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ग्रामीण आजीविका : बकरी के महत्त्व को कम मत आंकिए

ग्रामीण आजीविका : बकरी के महत्त्व को कम मत आंकिए

महात्मा गांधी की प्रिय बकरी की हैसियत जानना हो तो किसी भी आदिवासी समाज में चले जाइए। वहां बकरी न सिर्फ दुधारू जानवर, बल्कि लगभग बेंक का दर्जा रखती है। वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ने पर बकरी बेचकर लोग अपना काम चला...

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महात्मा गांधी की प्रिय बकरी की हैसियत जानना हो तो किसी भी आदिवासी समाज में चले जाइए। वहां बकरी न सिर्फ दुधारू जानवर, बल्कि लगभग बेंक का दर्जा रखती है। वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ने पर बकरी बेचकर लोग अपना काम चला लेते हैं। कैसे किया जाता है, इसी बकरी का पालन-पोषण?


ग्रामीण पशुपालन में प्रायः गाय और भैंस को अधिक महत्त्व दिया गया है, पर अनेक निर्धन परिवारों से पूछने पर पता चलेगा कि उनके लिए बकरी-पालन का महत्त्व इससे कम नहीं है, शायद अधिक ही हो। अधिकांश निर्धन परिवारों के पास गाय और भैंस की संभावना अपेक्षाकृत कम होती है, जबकि कुछ बकरियां होने की संभावना कहीं अधिक है। यदि कम समृद्ध ग्रामीण परिवारों की दृष्टि से देखें तो बकरी पालन पशुपालन का अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष माना जा सकता है।

बकरी पालन के इस महत्त्व को समझते हुए ‘सृजन’ संस्था ने ग्रामीण आजीविका सुधारने के अपने प्रयासों में इसे समुचित महत्त्व दिया है व अनेक स्तरों पर बकरी-पालन आधारित आजीविका को सुधारने का प्रयास अपने अनेक कार्यक्षेत्रों में किया है। मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में ‘सृजन’ के कार्यकर्ताओं ने बकरी-पालन संबंधी अपने पांच प्रयासों के बारे में बताया। पहला प्रयास तो यह है कि बकरियों के रहने के स्थान को अधिक स्वच्छ व सुरक्षित बनाया जाए। विशेषकर मेमनों के लिए अधिक सुरक्षित, अलग स्थान की व्यवस्था करने का प्रयास किया गया।

दूसरा प्रयास यह हुआ कि बकरियों के लिए बेहतर चारे की व्यवस्था की गई। उनके लिए अधिक पौष्टिक आहार तैयार किया गया। साथ में सामान्य पत्ते के चारे से भी धूल हटाकर, अधिक स्वच्छ रूप से खिलाने पर ध्यान दिया गया। आसपास के स्थानों में जहां बेहतर नस्ल की बकरी मिली वह उपलब्ध करवाई गई। बिक्री के बेहतर अवसर उपलब्ध करवाए गए। अंत में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रयास बकरियों की बीमारी के इलाज के लिए गांव के भीतर ही सुविधा उपलब्ध करवाने का प्रयास किया गया।

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अनेक बकरी पालक बताते हैं कि बकरी का इलाज समय पर न होने के कारण इनकी मृत्युदर कई बार अधिक हो जाती है। इसके लिए ‘सृजन’ का उपाय है कि गांव में ही महिलाओं को बकरी के इलाज का प्रशिक्षण देकर ‘पशु-सखी’ तैयार की जाएं जिससे उचित समय पर व कम खर्च पर बकरियों का इलाज हो जाए और इसके लिए दूर न जाना पड़े। इसके साथ ही गांवों में अनेक महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका का एक नया स्रोत मिल जाए।

शिवपुरी के गांवों में ऐसी ‘पशु-सखी’ बहुत सक्षम रूप में आगे आई हैं। सीमा जाटव ने इस कार्य में इतनी दक्षता प्राप्त कर ली है कि अब उनकी सेवाओं का उपयोग अन्य ‘पशु-सखियों’ को प्रशिक्षण देने के लिए होता है। उन्हें प्राकृतिक खेती में भी दक्षता प्राप्त है व वे इसका प्रशिक्षण भी देती हैं। मनीषा लोधी ने सामाजिक कार्य में शिक्षा प्राप्त की है। वे ‘पशु-सखी’ की भूमिका निभाने के साथ-साथ एक ‘प्राकृतिक शिक्षा केन्द्र’ भी चला रही हैं। इसके अतिरिक्त वे रात को सिलाई कार्य भी करती हैं। इस तरह की कुछ महिलाएं कई जिम्मेदारियां निभाते हुए ग्रामीण नेत्तृत्व में भी आगे आ रही हैं व मेहनत तथा निष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं।

मध्यप्रदेश के ही टीकमगढ़ जिले में अनेक ऐसी ‘पशु-सखियां’ हैं जिन्होंने आजीविका के इस नए स्रोत के बल पर अपने परिवार की नाजुक आर्थिक स्थिति को संभाल लिया है। भारती अहिरवार नादिया गांव की ऐसी ही दलित महिला हैं। उन्होंने लखनऊ जाकर ‘पशु-सखी’ का प्रशिक्षण प्राप्त किया और बकरियों की बीमारी, पोषण, वैक्सीन आदि के बारे में बहुत कुछ सीखा। जब वे अपनी नई यूनीफार्म पहनकर व दवाओं का बैग तैयारकर दूसरे घरों में बकरी के इलाज के लिए जाने को तैयार हुईं, तो आस-पड़ौस के कुछ लोगों ने मजाक उड़ाया व छींटाकशी की, पर भारती ने इसकी परवाह नहीं की। अनेक बकरियों का सफल इलाजकर उन्होंने शीघ्र ही गांव में नया सम्मान प्राप्त कर लिया। गांववासियों ने भी महसूस किया कि गांव में ही अगर बकरी को सही समय पर इलाज मिल जाए तो उपयोगी होगा और इस पर खर्च भी बहुत कम होगा। भारती ने उन्हें बीमारी से बचाव के उपाय बताने भी शुरू किए व अपने पास उपलब्ध बकरी के अधिक पौष्टिक आहार के विषय में भी बताया।

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जहां भारती की सेवाओं से गांव के स्तर पर बकरी पालन में सुधार हुआ, वहां भारती ने अपनी नई जानकारी का लाभ उठाकर अपने परिवार में भी बकरी पालन को बढ़ावा दिया। इस तरह भारती को पहले वर्ष में लगभग 60,000 रुपए की आय हुई तो उन्होंने इसका उपयोग अपने बच्चों की शिक्षा सुधारने में किया। टीकमगढ़ जिले में ‘पशु-सखी’ के प्रयास ने शीघ्र ही उल्लेखनीय प्रगति की व इससे उत्साहित होकर ‘सृजन’ ने इसका प्रसार कुछ अन्य जिलों में भी किया। यहां ‘सृजन’ के समन्वयक राकेश सिंह ने बताया कि जितनी उम्मीद थी, उससे कहीं अधिक सफलता इन ‘पशु-सखियों’ ने प्राप्त की है।

ऐसी ही एक सफल ‘पशु-सखी’ ने बकरी पालन संबंधी एक सर्वेक्षण भी अपने गांव बिजरावन में किया। इस सर्वेक्षण में यह स्पष्ट हुआ कि गांव में लगभग 90 प्रतिशत परिवारों ने बकरियां पाली हुई हैं। औसतन एक परिवार के पास 5 से 10 बकरियां पाई गईं। इससे पता चलता है कि ऐसे अनेक गांवों के लिए बकरी पालन कितना महत्त्वपूर्ण है। विशेषकर कठिन समय में बकरी पालन से राहत मिल जाती है। इस स्थिति में ‘सृजन’ ने पशुपालन के क्षेत्र में बकरी पालन को प्रोत्साहित करने को प्राथमिकता दी व अनेक गांवों में बकरी पालन की स्थितियों में सुधार किया। इसके साथ अनेक महिलाओं को आजीविका का नया सम्मानजनक स्रोत मिला व महिला नेत्तृत्व को भी प्रोत्साहन मिला। हालांकि ‘सृजन’ के अधिकांश प्रयास बकरी पालन में सुधार के हैं, पर कुछ स्थानों पर संस्था ने निर्धन परिवारों को बकरियां उपलब्ध भी करवाई हैं। सरकारी कार्यक्रमों के साथ तालमेल बनाकर भी बकरी पालन को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। (सप्रेस)

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