अम्बरीश राय : उनका जाना क्रांति के एक बड़े सपने का जाना है

सामाजिक कार्यकर्ता अम्बरीश राय का अवसान, राइट टू एजुकेशन फोरम के थे संयोजक

अरुण कुमार त्रिपाठी

मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून को लागू करने के लिए चलाए गए आंदोलन के सूत्रधार एवं सामाजिक कार्यकर्ता अम्बरीश राय का 23 अप्रैल 2021 को सुबह कोरोना के कारण निधन हो गया। वह 61 वर्ष के थे। उनके परिवार में पत्नी के अलावा एक पुत्र है जो अमरीका में रहता है। राय राइट टू एजुकेशन फोरम के संयोजक थे और देश के प्रमुख शिक्षाविदों से जुड़े थे। उन्‍होंने अपनी शिक्षा दीक्षा बुंदेलखंड और लखनऊ में की और वे वाम छात्र नेता भी थे। अम्बरीश राय 2010 से शिक्षा अधिकार कानून के क्रियान्वन आंदोलन से जुड़े थे। इसे लागू कराने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी।

अम्बरीश राय को सांस लेने में तकलीफ के कारण पिछले दिनों दिल्‍ली के अंबेडकर अस्पताल में भर्ती कराया गया था,जहां उन्हें बाद में किसी कोविड अस्पताल में भर्ती होने के लिए कहा गया। हालांकि, अस्पताल में बिस्तर न मिल पाने के कारण उनका समुचित इलाज नहीं हो सका और उन्होंने आज सुबह दम तोड़ दिया। उन्होंने 5 अप्रैल को कोविड का टीका भी लगाया था।

अंबरीश राय आप का जाना हमें भीतर तक झकझोर गया है। लगभग चार दशक पहले हम लोगों की मुलाकात लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई थी। हम सब भले अलग अलग राजनीतिक धारा के थे लेकिन क्रांति के सपने देखते थे। उसी दौरान दिनमान में अंतर्द्वद्व शीर्षक से मेरी कविता छपी जो क्रांति की मध्यमवर्गीय दुविधा के बारे में थी। उस दुविधा में मैं और मेरे जैसे तमाम लोग आज भी रहते हैं। लेकिन उसी दौरान हमारी मुलाकात अंबरीश राय और समरजीत सिंह भंडारी से हुई। वे दोनों एआईएसएफ से जुड़े थे और हम लोग समाजवादी धारा के थे। इसके बावजूद हम लोगों की सबसे समझदारी और सौहार्दभरी चर्चा इन्हीं लोगों से होती थी। हास्टल में हमारे बस्ती जिले के परमात्मा प्रसाद वर्मा थे जिनके नाते भी इन लोगों से अक्सर मुलाकात हो जाती थी।

अंबरीश राय को जबसे देखा और सुना तबसे अतुल कुमार अनजान के बाद सबसे अच्छे और कई बार तो उनसे ज्यादा ओजस्वी वक्ता के रूप में पाया। मैं तब अच्छा नहीं बोल पाता था। उस समय हमारी मंडली में पुनीत टंडन थे जो बहुत अच्छे वक्ता थे। एक बार वे बंगाली क्लब के डिबेट की शील्ड जीतकर लाए और कहा कि अंबरीश राय को हराकर आया हूं तो मैं पुनीत का लोहा मानने लगा। लेकिन विश्वविद्यालय छोड़ने और दिल्ली में पत्रकारिता करने के बाद अंबरीश राय से कई बार मुलाकात हुई और मुझे यह जानकर खुशी होती थी कि वे हमारा लिखा हुआ पढ़ते थे और उसके प्रशंसक थे। लेकिन उससे इतर वे बहुत गर्मजोशी और आत्मीयता से मिलते थे। हमारी सोसायटी में वे रंजन श्रीवास्तव के यहां आते थे और यहीं साहिबाबाद में शालीमार गार्डन में रहते थे। पता चला कि वे बीच में सीपीआई को छोड़कर सीपीआई एमएल में चले गए थे और अखिलेंद्र प्रताप सिंह के साथ काफी काम किया। बाद में एनजीओ नैफ्रे में सक्रिय हुए और काफी काम किया।

उनमें बहुत क्षमता थी और बहुत सारे लोगों को प्रेरित कर सकते थे। उनका इस तरह जाना क्रांति के एक बड़े सपने का जाना है। अंबरीश राय तुम बहुत याद आओगे और याद आएगा विश्वविद्यालय का पूरा दौर जिसमें डा प्रमोद श्रीवास्तव, प्रोफेसर आशुतोष मिश्र, डा रमेश दीक्षित, कृष्ण नारायण कक्कड़, सर्वजीत लाल वर्मा, रामकिशोर, राजीव, पुनीत टंडन, अंबरीश कुमार, आलोक जोशी, चंद्रदत्त तिवारी, भुवनेश मिश्र, चंद्रपाल सिंह, नागेंद्र, प्रभात, अनूप श्रीवास्तव , जैनेन्द्र जैन, रणवीर सिंह बिष्ट और डा रूपरेखा वर्मा जैसे तमाम लोग थे और समाज बदलने के बारे में निरंतर चिंतित रहते थे।

ऐसे तो नहीं जाना था मेरे दोस्त।

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