अध्‍ययन : आमदनी में पारंपरिक खेती से आगे नहीं प्राकृतिक खेती, न ही आहार विविधता में दिलाती है खास बढ़त

सचिन श्रीवास्तव

देश में रासायनिक और प्राकृतिक खेती के बीच जारी बहस को एक नए अध्ययन ने नया मोड़ दिया है। रामकृष्ण मिशन विवेकानंद एजुकेशनल एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि प्राकृतिक खेती न तो आय में पारंपरिक खेती से आगे है, न ही आहार विविधता में। बल्कि यह वर्ग, जाति और शिक्षा के आधार पर एक नई सामाजिक संरचना को रेखांकित करती है, जहाँ टिकाऊपन तो है, पर समानता नहीं।

देश में खेती-किसानी के तरीकों को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर आधारित पारंपरिक खेती को जहां अधिक उत्पादन देने वाला माना जाता है, वहीं प्राकृतिक खेती को टिकाऊ, स्वास्थ्यकर और पर्यावरण के अनुकूल बताया जाता है। लेकिन हाल ही में किए गए एक अध्ययन ने इस बहस को नए सिरे से खोल दिया है। अध्ययन में पाया गया है कि प्राकृतिक खेती न तो आमदनी के मामले में पारंपरिक खेती से आगे है और न ही आहार विविधता में कोई खास बढ़त दिलाती है। बल्कि यह वर्ग, जाति और शिक्षा के आधार पर एक अलग सामाजिक संरचना को सामने लाती है।

यह अध्ययन ‘रामकृष्ण मिशन विवेकानंद एजुकेशनल एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर एंड रूरल डवलपमेंट की ओर से किया गया। इसमें हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड को शामिल किया गया। अध्ययन का उद्देश्य था- प्राकृतिक खेती का पोषण पर क्या असर है और यह व्यापक सामाजिक-आर्थिक संरचना में किस तरह शामिल होती है।

अध्ययन में पाया गया कि प्राकृतिक खेती करने वाले परिवारों के पास खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता अधिक है। वे अपने लिए भोजन का अधिकांश हिस्सा खुद पैदा कर लेते हैं और बाज़ार पर कम निर्भर रहते हैं। इसके उलट पारंपरिक किसान अधिकतर खाद्य सामग्री के लिए बाज़ार पर निर्भर रहते हैं।

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आम धारणा यह रही है कि प्राकृतिक खेती करने वाले परिवार ज्यादा पोषणयुक्त भोजन करते होंगे। लेकिन अध्ययन ने यह मिथक तोड़ दिया। दोनों ही समूहों के खानपान में कोई बड़ा अंतर नहीं मिला। यहाँ तक कि आहार विविधता पारंपरिक खेती करने वालों में थोड़ी अधिक पाई गई, क्योंकि वे बाज़ार से अलग-अलग खाद्य वस्तुएँ खरीद लेते हैं।

प्राकृतिक खेती करने वाले किसान हरित खाद, जैविक तरल खाद, वर्मी-कम्पोस्ट जैसी तकनीकों को प्राथमिकता देते हैं। यह टिकाऊ खेती का उदाहरण है। लेकिन अध्ययन में यह भी पाया गया कि पारंपरिक किसान भी अब इन तरीकों को अपनाने लगे हैं—जैसे शून्य जुताई, न्यूनतम जुताई, हरी खाद और जैव-उर्वरक का उपयोग। यानी दोनों पद्धतियों के बीच का अंतर धीरे-धीरे धुंधला होता जा रहा है।

इस बारे में एग्रोइकोलॉली विशेषज्ञ और अध्ययन दल के सदस्य अंशुमन दास प्राकृतिक और पारंपरिक खेती की तुलना कोई काले-सफेद जैसी स्थिति नहीं है। दोनों के बीच की रेखाएं धुंधली हैं। जरूरत है गहराई से समझने की कि टिकाऊ और लाभकारी खेती कैसे आगे बढ़ाई जाए।

यह है फर्क

हालांकि एक फर्क यह सामने आया कि पारंपरिक खेती करने वाले किसान कृषि के अलावा अन्य आय स्रोतों- जैसे सरकारी या निजी नौकरी पर निर्भर रहते हैं, जबकि प्राकृतिक खेती करने वाले पूरी तरह कृषि पर टिके रहते हैं।

युवाओं में पारंपरिक खेती प्रचलित

अध्ययन में सामने आया कि प्राकृतिक खेती अपनाने वाले अधिकतर किसान उम्र में बड़े, शिक्षित और ऊंची जाति से जुड़े होते हैं। आंकड़ों के अनुसार, प्राकृतिक खेती करने वालों में 46-61 वर्ष आयु वर्ग के 38.67 प्रतिशत और 62 वर्ष से ऊपर के 18.67 प्रतिशत किसान शामिल थे। इसके उलट पारंपरिक खेती करने वाले 30-45 वर्ष आयु वर्ग के 48 प्रतिशत किसान थे, यानी पारंपरिक खेती अपेक्षाकृत युवा किसानों के बीच अधिक प्रचलित है। इसके अलावा, प्राकृतिक खेती अधिकतर पुरुषों द्वारा की जाती है, जबकि पारंपरिक खेती में महिलाओं की भागीदारी अधिक देखी गई।

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सामान्य और एसटी में प्राकृतिक, ओबीसी-एससी में पारंपरिक खेती ज्यादा प्रचलित

अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि प्राकृतिक खेती सामान्य वर्ग की जातियों और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) में अधिक प्रचलित है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अनुसूचित जातियों (एससी) में पारंपरिक खेती अधिक लोकप्रिय है। विशेषज्ञों के अनुसार, कई क्षेत्रों में आदिवासी आबादी पारंपरिक रूप से बिना रसायन वाली खेती करती रही है, इसलिए उनकी संख्या प्राकृतिक खेती में अधिक दिखती है।

उच्च शिक्षितों कर रहे प्राकृतिक खेती

प्राकृतिक खेती करने वालों में उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की संख्या भी अधिक है। इसका अर्थ है कि पढ़ाई-लिखाई का स्तर खेती की पद्धति चुनने में अहम भूमिका निभाता है। यह बात नीति-निर्माताओं के लिए खास महत्व रखती है क्योंकि शिक्षा और जागरूकता खेती में बदलाव का रास्ता खोल सकते हैं।

आय में कोई बड़ा अंतर नहीं

अध्ययन में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि प्राकृतिक और पारंपरिक खेती के बीच आय में कोई बड़ा अंतर नहीं मिला।

– हिमाचल प्रदेश में पारंपरिक किसानों की औसत सालाना आय 2,53,600 रुपए रही, जबकि प्राकृतिक किसानों की 2,52,453 रुपए।

– राजस्थान और आंध्र प्रदेश में पारंपरिक किसानों की आय क्रमश: 1,60,500 रुपए और 1,13,600 रुपए रही, जबकि प्राकृतिक खेती वालों की आय 1,49,533 रुपए और 98,093 रुपए रही।

– पश्चिम बंगाल और झारखंड में दोनों वर्गों की आय लगभग समान रही।

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