इंदौर में दिनांक 24 व 25 अक्टूबर को सम्पन्न हुए प्रगतिशील लेखक संघ के 14वें राज्य स्तरीय सम्मेलन में भाषा-विज्ञानी गणेश देवी द्वारा मुख्य वक्ता के तौर पर दिए गए भाषण में भाषा, साहित्य, लोकतंत्र और सांस्कृतिक समावेश के सवालों पर गंभीर विमर्श किया गया। उनके भाषण का सार संक्षेप एक आलेख के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। (प्रस्तुति : कुमार सिद्धार्थ)
मैं मराठी और गुजराती में लिखता था और गुजरात में रहता था। वर्ष 2013 में डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या हुई। हम पुणे गए। जिस पुल पर सुबह टहलते समय उनकी हत्या हुई थी, वहां कलाकार, लेखक और सर्जक एक साथ चले और विरोध किया। इसके 14 महीने बाद कॉमरेड पानसरे की हत्या हुई। उन्हें मैं दशकों से जानता था। कॉरपोरेशन में क्लर्क के रूप में काम करने के बाद वे वकील बने और कामगारों के अधिकारों के लिए लड़ते रहे। शिवाजी महाराज सबके राजा थे, यह कहने की भी उन्हें कीमत चुकानी पड़ी।
इसके लगभग छह महीने बाद धारवाड़ में एम. एम. कलबुर्गी की हत्या हुई। हमने सोचा कि गुजरात छोड़कर धारवाड़ में रहें, ताकि उनके परिवार को सहारा दे सकें। इसलिए हम बड़ौदा छोड़कर कर्नाटक गए। इन हत्याओं के विरोध में सभाएं और जुलूस होते थे। विनीत जी और जया जी भी उनमें शामिल हुए। दस हजार बच्चे सड़कों पर उतरकर विरोध कर रहे थे। हम कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से मिले और आग्रह किया कि हत्यारों को गिरफ्तार कर न्याय के दायरे में लाया जाए।
मुख्यमंत्री से मिलकर बाहर निकला, तो सामने अपनी पुरानी दोस्त गौरी लंकेश आती दिखीं। मैंने पूछा, ‘गौरी, आप यहां क्या कर रही हैं?’ उन्होंने भी पूछा, ‘आप क्या कर रहे हैं?’ मैंने बताया कि हम हत्याओं के मामलों में कार्रवाई की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘बस, उसी कारण से मैं यहां आई हूं।’ इसके चार दिन बाद गौरी लंकेश की हत्या हो गई।
हम लोग तड़प रहे थे। यह क्या हो रहा है? इतनी हिंसा कहां से उमड़ आई है? यह तूफान कहां से आ रहा है? अंग्रेजी में इसे टाइफून कहते हैं और हिंदी में तूफान। आखिर यह घृणा और हिंसा इतनी बड़ी मात्रा में कहां से पैदा हुई?
वर्ष 2016 में मैंने तय किया कि देश में जहां-जहां इस तरह की हत्याएं हो रही हैं, उनका हिसाब रखना शुरू करूंगा। वर्ष 2021 में जब मैंने सूची बनाई, तब तक इस देश में 44 पत्रकारों और लेखकों की हत्या हो चुकी थी। उनकी हत्या का कारण उनका विचार था। किसी की हत्या उसके रंग, धर्म, लिंग या जाति के कारण नहीं हुई थी। विचारों की हत्या हो रही थी।
मैंने वर्ष 2021 में यह सूची बनाना बंद कर दिया। तब तक की घटनाओं को दर्ज किया जा चुका था। आज, वर्ष 2026 में, यह संख्या और बढ़ चुकी है। लेखकों और पत्रकारों को इसलिए मारा गया क्योंकि उन्होंने लिखा, कुछ कहा या उनके पास अपने विचार थे।
पिछले बारह वर्षों में केवल पत्रकारों, लेखकों, चित्रकारों और फिल्मकारों की ही हत्याएं नहीं हुई हैं। विरोध में काम करने वाले राजनीतिक दलों के सैकड़ों कार्यकर्ताओं की भी हत्या हुई है। भविष्य में जब इन लोगों की स्मृति में कोई स्मारक बनेगा, तो वह बहुत बड़ा बनाना पड़ेगा। उसमें सभी नाम लिखना भी मुश्किल हो जाएगा।
लेकिन जिनके अधिकारों का हनन हुआ है, जिनको मारा नहीं गया, बल्कि जीवित रखकर पीड़ित और प्रताड़ित किया गया है, उनकी संख्या तो इससे भी बहुत बड़ी है। पिछले दो वर्षों में हमने ऐसे लोगों को भी देखा है, जिनकी नागरिकता पर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। करोड़ों लोगों को देश के दिमाग से निकाल दिया गया है, देश के दिल से बाहर कर दिया गया है। यह क्या हो रहा है?
समावेश की परंपरा और घृणा का सवाल
मैंने शुरुआत में इसे तूफान कहा था। लेकिन यह तूफान कहां से आया? इतनी घृणा कहां से पैदा हुई? हम कलाकार, नाटककार, लेखक, सर्जक और चिंतक पिछले दो सौ वर्षों से समाज को बदलने की कोशिश करते आए हैं। हम ही मिलकर कभी सावित्रीबाई फुले और महात्मा फुले बने, कभी रवींद्रनाथ टैगोर बने, जिन्होंने स्वतंत्रता और सिर ऊंचा करके जीने की बात कही। हम ही यू. आर. अनंतमूर्ति थे, जिन्होंने कहा कि यदि संस्कार मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ते, तो जीते हुए ही उन्हें छोड़ दीजिए। हम वैकम मुहम्मद बशीर थे, दुष्यंत कुमार थे और विजय तेंदुलकर के ‘घाशीराम कोतवाल’ में भी हम ही थे।
वर्ष 1803 में राजा राममोहन राय ने फारसी में अपनी पहली किताब लिखी थी, जिसमें कहा गया था कि सभी धर्म समान हैं। हम ही थे जिन्होंने इस विचार को स्वीकार किया। हम जेल गए, गांधी के साथ दांडी मार्च में चले, लिखते रहे, बोलते रहे और सोचते रहे। हम ही विजय तेंदुलकर के ‘घाशीराम कोतवाल’ में थे।
मलयालम, तमिल, कन्नड़, मराठी, गुजराती, पंजाबी, बांग्ला और हिंदी सहित देश की हर भाषा में यह काम हुआ। गुजराती में भी हमने मिलकर ‘हिंद स्वराज’ लिखी। इसके बावजूद यह तूफान कहां से आ गया? इतनी घृणा, क्रूरता और अहंकार कहां से पैदा हुए? हमारे समाज में यह दीमक कहां लगी थी, जो अचानक इस तरह उभरकर सामने आ गई?
मेरे एक दूसरे मित्र ने ‘ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ डेमोक्रेसी’ लिखी। उनका कहना है कि दुनिया में गरीब और अमीर के बीच इतनी बड़ी खाई बन गई है कि लोकतंत्र के आगे बढ़ने की गुंजाइश ही नहीं बच रही है।
मुझे एक डच फिल्मकार मारलीन गोरिस की फिल्म ‘अ क्वेश्चन ऑफ साइलेंस’ भी याद आती है। उसमें एक आदमी एक मॉल में जाता है। तीन ऐसी स्त्रियां, जो एक-दूसरे को नहीं पहचानतीं, मिलकर उसकी हत्या कर देती हैं। पुलिस जब उनसे पूछती है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो वे चुप रहती हैं। उनके व्यवहार को समझने के लिए सरकार एक मनोवैज्ञानिक को नियुक्त करती है।
विदेश में रहने वाले मेरे मित्रों से जब इस विषय पर बात होती है, तो वे कहते हैं कि यह ‘अ क्वेश्चन ऑफ साइलेंस’ है। आज तीन ताकतें मिलकर लोकतंत्र को खत्म कर रही हैं।
पहली ताकत उन लोगों की है, जो राजनीतिक व्यवस्था की खामियों से पैदा हुए हैं। दूसरी ताकत तकनीक का बढ़ता हुआ वर्चस्व है, जिसके कारण समाज टूट रहा है और लोग एक-दूसरे से बातचीत नहीं कर रहे हैं। तीसरी ताकत हमारी राजनीतिक भाषा की थकान है।
ये तीनों ताकतें हमारे लोकतंत्र, अधिकारों और आजादी को कमजोर कर रही हैं। लेकिन मैं नहीं मानता कि केवल यही इसके कारण हैं। हमें यह देखना होगा कि इस घृणा, हिंसा, अहंकार और तानाशाही की बुनियाद में क्या है।
नागरिकता, बहिष्कार और 1923 की किताब
राजा राममोहन राय के समय ब्रह्म समाज आया और उसके बाद आर्य समाज। यह उन्नीसवीं सदी की बात है। लेकिन मैं बीसवीं सदी की एक घटना की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। वर्ष 1923 में एक छोटी किताब लिखी गई, जिसके लेखक ने शुरू में अपना नाम नहीं दिया था। बाद में पता चला कि इसे विनायक दामोदर सावरकर ने लिखा था। किताब का शीर्षक था ‘एसेंशियल्स ऑफ हिंदुत्व’।
इस किताब में यह बताया गया था कि जब हिंदुस्तान आजाद होगा, तो उसमें नागरिक कौन बनेगा? कौन निष्ठावान नागरिक होगा और किसकी निष्ठा पर हमेशा सवाल उठता रहेगा?
किताब में कहा गया कि जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि एक ही है, वही असली नागरिक हो सकता है। जिनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि अलग-अलग हैं, वे देश के नागरिक नहीं हो सकते। इस विचार में देश की सीमाओं को लेकर भी स्पष्टता नहीं थी। प्राचीन समय से देश के विस्तार को सिंधु से हिमालय तक बताया जाता था।
यह 1923 में लिखी गई बात थी। आज भी जो लोग इस विचार को सही मानते हैं और सत्ता में हैं, वे इसी सोच के आधार पर काम करेंगे। करोड़ों लोगों को बाहर करने की जो कल्पना है, वह इसी विचार से जुड़ी हुई है।
इसी संदर्भ में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की चर्चा होती है। इसके बारे में आप सब पढ़ रहे हैं और विरोध भी देख रहे हैं। लेकिन जनगणना का सवाल भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
जनगणना हर दशक के पहले वर्ष में होती रही है। अंग्रेजों के समय 1871 में लॉर्ड मेयो ने इसकी शुरुआत की थी। आजादी से पहले 1931 में जनगणना हुई और आजादी के बाद 1951, 1961, 1971, 1981, 1991, 2001 और 2011 में यह प्रक्रिया चली। वर्ष 2021 में जनगणना नहीं हुई। कोविड को इसका कारण बताया गया। यह सही है कि कोविड के समय दूसरे देशों में भी जनगणना प्रभावित हुई थी। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के जनगणना संबंधी मानकों और सिद्धांतों से जुड़े दूसरे देशों ने 2023 तक यह काम पूरा कर लिया था। हमारे देश में ऐसा क्यों नहीं हुआ?
इस सवाल को परिसीमन से जोड़कर देखना होगा। वर्ष 2002 में परिसीमन संबंधी कानून में यह व्यवस्था की गई थी कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जा सकता है। परिसीमन का अर्थ है निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण और उनके नक्शों में बदलाव।
मेरे अनुसार, इस प्रक्रिया के पीछे राजनीतिक भूगोल को नए सिरे से तैयार करने की योजना थी। वर्ष 2023 में हैदराबाद से आरएसएस से जुड़े लोगों की एक छोटी किताब प्रकाशित हुई थी। उसमें निर्वाचन क्षेत्रों के नक्शे दिए गए थे। प्रशासनिक जिलों के नहीं, बल्कि मतदान क्षेत्रों के हिसाब से नक्शे बनाए गए थे। इसमें 850 निर्वाचन क्षेत्र बनाने की योजना का उल्लेख था।
इस योजना के अनुसार, जिन क्षेत्रों में ईसाई, मुस्लिम और गैर-हिंदू आबादी अधिक है, उन्हें अलग-अलग हिस्सों में बांटने की बात थी। आदिवासियों के मामले में भी ऐसी ही व्यवस्था की कल्पना थी। इस तरह 850 निर्वाचन क्षेत्रों में से 600 से 700 सीटें जीतकर सत्ता में आने और पूरे राजनीतिक परिदृश्य को फिर से लिखने की योजना थी।
जब विपक्षी दलों ने परिसीमन की इस योजना को पराजित किया, तो उसके कुछ ही दिनों बाद गृह मंत्रालय ने एक नया कदम उठाया। प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 2025 को लाल किले से जनसांख्यिकीय बदलावों के अध्ययन के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाने की घोषणा की थी।
इस समिति के चार उद्देश्य बताए गए। पहला, यह पता लगाना कि बाहर से आए लोगों के कारण देश की आबादी में कहां और किस तरह बदलाव हो रहे हैं। दूसरा, इन बदलावों का अध्ययन करना। तीसरा, ऐसे लोगों को बाहर निकालने के लिए कानून बनाना और चौथा, उस कानून को लागू करने की व्यवस्था तैयार करना।
इस तरह के बहिष्कार का उदाहरण पश्चिम बंगाल में देखने को मिला। चुनाव के दौरान 5 जून से जुलाई के अंत तक लगभग 4,800 लोगों पर हमले किए गए और उन्हें उन बस्तियों से निकालकर सीमा के बाहर धकेल दिया गया, जहां वे रहते थे। ये घटनाएं दर्ज की गई हैं। वे लोग न भारत में थे, न बांग्लादेश में। वे दोनों देशों के बीच नो मैन्स लैंड में फंसे हुए थे। आसपास के गांवों में कुछ लोगों को शरण मिली, लेकिन उनके पास नागरिकता के दस्तावेज नहीं थे।
बहिष्कार की इस व्यवस्था को समझने के लिए जनसांख्यिकीय बदलावों के अध्ययन के लिए बनाई गई समिति को भी देखना चाहिए। इसके सदस्यों में जनगणना के रजिस्ट्रार जनरल, खुफिया विभाग के पूर्व अधिकारी और गृह मंत्रालय के एक सचिव शामिल हैं। इसमें कोई सामाजिक वैज्ञानिक या जनसांख्यिकी विशेषज्ञ नहीं है।
यह बहिष्कार का विचार कहां से आया? फिर उसी 1923 की किताब की ओर लौटना पड़ता है। उसमें यह सवाल उठाया गया था कि आजाद भारत में कौन नागरिक होगा और कौन नहीं। आजाद भारत की पहचान तय करने के लिए लोगों को बाहर करने का विचार उसी में मौजूद था।
लेकिन हमारा राष्ट्रगान और हमारी राष्ट्रीय कल्पना तो पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्रविड़, उत्कल और बंग को साथ लेकर चलती है। एक तरफ दो सौ वर्षों से साहित्य, संगीत, नाटक और सिनेमा के माध्यम से सबको शामिल करने की कोशिश होती रही है। मुंबई में कोई फिल्म बनती है, तो पूरे देश को लगता है कि यह उसकी अपनी फिल्म है। दूसरी ओर एक ऐसी विचारधारा है, जो लोगों को बाहर करना चाहती है।
इस बहिष्कार का बुखार हमारे समाज की हड्डियों तक में छिपा हुआ है। कभी यह महामारी का रूप ले लेता है और कभी कुछ ठंडा पड़ जाता है। लेकिन इसे केवल 1925 में आरएसएस की स्थापना से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह पूरा सांस्कृतिक संघर्ष है। इसका राजनीतिक रूप जरूर है, लेकिन इसकी जड़ें संस्कृति और समाज की संरचना में हैं।
आर्य की कल्पना और सांस्कृतिक वर्चस्व
इस संघर्ष की पृष्ठभूमि समझने के लिए उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में जाना होगा। लोकमान्य तिलक ने ‘ओरायन’ और ‘द आर्कटिक होम ऑफ द आर्यन्स’ जैसी किताबें लिखीं।
इससे पहले सर विलियम जोंस ने 1786-87 में यह विचार रखा था कि ग्रीक, लैटिन, फारसी, स्लाविक और संस्कृत जैसी भाषाओं की जड़ें एक ही मूल में हो सकती हैं। इस मूल को बाद में प्रोटो-इंडो-यूरोपियन कहा गया। हमें लगा कि हम ग्रीक और लैटिन बोलने वालों के रिश्तेदार हैं। फारसी से भी हमारा रिश्ता है। लेकिन उसी समय अंग्रेजों ने कानून बनाकर फारसी भाषा का सरकारी इस्तेमाल बंद कर दिया था। इस तरह एक भाषा के इस्तेमाल को सीमित किया गया।
प्राचीन फारसी और ईरानी भाषाओं में ‘आर्य’ शब्द का इस्तेमाल संबोधन के रूप में होता था। जैसे हम किसी से कहते हैं, ‘अरे भाई’ या मराठी में ‘अरे लेका’। यह एक तरह का आत्मीय संबोधन था। पुराने फारसी, अर्मेनियाई और संस्कृत में भी इस तरह के प्रयोग मिलते हैं। संस्कृत में ‘भो आर्य’ (हे श्रेष्ठ / हे आर्य) कहा जाता था। लेकिन हमारे देश के कुछ लोगों ने यह मान लिया कि आर्य नाम के लोग थे, जिन्होंने अपनी भाषा और संस्कृति को पूरे यूरोप और एशिया में फैलाया था।
उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में एक फ्रांसीसी भाषाविद् ने आर्यों के मूल स्थान की खोज शुरू की। इसके बाद एक जर्मन विद्वान ने इस विचार पर लिखा। उसी विचार को आधार बनाकर एडॉल्फ हिटलर ने आर्य और गैर-आर्य की राजनीति खड़ी की।
हिटलर के लिए यह सवाल था कि किसका खून आर्य है और किसका नहीं। जबकि खून का रंग सबका एक है। गरीब हो या अमीर, यूरोपीय हो या भारतीय, आर्य हो या गैर-आर्य, रक्त का रंग एक ही होता है।
हिटलर का उदय 1920 के दशक में हुआ। मुसोलिनी भी उसी दशक में उभरा। इसी दौर में हमारे यहां पितृभूमि और पुण्यभूमि की अवधारणा पर आधारित विचार सामने आए। पितृभूमि शब्द की तुलना जर्मन शब्द फादरलैंड से की जा सकती है।
यूरोप में आर्य की यह हवा चल रही थी। हमारे देश के कुछ लोगों ने पराभूत होने की मानसिकता में इस विचार को पकड़ लिया और इसके माध्यम से सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने की कल्पना की। इसी सांस्कृतिक मंच के रूप में आरएसएस का जन्म हुआ।
बैरिस्टर मुंजे, जो बाद में हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी बने, हेडगेवार के गुरु थे। मुंजे इटली गए और मुसोलिनी से मिले। इस विचार के पीछे यह कल्पना थी कि आर्यावर्त, भारतभूमि और सिंधु से हिमालय तक फैली प्राचीन संस्कृति को फिर से स्थापित किया जाए।
लेकिन सवाल था कि यह संस्कृति कहां से मिलेगी? इसी समय अर्मेनिया में कुछ पांडुलिपियां मिली थीं, जिनमें ऋग्वेद से मिलते-जुलते लगभग तीन सौ शब्द बताए गए थे। इसके आधार पर वैदिक संस्कृति को ही अपनी मूल संस्कृति मानने और उसके बाद आए दूसरे सांस्कृतिक स्तरों को छोड़ देने की कल्पना की गई।
अब वैदिक संस्कृति की बात करते हैं। इसके लिए एक महत्त्वपूर्ण वैदिक विद्वान श्री अरविंद के विचारों का सहारा लेना चाहूंगा। श्री अरविंद ने ‘द सीक्रेट ऑफ द वेदा’ नाम की किताब लिखी थी। जो लोग आरएसएस की विचारधारा से संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें वेदों के बारे में श्री अरविंद के विचारों को भी समझना चाहिए।
वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर ऋग्वेद का समय ईसा पूर्व लगभग 1400 वर्ष माना गया है। बृहदारण्यक उपनिषद का समय ईसा पूर्व लगभग 700 वर्ष माना जाता है। यानी ऋग्वेद और बृहदारण्यक उपनिषद के बीच लगभग सात सौ वर्षों का अंतर है।
श्री अरविंद ने लिखा कि बृहदारण्यक उपनिषद के समय तक वेदों में प्रयुक्त शब्दों के प्रतीकात्मक अर्थ को समझना लोगों के लिए कठिन होने लगा था। इसलिए उस समय के लोग वेदों में सब कुछ मौजूद होने की धारणा की ओर बढ़ने लगे।
वेद महान साहित्य हैं। उनमें दार्शनिक गहराई है, आध्यात्मिक धाराएं हैं और कल्पना की शक्ति है। लेकिन वे साहित्य भी हैं। साहित्य में कल्पना होती है, विचार होते हैं और अनुभव होते हैं।
ईसा पूर्व सातवीं से दूसरी सदी के बीच भारतीय दर्शन में तर्क की विभिन्न धाराएं विकसित हुईं। इस दौरान वेदों के वाक्यों को अंतिम प्रमाण मानने की प्रवृत्ति भी मजबूत हुई। यह धारणा बनी कि यदि कोई बात वेदों में है, तो वह तार्किक रूप से मान्य है और यदि नहीं है, तो उस पर प्रश्न उठाया जा सकता है।
इसके साथ वेदों का पाठ करने वालों की प्रतिष्ठा बढ़ने लगी। वेदों के शब्दों का पाठ और उनके अर्थों की व्याख्या करने वालों को विशेष स्थान मिला। धीरे-धीरे समाज में एक ऊर्ध्वाधर व्यवस्था बनी, जिसमें कोई नीचे था, कोई उससे ऊपर और कोई सबसे ऊपर। इसी को हम वर्ण व्यवस्था कहते हैं।
भक्ति आंदोलन, संविधान और समानता
इस ऊर्ध्वाधर सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध भक्ति आंदोलन ने बड़ी भूमिका निभाई। यह आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है; आज भी साहित्य और लेखन के माध्यम से जारी है। भक्ति कवियों ने अपनी जातिगत पहचान छिपाने के बजाय उसे सामने रखकर वर्ण व्यवस्था को चुनौती दी। चोखामेला जैसे कवियों ने अपनी सामाजिक स्थिति को व्यक्त किया, लेकिन समाज की ऊंच-नीच वाली संरचना को स्वीकार नहीं किया। यह साहित्यिक आंदोलन मनुष्यों को एक ही स्तर पर देखने की कोशिश था।
इस आंदोलन में एक ऐसी सामाजिक कल्पना थी, जिसमें लोग एक-दूसरे के साथ समान स्तर पर रह सकें। समाज को ऊपर और नीचे के खानों में बांटने की व्यवस्था को अस्वीकार किया गया।
यदि हम पूरे इतिहास को देखें, तो यह संघर्ष केवल जाति या धर्म का संघर्ष नहीं है। यह समाज को ऊर्ध्वाधर बनाने और समाज में विविधता के साथ समान स्तर पर रहने की दो अलग-अलग कल्पनाओं का संघर्ष है।
भारत विविधता से बना समाज है। के. एस. सिंह की ‘पीपल ऑफ इंडिया’ शृंखला में 2,200 समुदायों का वर्णन हुआ; देश में समुदायों की संख्या लगभग चार हजार बताई जाती है। भाषाई सर्वेक्षण में 783 भाषाएं दर्ज की गईं। चार हजार समुदाय और लगभग आठ सौ भाषाएं। इस देश में लोग एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर चलते आए हैं। इसी तरह का समाज बनाने के लिए हमने संविधान को स्वीकार किया गया। ‘हम, भारत के लोग’ का अर्थ है कि सभी नागरिक समान अधिकार रखते हैं। यह सही है कि सभी को सभी अधिकार अभी नहीं मिले, लेकिन संविधान उनकी गारंटी देता है।
मेरी दृष्टि में भक्ति आंदोलन की चरम परिणति संविधान में दिखाई देती है। जयदेव, तुकाराम, कबीर, सूफी कवि, शंकरदेव, बसवेश्वर और अक्का महादेवी—ये सब हमारी साहित्यिक परंपरा के हिस्से हैं। हम उनके हैं और वे हमारे हैं। रवींद्रनाथ टैगोर ने कबीर की सौ कविताओं का अनुवाद किया, जिसे ‘100 पोएम्स ऑफ कबीर’ के रूप में जाना जाता है। उन्होंने चेताया कि राष्ट्र का भूत सिर पर सवार हो जाए, तो मानवीयता कम हो सकती है। जापान और चीन में दिए गए उनके व्याख्यान ‘नेशनलिज्म’ नाम की किताब में संकलित हैं।
गांधी, टैगोर और श्री अरविंद की दृष्टि भारत की स्वतंत्रता से आगे जाती थी। गांधी देश की आजादी के लिए संघर्ष करते हुए भी विश्व के बारे में सोचने वाले लोगों को तैयार करना चाहते थे। श्री अरविंद ने स्वतंत्रता के बाद लिखा कि वास्तविक आजादी तब आएगी, जब दुनिया के सभी देश एक संघ बनाएंगे। एक राष्ट्र स्वतंत्रता की कल्पना को नष्ट कर सकता है। इस परंपरा में राष्ट्रीय स्वतंत्रता और व्यापक मानवीयता एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
राष्ट्र और स्वतंत्रता के संबंध में टैगोर की चेतावनी भी इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा है। वे स्वतंत्रता के विरोधी नहीं थे; उन्होंने औपनिवेशिक सत्ता का विरोध किया और अपनी उपाधि लौटा दी। लेकिन वे यह भी जानते थे कि राष्ट्र की कल्पना यदि मनुष्य की व्यापक पहचान पर हावी हो जाए, तो वह दूसरे मनुष्यों के प्रति हमारी संवेदना को सीमित कर सकती है। गांधी की दृष्टि में भी देश की आजादी और विश्व के प्रति जिम्मेदारी साथ-साथ चलती थीं। श्री अरविंद का विचार था कि एक देश की स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक दुनिया के बाकी देशों के साथ उसके संबंध स्वतंत्रता और सहयोग पर आधारित न हों।
गांधी, टैगोर और श्री अरविंद को इसीलिए भक्ति परंपरा की अंतिम कड़ियों में देखता हूं। अरविंद और टैगोर साहित्यकार थे। गांधी ने भले ही साहित्यकार की तरह लेखन नहीं किया, लेकिन उनका जीवन अपने आप में एक महाकाव्य है।
समानता और समावेश की सामाजिक कल्पना
हमारे देश में पिछले तीन हजार या अट्ठाईस सौ वर्षों से एक बड़ा सांस्कृतिक संघर्ष चलता आया है। एक ओर ऐसा समाज बनाने की कल्पना है, जिसमें ऊंच-नीच की व्यवस्था हो। इस व्यवस्था को सही ठहराने के लिए पुनर्जन्म की धारणा का सहारा लिया जाता है। कहा जाता है कि पिछले जन्म में आपने पाप किया था, इसलिए इस जन्म में नीचे आए हैं। इस जन्म में पुण्य करेंगे, तो अगले जन्म में ऊपर जाएंगे।
दूसरी ओर समानता का सिद्धांत है। समानता का अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति की नाक, कान या शरीर की बनावट एक जैसी हो। इसका अर्थ है कि हम एक-दूसरे के साथ बैठ सकते हैं और एक-दूसरे को मनुष्य के रूप में पहचान सकते हैं।
हिंदू दर्शन में बहुत कुछ ऐसा है, जो सर्वसमावेशी है। उपनिषदों में भी ऐसी व्यापक दृष्टि मिलती है। लेकिन इसकी विडंबना यह है कि समाज में ऊंच-नीच की व्यवस्था बनाई गई और उसे उचित ठहराने के लिए अनेक सिद्धांत विकसित किए गए।
इसके विपरीत समानता की एक दूसरी कल्पना है। यह केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र के संत एकनाथ का प्रसंग इस दृष्टि को सामने रखता है। पानी की कमी के समय वे पानी लेकर जा रहे थे। रास्ते में प्यासा गधा मिला, तो उन्होंने उसे पानी पिला दिया। उन्होंने उसे भी एक जीव माना।
संविधान ने हमें ऐसा समाज बनाने का अवसर दिया है। मौलिक अधिकार शुरुआत हैं; नीति-निदेशक तत्व समाज की व्यापक दिशा दिखाते हैं। इसमें पारिस्थितिकी का ध्यान रखने और सभी प्रजातियों को जीवन के रूप में देखने की दृष्टि भी शामिल है।
लोकतंत्र की अगली मंजिल
लोकतंत्र इसलिए कमजोर नहीं हुआ कि लेखक, नाटककार, चित्रकार या फिल्मकार अयोग्य हैं। लोकतंत्र शायद इसलिए कमजोर हुआ है कि उसकी अगली मंजिल के निर्माण में हम कुछ कम पड़ गए हैं। लोकतंत्र ऐसी अवधारणा है, जिसे लगातार विकसित होना चाहिए।
उसकी अगली मंजिल केवल मनुष्यों के अधिकारों तक सीमित नहीं हो सकती। सभी प्रजातियों के अधिकारों पर भी विचार करना होगा। हम पृथ्वी के हैं; पृथ्वी हमारी नहीं है। इस विचार को कुछ देशों में ‘इकोक्रेसी’ या पारिस्थितिक लोकतंत्र कहा गया है। ‘कॉस्मोक्रेसी’ की कल्पना पूरे ब्रह्मांड को हमारे नैतिक संसार का हिस्सा मानती है। हमारे कवि कहते हैं—‘जे न देखे रवि, ते देखे कवि।’ कवि की दृष्टि केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं रहती, वह पूरे विश्व को देखती है।
लेखकों का काम : हिंसा का जवाब शब्दों से
प्रगतिशील लेखक संघ के नब्बे वर्ष और उसके चौदहवें राज्य स्तरीय सम्मेलन के अवसर पर मुझे फ्रांसीसी नाटककार जां जेने की याद आती है। जां जेने जेल में थे और वहां नाटक लिखते और प्रस्तुत करते थे। उनकी औपचारिक पढ़ाई नहीं हुई थी। वे कई देशों में भटकते रहे और अंततः फ्रांस की जेल में डाल दिए गए। लेकिन वे नाटक लिखने लगे।
मराठी के अन्नाभाऊ साठे की तरह, जो एक दिन भी स्कूल नहीं गए थे, लेकिन मराठी के बेहतरीन कवियों और नाटककारों में गिने जाते हैं, जां जेने ने भी अपनी रचनात्मकता के माध्यम से अपनी जगह बनाई।
सार्त्र ने जां जेने को जेल में नाटक करते देखा। उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर उनकी रिहाई की मांग की और जां जेने को रिहाई मिली। सार्त्र ने उनके जीवन और लेखन पर लगभग छह सौ पन्नों की किताब लिखी, जिसका शीर्षक था ‘जां जेने : द सेंट एंड द मार्टर’।
जां जेने का एक नाटक है ‘द बालकनी’। नाटक में एक मनोरंजन गृह है, जहां लोग पैसे देकर अपनी कल्पनाओं के पात्र बनते हैं—कोई कप्तान, कोई जनरल, कोई विद्वान और कोई न्यायाधीश। लेकिन उस भवन के बाहर फ्रांसीसी क्रांति चल रही है। बाहर असली लोग हैं, असली संघर्ष है और असली खून बह रहा है। एक तरफ कल्पना की दुनिया है, दूसरी तरफ वास्तविक जीवन का संघर्ष।
उस भवन के बाहर फ्रांसीसी क्रांति चल रही होती है। बाहर असली लोग हैं, असली संघर्ष है और असली लोगों का खून बह रहा है। एक तरफ कल्पनाओं की दुनिया है और दूसरी तरफ वास्तविक दुनिया में चल रहा संघर्ष।
क्या हम भी किसी बालकनी में बैठे हैं? क्या हम ऐसे समूह में बात कर रहे हैं, जहां सभी लोग सहमत हैं और हमारी ही आवाज लौटकर हमारे पास आती है? मेरा जवाब है—नहीं। हम जिस सांस्कृतिक संघर्ष की बात कर रहे हैं, वह पिछले ढाई-तीन हजार वर्षों से चल रहा है और अभी अधूरा है। इस संघर्ष का माध्यम भाषा रही है।
भाषा : हमारी सांस्कृतिक स्मृति और समावेश का माध्यम
हमने संस्कृत को स्वीकार किया, फारसी को भी और अंग्रेजी को भी। ‘कागज’, ‘कलम’ और ‘स्याही’ जैसे शब्द फारसी से आए, लेकिन वे हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा हैं। हम उन्हें अपना चुके हैं। हमें अंग्रेजी, फारसी, कन्नड़ या तमिल से दुश्मनी नहीं होनी चाहिए। इसी तरह ईसाइयों, यहूदियों, मुसलमानों, पारसियों और सिखों से भी दुश्मनी का कोई कारण नहीं है। गुरु नानक हमें अपने लगते हैं; नामदेव की कविता गुरु ग्रंथ साहिब में मिलती है। जैन और बौद्ध परंपराओं में रामायण के रूप हमें स्वीकार्य हैं। हम समावेश और स्वीकार को पसंद करते हैं, दूसरों का सम्मान करना जानते हैं और घृणा करना पसंद नहीं करते।
दूसरी ओर, कुछ लोग हिंसा को अपना हथियार बनाकर लड़ रहे हैं। हम हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं दे सकते। हमें ऐसा करना भी नहीं चाहिए। यदि हम भी हिंसा का सहारा लेने लगेंगे, तो हमारे और उनके बीच, हमारे और हिटलर के बीच कोई फर्क नहीं रह जाएगा। हमें हिंसा का जवाब शब्दों से देना होगा। घृणा का जवाब विचारों और प्रेम से देना होगा।
प्रगतिशील लेखक केवल बीसवीं या इक्कीसवीं सदी तक सीमित नहीं हैं। खासकर इस देश में, जो सैकड़ों भाषाओं से बना है और जिसकी संस्कृति भाषाओं के आधार पर विकसित हुई है, प्रगतिशील लेखन की परंपरा बहुत पुरानी है।
हम भाषा से निर्मित मनुष्य हैं। हमारी चेतना भाषा के सहारे विकसित हुई है। हम मानते हैं कि शब्द से संसार की रचना हुई है। इसलिए आपके हाथ में जो हथियार है, वह हत्या का हथियार नहीं है। आपके हाथ में जो लेखनी है, वह शब्दों की रचना और सर्जना करने के लिए है।
हमारे हाथों में कबीर, तुकाराम, नामदेव, मंटो, प्रेमचंद, अनंतमूर्ति, नेमाड़े और श्रीलाल शुक्ल की परंपरा है। हम सभी एक ही दुनिया के हिस्से हैं। यदि हम इस विचार को अपने दिल में रखते हैं और अपनी जुबान पर लाते हैं, तो बड़े विश्वास और आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं— ‘उम्मीद से भर दिए जहां।’
अंग्रेजी कवि शेली ने कहा था—‘ओ होप! क्रिएट द थिंग इट कंटेम्प्लेट्स।’ आशा जिस चीज की कल्पना करती है, उसे साकार करने की शक्ति भी रखती है। यदि हम विश्वास के साथ काम करें, तो हमारा उद्देश्य पुरस्कार पाना या अकादमियों में पद हासिल करना नहीं होगा; हमारा उद्देश्य शब्दों के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धता होगा।
भवभूति ने कहा था कि आज मेरी कविता कोई नहीं पढ़ेगा, शायद एक हजार वर्ष बाद समझी जाएगी—इससे क्या फर्क पड़ता है? चंद्रकांत देवताले ने भी इस उम्मीद में नहीं लिखा था कि भविष्य में कोई उनका नाम लेगा। उन्होंने शब्दों के प्रति निष्ठा, आत्मीयता और प्रेम से लिखा। यदि हम इसी विश्वास के साथ अपनी सांस्कृतिक लड़ाई जारी रखते हैं, तो मुझे यकीन है कि एक न एक दिन हम ही जीतेंगे। हम ही जीतेंगे!