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मेघालय के पर्यावरण को कोयला खनन से खतरा

उत्तर-पूर्व का राज्य मेघालय एक जमाने में अपनी खूबसूरती और भारी वर्षा के कारण विख्यात था, लेकिन अब, दुनिया के ऐसे ही दूसरे इलाकों की तरह, खनन, जल-विद्युत परियोजनाओं और कथित विकास की चपेट में आकर बर्बाद होता जा रहा…

एक थी ‘घोषित इमरजेंसी’ और एक है ‘अघोषित आपातकाल’!

पैंतालीस साल पहले के आपातकाल और आज की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच एक और बात को लेकर फ़र्क़ किए जाने की ज़रूरत है। वह यह कि इंदिरा गांधी ने स्वयं को सत्ता में बनाए रखने के लिए सम्पूर्ण राजनीतिक विपक्ष…

सातवें डॉ. अजय खरे मेमोरियल व्याख्यानमाला में लोक स्वास्थ्य चिकित्‍सकों ने व्‍यक्‍त किये अपने उदगार

स्वास्थ्य मुद्दों पर कार्यरत डॉ. अनंत फड़के राष्ट्रीय जन स्वास्थ्य सम्मान से सम्‍मानित भोपाल, 6 मार्च। वैज्ञानिक एवं चिकित्सकों की जिम्मेदारी जनता के प्रति होना चाहिए न कि सत्ता के साथ। लोक स्वास्थ्य के क्षेत्र में वित्तीय प्रावधानों को बढ़ाने…

महिला एवं बाल स्वास्थ्य के मद्देनजर स्वास्थ्य क्षेत्र के लिये बजट प्रावधान बढ़ाया जाए

जन स्वास्थ्य अभियान की सरकार से माँग इंदौर, 03 मार्च । मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 2 मार्च 2021 को कोविड – 19 महामारी के दौर में प्रस्तुत बजट मध्‍यप्रदेश में स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बजट हो सकता था, परंतु उम्मीद…

औषधि के रूप में उपयोगी : महुआ का तेल

आदिवासियों में महुआ एक बहु-उपयोगी पेड होता है, इसलिए कई जनजातियां उसे अपने देवी-देवताओं, पुरखों से भी जोडकर देखती हैं। महुए का एक उपयोगी उत्‍पाद है, तेल। इसके औषधीय गुणों की चर्चा आयुर्वेद में की गई है। महुआ के फूल,…

‘विकास’ की बलि चढ़ता हिमालय

उत्तराखंड की ताजा त्रासदी ने एक बार फिर उस सनातन सवाल को उछाल दिया है कि आखिर विकास के नाम पर होने वाली गतिविधियां हमारे विनाश की वजह क्यों बनती जा रहीं हैं? क्या उत्तराखंड में बनी और बन रहीं…

किसान आंदोलन के समर्थन में हिमाचल के सामाजिक संगठनों और किसान समूहों ने जारी किया बयान

केंद्र सरकार द्वारा बनाये गए तीन कृषि क़ानूनों के विरोध में देश के किसान तीन महीनों से आन्दोलनरत हैं। किसानों की मांग है कि तीनों कृषि कानूनों को रद्द कर कृषि उत्पादों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी का…

कैसे मापें, गरीब और गरीबी की गहराई

हाल के वर्षों में गरीबी को परिभाषित करने का सवाल फिर से सिर उठा रहा है। गरीब कौन हैं, क्यों हैं और उनकी इस दशा के लिए कौन जिम्मेदार है? अनेक अर्थशास्त्रियों ने इसे लेकर अपनी-अपनी अवधारणाएं प्रस्तुत की हैं,…

नामकरण ही नहीं, उसके पीछे के इरादे भी जानना ज़रूरी है!

नए स्टेडियम के नाम के साथ और भी कई चीजों के बदले जाने की शुरुआत की जा रही है। यानी काफ़ी कुछ बदला जाना अभी बाक़ी है और नागरिकों को उसकी तैयारी रखनी चाहिए। केवल सड़कों, इमारतों, शहरों और स्टेडियम…

अब धर्म-धुरीण बचाएंगे, धरती को

सवाल है कि ‘चमोली त्रासदी’ जैसी आपदाओं को, अपनी विकास की हठ में बार-बार खडी करने वाले राजनेताओं से धर्मगुरु किस मायने में भिन्न और बेहतर साबित होंगे? क्या वे अपने पास-पडौस के समाज, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की कोई बात…