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खेती : ट्रैक्टर मालिकों के सामने नई चुनौतियाँ

राजन क्षीरसागर

घटते चारागाह, बढ़ती बहु-फसली खेती और घटती पशुओं की साज-संभाल ने बैलों को अब ट्रैक्टरों से विस्थापित कर दिया है, लेकिन ट्रैक्टरों के भी अपने संकट हैं। मसलन – ट्रैक्टरों को वाहनों का दर्जा दिया जाना, जिसके चलते उन पर भी वे ही नियम-कानून लागू होते हैं जो आम वाहनों पर। क्या हैं, ये नियम-कानून? और ऐसे में ट्रैक्टर मालिक क्या करते हैं?

राजन क्षीरसागर

हरित क्रांति की पृष्ठभूमि में ट्रैक्टर का उपयोग पूरे देश में बढ़ता रहा है। दरवाजे पर खूबसूरत बैल जोड़ी की जगह ट्रैक्टर ने ले ली है। बढ़ते चारे के खर्च, देखभाल के लिए आवश्यक शारीरिक श्रम, नकदी फसलों की मांग के कारण कई छोटे किसानों के लिए अब बैल रखना संभव नहीं रहा। इसके बजाय, किराये के ट्रैक्टर से बुवाई और अन्य कार्य कराना धीरे-धीरे आदत बन गई है। इससे गांवों में ट्रैक्टर-धारकों की संख्या बढ़ रही है। महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक में चीनी उद्योग ने ट्रैक्टरों को गन्ना पिराई और परिवहन के चलते और मजबूती दी।

आज की खेती में महत्वपूर्ण ट्रैक्टरों पर अब वाहन संबंधी नए नियम लागू किए जाने वाले हैं। ट्रैक्टरों को वाहन के रूप में दर्ज किया गया है और इस कारण ‘परिवहन मंत्रालय’ के नए निर्देशों के अनुसार हर ट्रैक्टर को निश्चित कालावधि के बाद फिटनेस प्रमाणपत्र के बिना उपयोग नहीं किया जा सकता। इन मानकों का पालन करके यदि ट्रैक्टर ने फिटनेस प्रमाणपत्र नहीं लिया तो उसे पेट्रोल और डीजल देने पर पेट्रोल पंप के संचालक प्रतिबंधित होंगे।

इसके लिए 10 साल की कालावधि निश्चित की जानी थी, लेकिन इस निर्णय पर किसानों की तीखी प्रतिक्रियाएँ आईं। नतीजे में सरकार को घोषित करना पड़ा कि 15 साल की कालावधि में कोई बदलाव नहीं होगा। खेती में ट्रैक्टरों के उपयोग को बढ़ावा देने और यांत्रिकीकरण को गति देने के लिए कुछ समय तक सब्सिडी भी दी गई थी। अब आर्थिक उदारीकरण की नीति के कारण इस सब्सिडी को समाप्त या सीमित कर दिया गया है।

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भारत में वाहनों के बीमा में कंपनियां सालाना लगभग 85,000 करोड़ रुपये प्रीमियम वसूलती हैं। ट्रैक्टर के लिए ‘थर्ड पार्टी बीमा’ राशि ट्रैक्टर मूल्य के 5% से 7% तक होती है, जो लगभग 50,000 से 70,000 रुपये के बीच है। अन्य देशों की तुलना में यह राशि काफी अधिक है। कई देशों में इसे सब्सिडी देकर कम रखा जाता है। ब्राजील में यह राशि केवल 0.3% (लगभग 3000 रुपये) और चीन में 0.5% (लगभग 5000 रुपये) है।

ट्रैक्टर कंपनियों का वितरण एवं सेवा नेटवर्क व्यापक है जिसने ट्रैक्टर की देखभाल एवं मरम्मत में एकाधिकार स्थापित कर रखा है। ट्रैक्टर में खराबी होने पर मरम्मत और स्पेयर-पार्ट्स अत्यधिक महंगे हैं। स्थानीय और अन्य तकनीशियनों को मरम्मत नहीं करने दी जाती। यदि कोई स्थानीय तकनीशियन कंप्यूटर आधारित सिस्टम में हस्तक्षेप करता है तो कंपनी वारंटी से इनकार कर देती है। वारंटी अवधि भी सीमित है। इस प्रकार की व्यवस्थाओं से ट्रैक्टर मालिकों को काफी शोषण झेलना पड़ता है। किसानों की शिकायतों और सामाजिक आंदोलन के कारण कई देशों ने ‘मरम्मत का अधिकार’ के कानून बनाए हैं।

भारत में जागरूकता की कमी का फायदा बड़ी ट्रैक्टर कंपनियां उठा रही हैं। कृषि उपकरण और उपकरण बाजार में सालाना 12-15% की वृद्धि होती है और सालाना लगभग 10 लाख ट्रैक्टर बेचे जाते हैं। तीव्र यांत्रिकीकरण को देखते हुए मरम्मत का अधिकार देना आवश्यक हो गया है। जब वैश्विक कृषि उपकरण बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए बाजार खोला जा रहा है, तब इसके लिए कानून बनाना आवश्यक है। इसमें वारंटी की कालावधि को ट्रैक्टर की आयु तक यानी लगभग 35 वर्ष तक बढ़ाना, तकनीक और कौशल अधिकार का विस्तार, निर्गमन क्षेत्रों पर नियंत्रण और मरम्मत और रखरखाव लागत को कम करना शामिल होना चाहिए।

भारत में ट्रैक्टर की वास्तविक उत्पादन लागत उसकी बिक्री कीमत के 40-70% के बीच होती है। बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां भारतीय किसानों से अधिक मूल्य वसूलती हैं। भारत से अन्य विकासशील देशों को भी ट्रैक्टर और कृषि उपकरण बड़े पैमाने पर निर्यात किए जाते हैं। निर्यात पर कर छूट और अनुदान के माध्यम से बड़ी रकम कॉर्पोरेट क्षेत्र को उपलब्ध होती है। अप्रैल 2025 तक भारत सरकार ने निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए 57,976.78 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। कीमतों में कम-से-कम 25% कटौती की मांग कृषि प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ करते हैं, लेकिन इसे अनदेखा किया जाता है। असामान्य कीमतों के कारण ट्रैक्टर उपयोगकर्ताओं के ऊपर ऋण का बोझ बढ़ रहा है। कृषि उत्पादों की न्यूनतम आश्वस्त कीमत का अभाव और प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे किसानों पर ऋण का भार है।

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ट्रैक्टर के लिए बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा दिया जाने वाला ब्याज दर अत्यधिक है। छत्रपती संभाजीनगर (औरंगाबाद), महाराष्ट्र में कॉर्पोरेट क्षेत्र के निदेशक-प्रबंधकों को 100 मर्सिडीज गाड़ियों की खरीद के लिए राष्ट्रीयकृत बैंक से मात्र 6% ब्याज दर पर ऋण मिला, जबकि ट्रैक्टर और कृषि उपकरणों के लिए ब्याज दर 14% से लेकर 28% तक है। इससे किसानों की वास्तविक समस्या स्पष्ट होती है। ट्रैक्टर और खेती के औजारों के खर्च को किसानों के कर्ज से जोड़ें तो तस्वीर और भी भयावह हो जाती है। किसानों की आत्महत्याएं न केवल देश के लिए, बल्कि मानवता के लिए भी एक काला धब्बा बन गई हैं, लेकिन सरकार इस बारे में अधिक संवेदनशील दिखाई नहीं देती।

सन् 2030 में भारत में ट्रैक्टर का बाजार लगभग 50 हजार करोड़ रुपये का होने का अनुमान है। कई बडी अमेरिकी ट्रैक्टर कंपनियां इसकी ओर आकर्षित हैं। इसके लिए भारत-अमेरिका व्यापार शर्तों में भी कुछ छुपे हुए प्रावधान आगे बढ़ाए जा रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में भारतीय किसानों के हितों और देश के औद्योगिक विकास की नीतिगत चुनौतियां सामने आ रही हैं।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के अलावा ‘नीति आयोग’ ने अमेरिकी कृषि आयात में आयात शुल्क कम करने की भी सिफारिश की है। साथ ही, इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर को बढ़ावा देने का इरादा भी बताया गया है। आज भारत में लगभग 75% ट्रैक्टर 10 वर्ष से अधिक पुराने हैं। ऐसे में इन सभी बदलावों के कारण गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। भारतीय ट्रैक्टर धारक किसानों के हितों को पुष्ट करने वाला कोई भी निर्णय कृषि व्यवसाय में अराजकता पैदा कर सकता है। इस बारे में निश्चित ही भारतीय किसान जागरूकता के साथ प्रतिरोध करने की समझ रखते हैं, जो समय-समय पर किसान आंदोलनों द्वारा भी प्रदर्शित हो चुकी है। (सप्रेस)

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राजन क्षीरसागर ‘अखिल भारतीय किसान सभा’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं ।

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