ये वक्त नामुराद है . . . . !

स्‍मृति शेष : डॉ. सुरेश मिश्र

राकेश दीवान

चौरासी साल का एक भरा-पूरा बेहद सम्पन्न जीवन गुजारने वाले सुरेश मिश्र को कैसे याद रखा जा सकता है? उनका एक बड़ा गुण था – सभी के प्रति ढेर सारा स्नेह। यह स्नेह उन लोगों के प्रति भी था जो उनसे किसी-न-किसी बात पर असहमत या नाराज रहते थे। इतिहास, जिसके वे ‘पंडित’ थे, की ही उनकी अनेक अवधारणाओं से कईयों की असहमति रहती थी। मसलन – वे इतिहास और उसमें समाहित राजनीति को गैर-जरूरी मानते थे। जो उन्हें जानते हैं उन्हें पता होगा कि अपने निजी जीवन में वे बेहद अनुशासित, संयमी और सात्विक थे, लेकिन इतना सब होने के बावजूद उनके जैसी सहजता बिरले ही लोगों में होती है।

अभी दो दिन पहले हम सबसे हमेशा के लिए विदा हुए सुरेश मिश्र का एक प्रिय शेर था – ‘ना जाने कब समेट ले दामन हयात का, ये वक्त नामुराद है मिलते रहा करो।’ इधर के सालों में जब भी उनसे मिला, उन्होंने सदा की तरह मुस्कुराते हुए न सिर्फ यह शेर सुना डाला, बल्कि बता भी दिया कि किसी दिन जब तुम आओगे तो संभव है, मैं सदा के लिए जा चुका होऊं। उनके बारे में सोच रहा हूं तो उनके संग-साथ के लंबे पचास-बावन साल रह-रहकर आंखों के सामने आ रहे हैं।

75-76 का साल था जब वे अपनी नौकरी के पहले मुकाम झाबुआ को छोड़कर होशंगाबाद के ‘नर्मदा महाविद्यालय’ में इतिहास पढ़ाने आए थे। जैसा कि होता है छोटे शहरों में पढ़ने-लिखने वालों का एक गुट सक्रिय रहा करता है और वहां आने वाला कोई भी धीरे-धीरे उस गुट का हिस्सा बन जाता है। सुरेश मिश्र भी उन दिनों होशंगाबाद के ‘परिमल’ समूह का हिस्सा बन गए, लेकिन इस गुट में उनकी भागीदारी थोड़ी भिन्न थी।

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वे उन दिनों देश के हिन्दी-जगत में ख्यात दैनिक अखबार ‘नई दुनिया’ में तरह-तरह के रोचक विषयों पर लिखा करते थे। उनके इस लेखन की शुरुआत भी मजेदार ढंग से हुई थी। हुआ यूं कि उनके एक-के-बाद-एक कई लेखों पर ‘नई दुनिया’ के संपादकीय विभाग ने कोई तवज्जो नहीं दी और न ही उन्हें लेख की स्वीकृति-अस्वीकृति के बारे में बताया। जब ये ही लेख दिल्ली के ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘जनसत्ता’ सरीखे अखबारों में छप गए तो मिश्र जी ने ‘नई दुनिया’ को लताड़ते हुए पत्र लिखा। उन्होंने लिखा कि जब एक ही तरह के लेख देश के महत्वपूर्ण अखबारों में छप रहे हैं तो उन्हें ‘नई दुनिया’ में छापने लायक क्यों नहीं माना जाता। बाद में ‘नई दुनिया’ ने उनके लेखों को विस्तार से महत्वपूर्ण पन्नों पर छापा।

उन दिनों होशंगाबाद जिले में ‘तवा आयाकट परियोजना’ से पैदा हुई दल-दलीकरण, लवणीकरण की समस्याओं को लेकर देश के महत्वपूर्ण गांधीवादी और हम सबके आदरणीय बनवारीलाल चौधरी की अगुआई में ‘मिट्टी बचाओ अभियान’ सक्रिय था। इस मसले पर हम सभी अपने-अपने तरीकों से लिखते रहते थे और बांध विरोध का शुरुआती आंदोलन होने के नाते यह देश के अनेक छोटे-बड़े अखबारों-पत्रिकाओं में छपा भी करता था। मिश्र जी ने तवा और उसकी सिंचाई से उभरी समस्याओं को लेकर खूब कलम चलाई। होशंगाबाद और उसके आसपास जहां भी तवा की समस्याओं को लेकर बैठक होती, मिश्र जी वहां पहुंच जाते और फिर लौटकर उस पर विस्तार से लिखते। अंतत: वे एक सरकारी कर्मचारी थे और उनके इस लेखन के चलते उन्हें भी चेतावनियां दी जाती रहीं, लेकिन इससे न तो उनका लिखना रुका और न ही अभियान में उनकी हिस्सेदारी।

यह देश में पर्यावरण के शुरुआती आंदोलनों का दौर था और कई महत्वपूर्ण विद्वानों की राय में यहीं से देश में पर्यावरण पर हिन्दी में लिखने की शुरुआत भी हुई थी। उन दिनों उत्तराखंड में ‘चिपको आंदोलन’ और मध्‍यप्रदेश में ‘मिट्टी बचाओ अभियान’ सक्रिय थे और दोनों को जोडने वाली कड़ी थे – अनुपम मिश्र। देश के दो छोरों पर अलग-अलग वृक्ष और मिट्टी बचाने वालों को आपस में मिल-बैठने की गरज से अनुपम ने दोनों समूहों के सदस्यों को एक-दूसरे के इलाकों में जाकर देखने-समझने की पहल की। इस पहल के तहत होशंगाबाद से एक समूह ‘चिपको आंदोलन’ के वृक्षारोपण शि‍विर में शामिल होने गया। सुरेश मिश्र उस समूह के एक वरिष्ठ सदस्य की तरह उसमें शामिल हुए। लौटने पर मिश्र जी ने ‘चिपको आंदोलन’ के अपने निजी और सामूहिक अनुभवों पर खूब लिखा।

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मिश्र जी की अनेक रुचियों में एक जंगल भी थे। यह एक तो शायद उनके वनाच्छादित मंडला के मूल-निवासी होने के कारण था और दूसरे उनके परिवार के अनेक वरिष्ठों के वन विभाग की नौकरी में होने के कारण। होशंगाबाद के बाद उन्हें मंडला में ‘कान्हा राष्ट्रीय उद्यान’ में प्रति-नियुक्ति पर एक ऐसा काम मिला जिसने उनके वन-प्रेम को फिर से जीवित कर दिया। उन दिनों मिश्र जी ने कान्हा के कौने-कौने में जाकर उसे समझा, उसका अध्ययन किया और फिर उस पर अनेक फिल्में, लेख, लघु-पुस्तिकाएं बनवायीं और उस मनोहारी जंगल और वहां के वन्य-प्राणियों का खूब प्रचार-प्रसार किया।

कान्हा के बाद वे वापस अपने मूल काम इतिहास के अध्यापन में लग गए, लेकिन इस बार उन्हें होशंगाबाद की बजाए खंडवा का ‘एसएन कॉलेज’ मिला। अस्सी के दशक के अंत का यह दौर बड़े बांधों खासकर नर्मदा पर बांधे जाने वाले ‘सरदार सरोवर बांध’ के विरोध का दौर था और देश में पहली बार खंडवा के पास डूब-प्रभावित हरसूद कस्बे में देशभर के हजारों पर्यावरण कार्यकर्ता जुटे थे। सितम्बर 89 में हुए इस ‘संकल्प मेले’ में मिश्र जी ने, सरकारी कर्मचारी होने के नाते, खुलकर तो कोई हिस्सेदारी नहीं की, लेकिन उसे लगातार सहयोग-समर्थन देते रहे। यदा-कदा उन्होंने इस विषय पर लिखा भी।

चौरासी साल का एक भरा-पूरा बेहद सम्पन्न जीवन गुजारने वाले सुरेश मिश्र को कैसे याद रखा जा सकता है? उनका एक बड़ा गुण था – सभी के प्रति ढेर सारा स्नेह। यह स्नेह उन लोगों के प्रति भी था जो उनसे किसी-न-किसी बात पर असहमत या नाराज रहते थे। इतिहास, जिसके वे ‘पंडित’ थे, की ही उनकी अनेक अवधारणाओं से कईयों की असहमति रहती थी। मसलन – वे इतिहास और उसमें समाहित राजनीति को गैर-जरूरी मानते थे। मैं कई बार सोचता हूं कि कोई कैसे उनकी तरह अपने जीवन को कड़े अनुशासन में बांधकर मुस्कुरा सकता है। जो उन्हें जानते हैं उन्हें पता होगा कि अपने निजी जीवन में वे बेहद अनुशासित, संयमी और सात्विक थे, लेकिन इतना सब होने के बावजूद उनके जैसी सहजता बिरले ही लोगों में होती है। एक तरफ, दवाओं को छोड़कर सुबह की सैर के भरोसे अपने दिल की बीमारी को दुरुस्त रख पाने की निष्ठा और दूसरी तरफ, घर बुलाकर खुद बनाकर भोजन करवाने का आग्रह, उनके अनुशासन और स्नेह की बानगी हैं।  

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महराजपुर (मंडला) के अपने छोटे से घर से निकलकर तरह-तरह की मेहनत-मशक्कत करके कोई डॉ. सुरेश मिश्र बनता है तो यह एक बड़ी बात है। उनका सदा के लिए विदा हो जाना इसीलिए नागवार गुजर रहा है कि अब उनके जैसे कमाल के इंसान को देख-सुन नहीं पाएंगे।   

सचमुच यह वक्त बेहद नामुराद है, डॉ. साहब ! (सप्रेस)

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