Latest post

श्रम की प्रतिष्ठा के लिए काम के बदले अनाज

ग्रामीण बेरोजगारी के संकट के इस दौर में देश के ख्‍यात सामाजिक संगठन ‘एकता परिषद’ ने एक अभिनव प्रयोग किया है। काम के बदले अनाज की पारम्परिक पद्धति में श्रम की प्रतिष्ठा जोडकर ‘एकता परिषद’ ने ग्रामीणों को अपने इलाके…

बुजुर्गों की बदहाली

इन दिनों हम एक देश की हैसियत से खुद के युवा होने का बडा जश्न मनाते रहते हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह भी सोचा है कि पचास साल बाद यही आबादी बूढी भी होगी और तब देश की इसी…

अरविंद ओझा : मरुस्थल की धरती में उम्मीद के बीज बोए

अरविंद ओझा का जीवन सरल, सहज व सादगीपूर्ण था। वे जमीनी सामाजिक कार्यकर्ता तो थे ही पर उनकी पठन-पाठन में गहरी रूचि थी। उन्हें यहां गुरूजी के नाम से जाना जाता था। वे कहानीकार व कवि भी थे। वे बहुत…

‘धृतराष्ट्र’ की मुद्रा में हैं मीडिया के ‘संजय’ इस समय?

पत्रकारिता समाप्त हो रही है और पत्रकार बढ़ते जा रहे हैं! खेत समाप्त हो रहे हैं और खेतिहर मज़दूर बढ़ते जा रहे हैं, ठीक उसी तरह। खेती की ज़मीन बड़े घराने ख़रीद रहे हैं और अब वे ही‌ तय करने…

राजनीति से अलगाव की राजनीति

गहराई से देखें तो इसकी जिम्मेदारी प्रातिनिधिक लोकतंत्र की अहम खिलाड़ी राजनीतिक पार्टियों की दिखाई देती है। भांति-भांति के रंगों-झंडों वाली राजनीतिक जमातों ने वोटरों को कठपुतलियों में तब्दील कर दिया है। अब जैसा राजनीतिक पार्टियों के सरगना कहते हैं…

आश्‍वासन मिलने के बाद ही जुलिया 728 दिन बाद पेड़ से नीचे उतरी

आज हुई थी विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन की शुरूआत उत्तराखंड के रेणी गांव निवासी श्रीमती गौरादेवी ने भी 26 मार्च, 1974 की रात को अन्य महिलाओं के साथ जागकर पेड़ों की कटाई रूकवाकर विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन की शुरूआत की…

कृषि की राह में कारपोरेट रोडे

दुनियाभर में कृषि का मौजूदा तरीका अब सवालों के घेरे में आता जा रहा है। उत्पादन में गैर-जरूरी वृद्धि पर आधारित यह तरीका पर्यावरण, पानी, जमीन, हवा जैसे कृषि के प्राकृतिक उपादानों को खतरे में डाल रहा है और कहीं-कहीं…

जाओ इससे अच्छे-अच्छे काम करते जाना, तालाब बनाते जाना

विश्‍व जल दिवस पर विशेष कूड़न, बुढ़ान, सरमन और कौंराई थे चार भाई। चारों सुबह जल्दी उठकर अपने खेत पर काम करने जाते। दोपहर को कूड़न की बेटी आती, पोटली में खाना लेकर। ⁠एक दिन घर से खेत जाते समय…

‘मोहनदास गाँधी’ के देश में ‘आसिफ’ के साथ बेरहमी !

पैंसठ सालों के बाद आज भी ‘मोहन’ पानी की तलाश में इधर से उधर भटक रहा है । फ़र्क़ बस यह हुआ है कि बदली हुई परिस्थितियों में स्क्रिप्ट की माँग के चलते ‘मोहन’ अब ‘आसिफ’ हो गया है ।…

क्‍या उद्योग बढ़ा रहा है, सड़कों की असुरक्षा?

आज के दौर में परिवहन, यातायात सर्वाधिक जरूरी सेवाएं हो गई हैं, लेकिन उनकी बढौतरी के साथ-साथ खतरे भी बढते जा रहे हैं। आजकल तेजी से भागती आम सडकों पर चलना दुर्घटनाओं को न्‍यौता देना हो गया है। क्या इसके…