पंचायती राज : लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने की ऐतिहासिक पहल

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भारत में पंचायती राज व्यवस्था लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुंचाने की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसे 73वें संविधान संशोधन के जरिए संवैधानिक दर्जा मिला। वैदिक काल से चली आ रही स्थानीय स्वशासन की परंपरा को आधुनिक स्वरूप देते हुए इस व्यवस्था ने ग्राम स्तर पर भागीदारी और विकास की नई संभावनाएं खोली हैं, हालांकि इसके प्रभावी क्रियान्वयन की चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं।


 24 अप्रैल : पंचायती राज दिवस

अरविंद जयतिलक

आजादी के बाद देश में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए ढेर सारे प्रयास हुए। इनमें से एक बड़ी उपलब्धि भारत में पंचायतीराज व्यवस्था की स्थापना है। इतिहास पर दृष्टिपात करें तो पंचायतीराज व्यवस्था किसी न किसी रुप में भारत के सामाजिक-राजनीतिक जीवन का अभिन्न अंग रहा है। वैदिक काल में सभा और समिति का उल्लेख है जिससे स्पष्ट होता है कि उस काल में भी स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था थी।

पंचायती राज व्यवस्था को लोकतांत्रिक जामा पहनाने का काम आजादी के बाद शुरु हुआ। 1993 में संविधान में 73 वां संशोधन करके पंचायत राज व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता दी गयी। बाद में संविधान में भाग 9 को पुनः जोड़कर तथा इस भाग में 16 नये अनुच्छेदों को मिलाकर एवं संविधान में 11 वीं अनुसूची जोड़कर पंचायत के गठन, पंचायत के सदस्यों के चुनाव, सदस्यों के लिए आरक्षण तथा पंचायत के कार्यो के संबंध में व्यापक प्रावधान किए गए। सच कहा जाये तो स्वतंत्र भारत में पंचायती राज व्यवस्था महात्मा गांधी की देन है। वे स्वतंत्रता आन्दोलन के समय से ही ब्रिटिश सरकार पर पंचायतों को पूरा अधिकार देने का दबाव बना रहे थे।

आजादी के बाद 2 अक्टूबर, 1952 को जब सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रारंभ किया गया तो सरकार की मंशा थी कि गांधी जी के पंचायती राज की संकल्पना को आकार दिया जाए। इस मंशा के मुताबिक ही खण्ड को इकाई मानकर खण्ड के विकास हेतु सरकारी मुलाजिमों के साथ सामान्य जनता को विकास की प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास किया गया। लेकिन दुर्भाग्य कि जनता को वास्तविक अधिकार न दिये जाने के कारण यह कार्यक्रम सफेद हाथी सिद्ध हुआ।

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सामुदायिक कार्यक्रम की असफलता के बाद पंचायती राज व्यवस्था को परवान चढ़ाने के लिए 1957 में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में ग्रामोद्धार समिति का गठन किया गया। इस समिति ने भारत में त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की। इसी समिति ने पंचायती राज को सशक्त बनाने के लिए गांवों के समूहों के लिए प्रत्यक्षतः निर्वाचित पंचायतों, खण्ड स्तर पर निर्वाचित तथा नामित सदस्यों वाली पंचायत समितियों तथा जिला स्तर पर जिला परिषद गठित करने का सुझाव दिया। महत्वपूर्ण बात यह रही कि बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिश को 1 अप्रैल, 1958 को लागू कर दिया गया।

राजस्थान राज्य की विधानसभा ने इसी समिति के सुझाव के आधार पर 2 सितम्बर, 1959 को पंचायती राज अधिनियम की संस्तुति कर दी। 2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में पंचायती राज व्यवस्था को सबसे पहले लागू किया गया। इसके बाद पंचायती राज व्यवस्था को अन्य राज्यों ने भी अपने यहां लागू करना शुरु कर दिया। मसलन 1959 में आंध्रप्रदेश, 1960 में असम, तमिलनाडु एवं कर्नाटक, 1962 में महाराष्ट्र, 1963 में गुजरात तथा 1964 में पश्चिम बंगाल में लागू किया गया। लेकिन बलवंत राय मेहता समिति के सिफारिशों के तहत पंचायती राज व्यवस्था में कई गड़बड़ियां देखने को मिली।

1977 में अशोक मेहता समिति का गठन किया गया। 1978 में इस समिति ने केन्द्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। इस समिति ने कुछ महत्वपूर्ण सिफारिश की। मसलन राज्य में विकेन्द्रीकरण की प्रारंभिक शुरुआत जिला स्तर से हो, मण्डल पंचायत को जिला स्तर से नीचे रखा जाये जिसमें करीब 15000-20000 जनसंख्या एवं 10-15 गांव शामिल हों। मेहता समिति ने गांव पंचायत और पंचायत समिति को समाप्त करने की बात कही। समिति ने मंडल पंचायत और जिला पंचायत का कार्यकाल 4 वर्ष तथा विकास योजनाओें को जिला स्तर के माध्यम से तैयार करने एवं उसका क्रियान्वयन मंडल पंचायत से कराने की सिफारिश की लेकिन सरकार ने इस समिति के सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया।

सात वर्ष बाद 1985 में डा. पी. वी. के. राव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन करके उसे ग्रामीण विकास तथा गरीबी दूर करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था पर सुझाव देने की बात कही गयी। इस समिति ने राज्य स्तर पर राज्य विकास परिषद, जिला स्तर पर जिला परिषद, मंडल स्तर पर मंडल पंचायत और गांव स्तर पर गांव सभा के गठन की सिफारिश के साथ अनुसूचित जाति, जनजाति एवं महिलाओं के लिए आरक्षण देने की बात कही। लेकिन समिति की सिफारिश को अपर्याप्त बताकर उसे अमान्य कर दिया गया। इसके उपरांत डा. एल.एम. सिंघवी की अध्यक्षता में समिति गठित करके उसे पंचायती राज संस्थाओं के कार्यो की समीक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गयी। इस समिति ने गांवों के पुर्नगठन की सिफारिश पर बल दिया। इसी समिति ने गांव पंचायतों को वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने की बात कही।

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पंचायती राज व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने के लिए 1988 में पी.के. थुंगन समिति का गठन किया गया। इस समिति ने अहम सुझाव के तौर पर कहा कि पंचायती राज संस्थाओं को संविधान सम्मत बनाया जाना चाहिए। इस समिति के सिफारिश के आधार पर पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता प्रदान करने के लिए 1989 में 64 वां संविधान संशोधन लोकसभा में पेश किया गया जिसे लोकसभा ने तो पारित कर दिया लेकिन राज्यसभा ने नामंजूर कर दिया। 16 दिसम्बर, 1991 को 72 वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया और उसे संसद की प्रवर समिति को सौंप दिया गया। 72 वें संविधान संशोधन विधेयक के क्रमांक को बदलकर 73 वां संविधान संशोधन विधेयक कर दिया गया।

22 दिसंबर 1992 को लोकसभा और 23 दिसंबर 1992 को राज्यसभा द्धारा 73 वें संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी गयी। 17 राज्य विधानसभाओं द्वारा मंजूरी दिये जाने के बाद 20 अप्रैल, 1993 को राष्ट्रपति ने भी अपनी सहमति दे दी। 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 द्वारा देश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का प्रावधान किया गया। इसके अनुसार ग्राम स्तर पर ग्रामसभा और ग्राम पंचायत का प्रावधान, खण्ड स्तर पर क्षेत्र पंचायत और सबसे उच्च स्तर पर यानी जिला स्तर पर जिला पंचायत के गठन का प्रावधान किया गया। ग्रामसभा की शक्तियों के संबंध में राज्य विधान मंडल द्वारा कानून बनाने का उल्लेख है। जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है, उनमें दो स्तरीय पंचायत अर्थात जिला स्तर और गांव स्तर पर गठन किया जायेगा और 20 लाख से अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में त्रिस्तरीय पंचायत राज्य अर्थात गांव तथा मध्यवर्ती और जिला स्तर पर स्थापना की बात कही गयी है।

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केरल, जम्मू कश्मीर, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय, नागालैण्ड और मिजोरम में एक स्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू है। असम, म.प्र., कर्नाटक, उड़ीसा एवं हरियाणा में दो स्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू है। उ.प्र., बिहार,राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, हिमाचल, गुजरात, पंजाब, गोवा एवं तमिलनाडु इत्यादि राज्यों में त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू है। वहीं पश्चिम बंगाल में चार स्तरीय पंचायत व्यवस्था लागू है। वहां आंचलिक परिषद का भी गठन किया गया है।

संविधान में उल्लेख है कि सभी स्तर की पंचायतों के सभी सदस्यों का चुनाव वयस्क मतदाताओं द्धारा प्रत्येक पांचवें वर्ष किया जाएगा। गांव स्तर के पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष रुप से तथा जिला स्तर के पंचायत अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष रुप से होगा। पंचायत के सभी स्तरों पर सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए अनुसूचित जाति एवं जनजाति के सदस्यों के लिए उनके अनुपात में आरक्षण का प्रावधान है। सभी स्तर के पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष होगा। लेकिन इसका विघटन पांच वर्ष पहले भी किया जा सकता है। किंतु विघटन की दशा में 6 मास के अंतर्गत चुनाव कराना आवश्यक होगा। पंचायतों को कौन-कौन सी शक्तियां प्राप्त होगी और वे किन जिम्मेदारियों का निर्वहन करेंगी इसका उल्लेख संविधान में 11 वीं अनुसूची में किया गया है। ग्राम पंचायत में 6 समितियों का उल्लेख है जैसे नियोजन एवं विकास समिति, निर्माण कार्य समिति, शिक्षा समिति, प्रशासनिक समिति, स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति तथा जल प्रबंधन समिति। क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत में भी इसी प्रकार की समितियों की व्यवस्था का उल्लेख है। पंचायती राज व्यवस्था के लागू हो जाने से विकास की अपार संभावनाओं को बल मिला है।

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