डाकू आत्‍म समर्पण के 50 बरस : चंबल में अहिंसा के प्रयोग

अशोक भारत

चंबल घाटी की दस्यु समस्या के समाधान के लिए जो काम सरकारें सदियों से नहीं कर पाई वह कार्य सर्वोदय कार्यकर्ता करने में सफल रहे। मैत्री से ही मिटे बैर को बाबा विनोबा तथा लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सर्वोदय के कार्यकर्ताओं ने अपनी लगन , निष्ठा एवं परिश्रम से सत्य साबित कर दिया। यह अहिंसा की ताकत है। इस दृष्टि से 1972 में बागियों के आत्मसमर्पण के स्वर्ण जयंती वर्ष में जौरा,मुरैना, मध्य प्रदेश में 14 से 16 अप्रैल,2022 का आयोजन ऐतिहासिक और सामयिक महत्व है। इस बागी आत्‍मसमर्पण के इतिहास की पहली किश्‍त।

डाकू आत्‍म समर्पण का इतिहास : प्रथम किश्‍त  

हिंसा का मुकाबला हिंसा से करने की जग की रीत रही है और इसकी सीमाएं भी जगजाहिर है । मानव सभ्यता के इतिहास में महात्मा गांधी संभवत:  पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने यह सिद्ध किया कि  हिंसा का जवाब अहिंसा से दिया जा सकता है । यह व्यक्ति और समाज दोनों का मूल्य हो सकता । पहले इसका सफल प्रयोग उन्होंने पहले दक्षिण अफ्रीका और फिर भारत ने किया। महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद विनोबा भावे ने इस कार्य  को आगे बढ़ाया।  पोचमपल्ली, तेलंगाना  से शुरू हुआ भूदान की गुंज पूरे विश्व में सुनाई दे रही थी । भला सदियों से हिंसा और दस्यु समस्या झेल रहे चंबल घाटी इससे कैसे अछूता रह सकता था। इसे ईश्वरीय संयोग समझे या विनोबा का चमत्कार की नैनी जेल में मृत्युदंड की सजा काट रहे तहसीलदार सिंह ने विनोबा को पत्र लिखकर फांसी से पहले उनके  दर्शन की इच्छा व्यक्त की, जो चंबल घाटी में शांति स्थापना की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ।

चंबल घाटी की डाकू समस्या का बहुत पुराना इतिहास रहा है । तोमर साम्राज्य के  राजा अनंतपाल को जब पृथ्वीराज चौहान द्वारा दिल्ली की गद्दी से उतार दिए  गया तो वे लोग चंबल घाटी में आकर बस गए।  राज्य सुख से वंचित राजकुमारों ने बगावत का झंडा उठाया और बागी कहलाए।  मुगल सम्राट बाबर ने अपने संस्मरण में चंबल के लुटेरे दस्युओं  का उल्लेख  किया है । सिकंदर लोदी, शेरशाह और अकबर सब के सब चंबल घाटी का लोहा मानते थे।  फतेहपुर सीकरी से अकबर ने राजधानी इसलिए परिवर्तित की कि चंबल घाटी के डाकू उनको वहां टिकने नहीं दे रहे थे। ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 13000 सैनिकों का एक विशाल सेना क्षेत्र के डाकुओं को समाप्त करने के लिए संगठित किया था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक चंबल घाटी  क्षेत्र में अस्थिरता,  अराजकता और कानून द्रोह  की समस्या निरंतर रही। आजादी मिलने के बाद इस क्षेत्र की डाकू समस्याओं में भी परिवर्तन आया । आपसी मनमुटाव एवं राजनीतिक दल बंदी आदि भी दिनोंदिन बढ़ने लगी। मान सिंह, लाखन, अमृतलाल, रूपा, पुतली, पाना, कल्ला, गब्बर आदि डाकुओं में भी आपसी मनमुटाव बढ़ता गया। सरकार ने इन को समाप्त करने के लिए तरह-तरह के प्रयत्न किए। परंतु नए डाकू बनना बंद नहीं हुआ। जनता सरकार और डाकुओं के बीच पिसती रही।

चंबल घाटी के डाकू समस्या के लिए यहां की भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिस्थितियों के साथ-साथ सामाजिक स्थिति भी जिम्मेदार है। बढ़ती हुई आबादी,  भूमि और धंधों की कमी, जातीय अहंकार और संघर्ष  ने समस्याओं को बढ़ावा दिया। एक और विशेषता इस क्षेत्र में है। किसी गांव में एक जाति के लोग अधिक रहते हैं तो उस गांव में दूसरी अल्पसंख्यक जाति के लोग को अपने अधीन दबाकर रखना चाहते  हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्थिति में परिवर्तन आने में चुनाव ने बड़ा काम किया है।

 यद्यपि चंबल घाटी में डाकू समस्या के लिए आर्थिक कारण ही प्रमुख है।  इसके अतिरिक्त यहां के बीहड़ों  और डांग में डाकुओं के छिपने  की सुविधा , खेती योग्य भूमि और उद्योग का अभाव और घाटी में लाइसेंस धारी और बिना लाइसेंस धारी बंदूकों की हजारों की संख्या में उपलब्ध  होना  यहां की दस्यु  समस्या के मुख्य रूप से  जिम्मेदार हैं। इसके अलावा  शिक्षा का अभाव, यातायात और आवागमन के साधनों का अभाव तथा राजनीतिक दलों की भूमिका भी समस्या को प्रभावित करते रहे हैं।

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मानवीय सभ्यता के इतिहास में अपराध का सामना करने की दो दृष्टियां  रही है। एक दृष्टि तो यह है कि  अपराध को कठोर दंड से ही रोक आना संभव है।  दूसरी दृष्टि सुधारवादी है जो यह मानती है कि अपराध एक मनोवैज्ञानिक विकृति है, जिसे रोग की तरह लेना चाहिए और अपराधी को सुधरने का मौका मिलना चाहिए । पिछले 900 वर्षों में शेरशाह सूरी, अकबर, वारेन हेस्टिंग्स, कर्नल स्लीमन, सिंधिया शासकों और के  एफ रुस्तमजी  पुलिस अधिकारियों ने कठोरता के साथ डाकुओं के उन्मूलन अभियान के लिए प्रयास किए । लेकिन हिंसा से  हिंसा समाप्त करने का प्रयास सफल नहीं  हुए ।

मध्यप्रदेश के शासन द्वारा 1957 में जब पूरी शक्ति से दस्यु विरोधी अभियान चलाया जा रहा था उन्हीं दिनों पुलिस उपमहानिरीक्षक  एच एस कोहली ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर यह सुझाव दिया था कि सरकार को दस्यु समस्या के समाधान के लिए विनोबा भावे का सहयोग लेना चाहिए। इस बीच 21 जनवरी, 1959 को तहसीलदार सिंह, जो मान सिंह का पुत्र था और नैनी जेल में सजा काट रहा था, उसे 242 वर्ष की सश्रम कारावास और 6 प्रकरणों में मृत्युदंड की सजा हुई थी, ने विनोबा भावे को पत्र लिखकर फांसी की सजा मिलने से पहले उनके दर्शन का अनुरोध किया । 1959 के जुलाई में भिंड जिला कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष हर सेवक मिश्र  और सर्वोदय कार्यकर्ता प्रेम नारायण शर्मा बाबा विनोबा  से कश्मीर जाकर मिले तथा चंबल घाटी में सर्वोदय के प्रयोग का निवेदन किया था। इस मुलाकात में मेजर जनरल यदुनाथ सिंह भी उपस्थित थे। मेजर जनरल यदुनाथ सिंह उस समय कश्मीर लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष थे और कश्मीर सरकार ने उन्हें विनोबा के राज्य में पदयात्रा की व्यवस्था का प्रभारी नियुक्त किया था। विनोबा ने मेजर जनरल यदुनाथ सिंह को तहसीलदार सिंह से मिलने के लिए नैनी जेल भेजा । विनोबा ने पिछले महीने विभिन्न माध्यमों से हुए अनुरोध को स्वीकार करते हुए चंबल घाटी की यात्रा की स्वीकृति दे दी।

मेजर जनरल यदुनाथ सिंह ने तहसीलदार सिंह से नैनी जेल में मुलाकात की। इस का बड़ा सकारात्मक परिणाम निकला । तहसीलदार सिंह  से मुलाकात के बाद मेजर जनरल यदुनाथ सिंह बीहड़ों में तहसीलदार सिंह के साथियों से मुलाकात की। यह उन्हीं के प्रयासों का परिणाम था कि 1960 में विनोबा के चंबल यात्रा के दौरान 20 बागियों ने आत्मसमर्पण किया। बागियों के समर्पण में मेजर जनरल यदुनाथ सिंह की भूमिका का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी मृत्यु पर विनोबा भावे ने अपने संदेश में कहा कि भिंड, मुरैना का सारा काम उनके आधार पर था। वहां उन्होंने बड़ा पराक्रम किया,  काफी मेहनत की वे न  होते तो यह काम हरगिज़ नहीं हो सकता था। अपने अभियान के क्रम में मेजर जनरल यदुनाथ सिंह ने श्रीमती इंदिरा गांधी और डॉक्टर सुशीला नैयर  के साथ राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद से मुलाकात कर  तहसीलदार सिंह की क्षमा याचना पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने तथा मृत्युदंड को आजीवन कारावास में परिवर्तित करने का अनुरोध किया । बाद में राष्ट्रपति कार्यालय ने तहसीलदार सिंह के मृत्यु को आजीवन कारावास में परिवर्तित करने के  अनुरोध को स्वीकार कर इस आशय के आदेश जारी किए।  मेजर जनरल यदुनाथ सिंह ने जिस निष्ठा, लगन एवं उत्साह के साथ इस कार्य को अंजाम तक पहुंचाया इसी का परिणाम था कि चंबल घाटी के लोगों में वे भगत जनरल के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

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पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आचार्य विनोबा भावे जब अपने चंबल अभियान के आरंभिक चरण में 5 मई,  1960 को आगरा पहुंचे तब तक सारे देश की उत्सुक निगाहें उन पर लगी हुई थी । पालीवाल पार्क में उसी शाम होने वाली सभा में 30,000 से अधिक श्रोता उपस्थित थे । 7 मई तक विनोबा आगरा में रुके। इस प्रवास काल में उनसे राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं, सर्वोदय कार्यकर्ताओं तथा सामान्य नागरिकों ने भेंट की । केंद्रीय गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री संपूर्णानंद,  केंद्रीय परिषद के सदस्य डॉ डी एन दातार, योजना आयोग के सदस्य श्रीमन्नारायण, दिल्ली विश्वविद्यालय के उप कुलपति वी के आर वी राव जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों से बंद कमरे में विनोबा  की लंबी वार्ताओं का दौर चला। उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के कुछ मंत्रियों और पुलिस अधिकारियों ने भी विनोबा से भेंट की।

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मध्य प्रदेश सरकार ने विनोबा की पदयात्रा के दौरान एक प्रकार के अघोषित युद्ध विराम जैसी स्थिति अंत तक बनाए रखी ।  मेजर जनरल यदुनाथ सिंह और अन्य सर्वोदय कार्यकर्ताओं के डाकू से संपर्क के रास्ते में कोई व्यवधान नहीं खड़े किए गए और न ही उनके विरुद्ध किसी तरह की कानूनी कार्रवाई की गई।  पदयात्रा के दौरान शिविरों में डाकुओं का आवागमन पुलिस की निगाहों के सामने होता था और वह मूकदर्शक की भांति तटस्थ  रहती थी । इसके अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का सहयोग मध्यप्रदेश पुलिस ने नहीं किया । पदयात्रा के दौरान 22 मई,1960 को भिंड में राज्यपाल पाटस्कर प्रार्थना सभा में स्वयं  डाकुओं के विनोबा के सामने समर्पण के साक्षी के रूप में  उपस्थित थे। इससे पूर्व  21 मई,1960 की  रात्रि को आकाशवाणी ने चंबल घाटी में छिपे हुए दस्यु  दलों के नाम विनोबा का एक संदेश प्रसारित किया था। जिसमें विनोबा ने अपना दृढ़ मत व्यक्त किया था कि हिंसा के उपायों से दस्यु समस्याओं को नहीं सुलझाया जा सकता ।

1960 के आत्मसमर्पण का पूरा कार्य सर्वोदय कार्यकर्ताओं का ही प्रयास था। केंद्रीय सरकार की सद्भावना के कारण मध्य प्रदेश सरकार और पुलिस ने मतभेद होते हुए भी इसमें व्यवधान उत्पन्न नहीं किया। लेकिन किसी प्रकार का सहयोग भी इस पक्ष में से नहीं मिला। रुस्तम जी जैसे अधिकारी अंत तक इस प्रक्रिया को स्वीकार नहीं कर पाए और इसकी खुली आलोचना करते रहे।

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26 मई,1960 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने बधाई संदेश में कहा आज सारा राष्ट्र आपके इस कार्य की ओर आस्था और प्रसंनता की दृष्टि से देख रहा है जिसके द्वारा आप डाकुओं में उत्तम एवं नैतिक भावना जागृत करने में सफल हुए हैं और जिसके द्वारा उन्होंने उत्साहित होकर आत्मसमर्पण  किया है। मैं आपके उद्देश्य के  पूर्ण सफलता के लिए कामना करता हूं एवं आपके प्रति सद्भावना और सम्मान प्रकट करता हूं।

1960 में बाबा विनोबा की पदयात्रा के दौरान चंबल घाटी में शांति स्थापना का, जो  बीजारोपण हुआ था, वह 1972 में परवान चढ़ा,जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 502 बागियों ने आत्मसमर्पण किया जो किसी चमत्कार से कम नहीं था।  दरअसल चंबल घाटी के कुख्यात बागी माधो सिंह, जिन पर 50 हत्या, 40 डकैती, 90 अपहरण का आरोप था, ने 26 जून 1971 को राम  सिंह ठेकेदार के नाम से विनोबा भावे से पवनार में मुलाकात की।  विनोबा  ने उन्हें जयप्रकाश नारायण से मिलने की सलाह दी। अक्टूबर के प्रारंभ में माधो सिंह ने पटना में जयप्रकाश नारायण से मुलाकात की। पहले दिन की मुलाकात का कोई परिणाम नहीं निकले पर दूसरे दिन फिर से जयप्रकाश से मुलाकात की। इस मुलाकात में माधो सिंह, जो राम सिंह ठेकेदार के नाम से उनसे मिला था,अपने आप को प्रकट कर दिया । जयप्रकाश ने उसे आश्वासन दिया कि वह उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकारों से संपर्क करेंगे यदि उन्होंने अनुकूल प्रतिक्रिया व्यक्त की तब  इस संबंध में सोचेंगे।

जयप्रकाश नारायण ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल और राजस्थान के मुख्यमंत्री बरकतुल्लाह खान को पत्र लिखें । उन्होंने केंद्र सरकार से भी संपर्क किया।  उन दिनों प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और जयप्रकाश नारायण के संबंध बहुत अच्छे थे।  उन्हें सभी पक्षों से अनुकूल प्रतिक्रिया प्राप्त हुई। उन्होंने चंबल घाटी शांति समिति में काम करने वाले महावीर सिंह और हेम देव शर्मा से भी पटना बुलाकर बातचीत की और चंबल के डाकुओं से संपर्क करने का निर्देश दिया। गांधी स्मारक निधि ( केंद्रीय ) के तत्कालीन मंत्री देवेंद्र कुमार गुप्ता को भी इस कार्य में शामिल किया । शांति मिशन के कार्यकर्ताओं को पंडित लोकमान तथा तहसीलदार सिंह,  जो जयप्रकाश जी के प्रयास से 18 वर्ष के बाद जेल से मुक्त हुए थे, का भी भरपूर सहयोग मिला। इधर पटना से लौटने के बाद मधो सिंह पूरी तरीके से आत्मसमर्पण के कार्य में लग गया।

13 दिसंबर ,1971 को जयप्रकाश नारायण ने चंबल घाटी के डाकू के नाम एक अपील जारी की। उन्होंने बागियों से अपनी गतिविधियों को बंद करने और हिम्मत के साथ समाज के सामने आत्मसमर्पण की अपील की । उन्होंने बागी  भाइयों से कहा कि अपना रास्ता छोड़कर देश के काम में सहयोग करें।  उन्होंने यह भी कहा कि वह केंद्रीय  गृह राज्य मंत्री के सी पंत,  मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी तथा राजस्थान के मुख्यमंत्री बरकतुल्लाह खां के संपर्क में है और उन्हें इस कार्य में उनकी पूरी सहानुभूति है। (शेष दूसरी किश्‍त में)

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