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सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

श्रम : क्यों करें सप्ताह में सत्तर घंटे काम?

प्रेरणा

पिछले दिनों उद्योगपति नारायण मूर्ति के हवाले से युवाओं को सप्ताह में सत्तर घंटे काम करने की सलाह दी गई है। सवाल है कि इतना काम करके देश और उसकी युवा आबादी को क्या हासिल होगा? क्या इतनी सारी मेहनत उसी विकास में इजाफा करेगी जिसे अनुभव और नतीजों की बिना पर आजकल विनाश कहा जाने लगा है?

जाने-अनजाने ‘इंफ़ोसिस’ के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति ने देश में एक बहस छेड़ दी है। मोहनदास और नारायण मूर्ति किसी दौर में साथ काम करते थे। एक पोडकास्ट में दोनों चर्चा कर रहे थे कि विकास की रफ़्तार कैसे बढ़ाई जाए। नारायण मूर्ति ने उस बातचीत में कहा था कि देश के विकास के लिए नौजवानों को चाहिए कि वे सप्ताह में 70 घंटे काम करें। उन्होंने उदाहरण देते हुए यह भी कहा था कि जिस तरह जर्मनी, जापान ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अपने देश को खड़ा करने के लिए जी-जान से मेहनत की, भारत के नौजवानों को भी वैसी ही मेहनत करनी होगी।

नारायण मूर्ति ने काम करने को कहा, लोग बात करने पर टूट पड़े। देश के कोने-कोने से, हर उम्र व पेशे के लोगों ने मूर्ति का ऐसा प्रतिवाद किया जैसे किसी ने उनकी दुखती रग पर पांव रख दिया हो। प्रतिक्रिया आई कि भारतीय दरअसल कितने घंटे काम करते हैं? शहरों में काम करने वालों के घंटे किस तरह गिनेंगे? अपने काम पर जाने के लिए जो लोग घंटों सफर में बिताते हैं, वे इस हिसाब में जुड़ेंगे या नहीं? महिलाओं का क्या, जो चौबीस घंटे, सातों दिन घर के काम करती हैं, बच्चे संभालती हैं और कमाई भी करती हैं? गांव में किसान बिजली के इंतजार में रात-रात भर जागते हैं, उसका हिसाब कौन रखेगा? 

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बड़ी संख्या में मजदूर दूसरे राज्यों में जाकर सप्ताह में 70 घंटे से कहीं ज्यादा मेहनत करते हैं ताकि चार पैसे बचाकर घर भेज सकें। कोविड के दौरान जब हजारों कामगार शहरों से अपने गांव की तरफ़ लौटने लगे थे तब कहीं देश और इसके शासकों को पहली बार पता चला था कि दौड़ते-भागते हमारे आधुनिक शहर किसके कंधों पर खड़े हैं ! ट्विटर पर एमके निधि बताते हैं कि केरल से प्रति सप्ताह चलने वाली 35 सीटों की एक बस ओडिशा के लिए एक सीट का 3500 रूपये किराया लेती है और कभी खाली नहीं चलती। कोई हिसाब लगाएगा कि ये मजदूर प्रति सप्ताह कितनी मेहनत करते होंगे ताकि टिकट और अपने दैनिक खर्च निकाल सकें तथा घर भी पैसे भेज सकें?     

विकास एक आधुनिक परिकल्पना है। ज्यादा-से-ज्यादा और जल्दी-से-जल्दी पाने की तीव्र इच्छा विकास की गाड़ी को दौड़ाते हैं। यह सपना देखना और दिखाना कि कैसे कोई एक आदमी पांच रुपया और लोटा लेकर गांव से चला था और कुछ ही वर्षों में देश का सबसे अमीर आदमी बन गया, विकास की कहानी का एक अध्याय लिखता है। फिर यह कि कितनी जल्दी हम पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का ओहदा हासिल करें, दुनिया की तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बन जाएं, यह विकास की दूसरी कसौटी है। आज तो इसे एक राष्ट्रीय उद्देश्य का दर्जा ही दे दिया गया है।

कहा जा रहा है कि इसके लिए देश का हर नागरिक हाड़तोड़ मेहनत करे, एक सप्ताह में 70 घंटे तो कम-से-कम करे ही ! इन सभी सपनों में जो बात छिप जाती है या छिपायी जाती है वह यह है कि एक किसान / मजदूर या कारकून के लिए ईमानदारी से मेहनत करते हुए करोड़पति बनना वह सपना है जो कभी साकार नहीं होगा। ऐसे सपने दिखाकर कुछ गिने-चुने लोग तेजी से देश के सबसे अमीर आदमी बन सकते हैं, यह तो हम प्रत्यक्ष देख ही रहे हैं। इस खेल की शर्त ही यह है कि सभी जी-जान लगाकर दौड़ें, ताकि कोई एक या दो जीत सके और राष्ट्रीय गर्व का प्रतिमान खड़ा कर सके।   

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क्या यह बात सूर्य की तरह साफ़ नहीं है कि हमारे समाज में पूंजी और बुद्धि को अनुपातहीन और बेमेल महत्व दिया गया है? वैसे सभी जानते हैं कि बिना श्रम के पूंजी का कोई अर्थ नहीं है, लेकिन मानते नहीं हैं। जीवन के लिए यदि ये दोनों जरूरी हैं तो यह भी जरूरी है कि इनकी हैसियत बराबर की मानी जाए। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि बीमारी की रोकथाम ज्यादा महत्वपूर्ण है या उसका इलाज? आप झट से जवाब देंगे : रोकथाम ज़्यादा महत्वपूर्ण है ! लेकिन अगर रोकथाम ज्यादा महत्वपूर्ण है तो हमारा सफाई कर्मचारी उस रोकथाम का पहला सिपाही है; उस सफाई कर्मचारी को डॉक्टर से पहले  रखना चाहिए। यही बात खेती और उद्योग पर भी लागू होती है। पूंजी, बुद्धि और श्रम का ऐसा गलत समीकरण हमने बना रखा है कि श्रम को पूंजी के सामने हम कुछ मानते ही नहीं हैं।  

नारायण मूर्ति इसी के भोले शिकार हैं। कंप्यूटर, सॉफ्टवेर और अब अर्टिफीशियल इंटेलिजेंस- इन सबकी दिशा में हम गए ही इसलिए कि इंसानी मेहनत / श्रम को बचाया जा सके या उस पर होने वाला खर्च कम किया जा सके। हमारी स्कूली शिक्षा विद्यार्थियों को पढ़ाती है कि श्रम करना नीचा है, उससे कोई विकास नहीं होता। शिक्षा व व्यवस्था तो ऐसी बनाई है मूर्ति जैसों ने और फिर कहते हैं कि 70 घंटे युवकों को मेहनत करनी चाहिए !

मनुष्य अपनी रोजी-रोटी के लिए श्रम करता है ! जब रोटी महंगी हो जाती है तो वह और ज्यादा मेहनत करता है। अभाव में जीने वाले करोड़ों लोग पहिए पर दौड़ने वाले चूहे की तरह सतत दौड़ते रहते हैं। पूंजी पर चलने वाली व्यवस्था का यह आधारभूत नियम है कि पूंजी तभी तेजी से बढ़ सकती है जब श्रम सस्ता हो; नैसर्गिक संसाधनों को लूटने की खुली छूट हो; सरकारी टैक्स कम-से-कम हों; टैक्स की चोरी व्यवस्था के भीतर की जा सकती हो। इसलिए नारायण मूर्ति जैसे लोग जब युवाओं से 70 घंटे मेहनत की बात करते हैं तब वो उनकी बात करते हैं जिनके श्रम का कोई मोल नहीं और विकास के पहिये में सभी जुत जाएं, ताकि दो-चार लोग दुनिया के सबसे अमीरों में अपना नाम लिखवाएं और विश्वगुरु बन जाएं।

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गांधीजी जब ‘दूसरी गोलमेज परिषद’ के लिए इंग्लैंड गए थे तो उनसे बार-बार निवेदन किया गया था कि आप यहां तक आ ही गए हैं तो अमेरिका के लोगों के बीच पहुंचकर, उन्हें भी अपना संदेश दें। आइंस्टाइन ने भी गांधीजी से ऐसा ही अनुरोध किया था। गांधीजी ने जवाब में तब जो कहा था वही आज भी भारत व दुनिया के लिए सबसे मतलब की बात है। उन्होंने कहा था कि जब तक अमेरिका पूंजी के पीछे की अपनी पागल दौड़ छोड़ता नहीं है, उसे देने के लिए मेरे पास कुछ है ही नहीं। इसलिए मूर्ति यदि 70 घंटे की मेहनत की पैरवी के साथ यह भी बता सकें कि युवाओं को इतनी मेहनत क्यों करनी चाहिए, तो गांधीजी और हमारा सबका ज्ञानवर्धन हो सकेगा। (सप्रेस) 

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