादों में हर भारतीय घरों में लिया जाता है।

हमने आस्था के लिए राममंदिर का निर्माण कराया, क्योंकि राम हमारी प्रेरणा हैं। लेकिन क्या हम उनके आदर्शों का अनुसरण, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा को मजबूत करने के लिए करेंगे या करना नहीं चाहिए?

गांधी के रामराज में न्याय की आकांक्षा है! निराला व वाल्मीकि के राम आम मनुष्य की तरह संघर्ष करते हैं! लोहिया के चिंतन में राम, भारतीय जनमानस एवं सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं!

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क्योंकि इस देश का जनमानस आज भी राममय है। वह सहिष्णु है, वह धार्मिक है, वह संघर्ष करता है और समाज से जुड़ा है। जरूरत हमें एक ऐसे राम की है जो राजधर्म एवं राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए उस जनचेतना का संचार करने में सफल हो सके, राम के आदर्शों को परिभाषित करे, जो यह कह सके कि रामहि केवल प्रेम पियारा। जानि लेउ जो जाननिहारा।।

लेखक का परिचय

कविता त्रिवेदी

कविता त्रिवेदी कल्याणी संस्था की संस्थापक अध्यक्ष है और सामाजिक मुद्दों पर लिखती रहती है।

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