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उम्दा कथाकार, शिक्षक और पत्रकार डॉ. रमेश उपाध्याय नहीं रहे

24 अप्रैल । हिंदी के प्रख्यात जनवादी कथाकार रमेश उपाध्याय हमारे बीच नहीं रहे। वे पिछले कई दिनों से कोविड से संक्रमित थे और एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। सारी कोशिशों के बावजूद दिनांक 24 अप्रैल को…

ये वक्त नामुराद है . . . . !

स्‍मृति शेष : डॉ. सुरेश मिश्र चौरासी साल का एक भरा-पूरा बेहद सम्पन्न जीवन गुजारने वाले सुरेश मिश्र को कैसे याद रखा जा सकता है? उनका एक बड़ा गुण था – सभी के प्रति ढेर सारा स्नेह। यह स्नेह उन…

अम्बरीश राय : उनका जाना क्रांति के एक बड़े सपने का जाना है

सामाजिक कार्यकर्ता अम्बरीश राय का अवसान, राइट टू एजुकेशन फोरम के थे संयोजक मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून को लागू करने के लिए चलाए गए आंदोलन के सूत्रधार एवं सामाजिक कार्यकर्ता अम्बरीश राय का 23 अप्रैल 2021 को सुबह…

डॉ. सुरेश मिश्र : ऊर्जा का एक और स्रोत चला गया

वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. सुरेश मिश्र का गुरूवार (22 अप्रैल) की सुबह भोपाल में निधन हो गया । वे 84 वर्ष के थे। मध्यप्रदेश के इतिहास पर उन्होंने कई पुस्तकों का लेखन और अनुवाद किया। उदयपुर की ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण…

बताइए ! सबसे पहले किसे बचाया जाना चाहिए ?

व्यवस्था के प्रति लोगों का यकीन समाप्त होकर मौत के भय में बदलता जा रहा है। सबसे ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तो तब होगी जब ज़िम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोग सांत्वना के दो शब्द कहने के बजाय जनता में व्याप्त…

पृथ्‍वी दिवस : पेड़ लगाने का पराक्रम

22 अप्रैल : विश्‍व पृथ्‍वी दिवस पर विशेष प्रकृति को पस्त करके विकसित होने की मारामार में लगा कथित आधुनिक समाज अपने को कालजयी मानने की गफलत भी पाले रहता है, हालांकि उसे अक्सर अपनी इस मान्यता की कीमत भी…

आईये, जाने दुनिया के सबसे बड़े नागरिक आयोजन ‘पृथ्वी दिवस’ (World Earth day) के बारे में

पृथ्वी पर प्रकति का संतुलन बनाये रखने तथा भविष्य में जीवन जीने के लिए प्राकृतिक संपत्ति व संसाधनों को बनाये रखना अति आवश्यक है। धरती को बचाने का आशय है इसकी रक्षा के लिए पहल करना। पृथ्वी हमारा घर है और…

विश्व-समाज की जिम्मेदारी है, पृथ्‍वी को बचाने की

22 अप्रैल : विश्‍व पृथ्‍वी दिवस    इक्कीसवीं सदी आते-आते पर्यावरण की बदहाली ने हमें लगातार उसे याद रखने की मजबूरी के हवाले कर दिया है। विश्व पृथ्वी दिवस को वैश्विक जलवायु (Global warming) संकट के प्रति जागरुकता लाने के…

कोरोना की अकथ कहानी

गरीबी कोई दबी-छिपी, अर्थशास्त्रियों के अबूझ आंकडों भर की बात नहीं रही है। देशभर में अचानक बेरोजगार हुए ग्रामीण मजदूरों ने कठिन हालातों में, पैदल अपने-अपने गांव-देहात लौटकर सबको गरीबी और भुखमरी के दर्शन करवा दिए थे। ऐसे में क्या…

मौतों के ‘तांडव’ के बीच निर्मम चुनावी स्नान ?

इस समय हमारे शासक अपने ही नागरिकों से हरेक चीज़ या तो छुपा रहे हैं। धोखे में रखा जा रहा है कि किसी भी चीज़ की कोई कमी नहीं है। वैक्सीन, ऑक्सिजन, रेमडेसिविर इंजेक्शन, अस्पतालों में बेड्स, डाक्टर्स आदि का…