Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

नजरिया : खतरों से खेलता नेतृत्व

प्रेरणा

राजनेताओं और समाज का काम करने वालों का जीवन हमेशा ही खतरों के साये में रहता है और वे एक तरह से अपने काम इस समझ और तैयारी के साथ ही तय करते हैं। भारत में इसके अनेक उदाहरण हैं जहां नेताओं ने समाज का काम करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए हैं। हाल में प्रधानमंत्री के हरियाणा दौरे में बीच सडक पर उनके 15-20 मिनट रुकने की घटना को जिस तरह से मीडिया और सरकारी अमले ने पेश किया है, उसने इस खतरे को हास्यास्पद बना दिया है।

हर लोकप्रिय नेता खतरों के बावजूद अपनी जनता से रू-ब-रू होना जरूरी मानता है। जो ऐसा कर पाता है वह लोकनेता की पदवी को हासिल कर लेता है। जो ऐसा नहीं कर पाता, वह कुर्सी पर भले बैठा रहे, लोगों के मन से उतर जाता है। बात मन में यूं आई कि पंजाब में 15-20 मिनट लोगों के बीच फंसकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वापस लौटे तो प्रेस की मौजूदगी में अधिकारियों से कहा कि अपने मुख्यमंत्री को जाकर बताना कि मैं जिंदा लौट आया हूं ! 

यह सुनते ही तुरंत मन में एक लिस्ट बनने लगी कि ऐसे कौन-कौन से नेता थे जिन्होंने अनेक खतरों-विरोधों के बावजूद कभी उस जनता के बीच जाना नहीं छोड़ा जिन्होंने उन्हें सर आंखों पर बिठाया। उसी से उन्हें गोली और गाली दोनों मिली।

पहला नाम याद आया महात्मा गांधी का। उन पर भारत में पांच जानलेवा हमले हुए। पांचवां हमला हत्या के ठीक दस दिन पहले हुआ था। देश आजाद हो चुका था, उनके सारे शिष्य-सहयोगी प्रशासन की ऊंची कुर्सियों पर विराजे हुए थे। ऐसे में 20 जनवरी को उनकी प्रार्थना में पहुंच कर, उन पर बम फेंका गया। आजाद देश की आजाद सरकार ऊपर से नीचे तक हिल गयी। बम ऐसे आदमी पर फेंका गया था जिसे देश भी और दुनिया भी ‘बापू’ मानती थी, ‘महात्मा’ कहती थी। जाहिर था कि घबराई सरकार मामले की जांच करती, उनकी सुरक्षा कड़ी की जाती, लेकिन ‘शैतानों’ से निबटना आसान था, ‘महात्मा’ से नहीं ! गांधी महात्मा ने सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया। उन्हें अपने राम पर भरोसा था। राम ने उन्हें अपने पास बुला लिया। ‘हे राम !’  कहकर वे बहादुरी से विदा हुए।

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दूसरा नाम याद आया, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का। वे ‘महात्मा’ नहीं थीं, न वैसे किसी मूल्य को मानती थीं। प्रधानमंत्री थीं, सरकार की मुखिया थीं। पंजाब में फैले आंतकवाद का उन्होंने अपने तरीक़े से मुक़ाबला किया। जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनके शागिर्द जब आतंकवाद का किला बनाने स्वर्णमंदिर में जा छिपे, तो इंदिरा गांधी ने ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार’ सैन्य अभियान चलाने की इजाजत दी। सेना ने सबको मार गिराया – भिंडरावाले को भी ! खलिश होनी ही थी। हुई। सबने इंदिराजी से कहा कि वे सावधान रहें और अपने सिख अंगरक्षकों को बदल दें। इंदिराजी ने इस सलाह को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि सिख समुदाय यह जरूर समझेगा कि वे उसके या पंजाब के खिलाफ नहीं हैं। उन्होंने किसी बदनीयति से नहीं, स्वर्ण मंदिर को अपराधियों से मुक्त करने तथा उसकी गरिमा बनाए रखने के लिए यह काररवाई की। वे अपने विश्वास पर डटी रहीं, लेकिन सिख समुदाय के कुछ लोग न उन्हें समझ सके, न उनकी बात। इंदिरा जी का कत्ल हुआ।  

ऐसा ही राजीव गांधी के साथ हुआ। उन्होंने श्रीलंका में एलटीटीई द्वारा चलाए जा रहे तमिल आंदोलन को सुलझाने के लिए सैन्य काररवाई न केवल शुरू करवाई, बल्कि उसे अपनी परिणति तक पहुंचाने के लिए अंत तक डटे रहे। अस्सी के दशक में एलटीटीई का वैसा ही आतंक था जैसा आतंक बना तो फिर अलकायदा का बना। श्रीलंका के मामले में उलझना यानी खतरे को सीधा न्यौता देना था, पर राजीव अपने आकलन पर अड़े रहे। फिर हुई तमिलनाड के श्रीपेरंबदूर की वह सभा जिसमें प्रधानमंत्री राजीव गांधी बिना किसी भय के, आम लोगों के बीच घुसे, सबसे मिले और फिर वहां से जीवित निकल नहीं सके।

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हर किसी के लिए इस तरह की मौत लिखी हो, यह जरूरी नहीं। जयप्रकाश दूसरी तरह के बलिदानी हुए। एक ऐसा नायक जो हां में कि ना में, सुख में कि दुख में जनता के बीच से कभी गया ही नहीं। जनता ही उनका आराध्य रही। तब उम्र 70 पार कर रही थी जब लगा कि जनता की संविधानप्रदत्त स्वतंत्रता को कोई अपनी निजी सत्ता के लिए कुचलता जा रहा है। तो बीमारी के बिस्तर से उतरकर जनता के बीच आ खड़े हुए। उनका इस तरह उठ खड़ा होना तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को, यथास्थितिवादी राजनीतिक शक्तियों को पसंद नहीं आया। फिर उनके बच्चों पर लाठी-गोली-अश्रुगैस सब बरसाया गया, उन्हें जान से मारने की कई कोशिशें हुईं, लाठी के भरपूर वार से उन्हें सड़क पर गिरा दिया गया। कुछ नतीजा नहीं आया तो आजादी के इस महानायक को उसके ही देश की जेल में बंदी बनाया गया। उसे एक जिंदा लाश में बदल कर जेल से अंतिम सांस लेने के लिए रिहा किया गया तो उसने लोकतंत्र को एक नई सांस लेने की ताकत दी और देश को तानाशाही की तरफ फिसलने से बचा ले गया।

और फिर मुझे वे 700 से ज्यादा किसानों भी याद आई, जो तब तक सत्ता की बेशर्म ज्यादतियों से टकराते हुए सड़कों पर डटे ही रहे, जब तक उनकी सांस नहीं टूट गई ! आजादी के बाद का यह सबसे बलिदानी आंदोलन अभी-अभी हमारी आंखों के सामने था। अपने मूल्यों के लिए अपनी जनता के बीच हर हाल में बने रहना एक सत्याग्रह ही है। ऐसे सत्याग्रही घड़ी नहीं देखते कि सड़क पर 15 मिनट रहे कि 20 मिनट; न ऐसे सत्याग्रही कभी चिल्लाते हैं कि जिंदा बच आया ! लेकिन जिन्हें जनता से डर लगता है, उनका क्या? वे तो मुदित मन, शीशे की दीवारों से, कमांडो के साये में मन की बात सुनाते जाते हैं। उनके दरबारी ताली बजाते हैं। ‘सत्ताग्रही’ और ‘सत्याग्रही’ का यह फर्क नया साल कितनी आसानी से बता गया, हमें।

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फिर एक बार यह भी सोचें हम कि यह डर आता कहां से है? जिनको इस बात में विश्वास हो कि जो हम से सहमत नहीं, उनको मारने या मार डालने में कुछ भी गलत नहीं वे अक्सर इसी डर के साये में जीते हैं। हिंसा और डर एक ही सिक्के दो पहलू हैं ! (सप्रेस)

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