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चिकित्सा शिक्षा का अवमूल्यन : राष्ट्र के समक्ष चुनौती

चिकित्सा शिक्षा का अवमूल्यन : राष्ट्र के समक्ष चुनौती

अध्ययन बताते हैं कि दुनियाभर में हथियारों के अलावा दवाओं का धंधा पूंजी कूटने में सर्वाधिक अहमियत रखता है। दवाओं के इस धंधे में चिकित्सा शिक्षा भी हिस्सेदार है, लेकिन इस सबसे आम मरीज और व्यापक समाज पर क्या और...

डॉ. सूर्यप्रकाश धनेरिया

अध्ययन बताते हैं कि दुनियाभर में हथियारों के अलावा दवाओं का धंधा पूंजी कूटने में सर्वाधिक अहमियत रखता है। दवाओं के इस धंधे में चिकित्सा शिक्षा भी हिस्सेदार है, लेकिन इस सबसे आम मरीज और व्यापक समाज पर क्या और कितना असर पड़ता है? चिकित्सा शिक्षा की इसी कमजोरी पर उंगली रखता डॉ. सूर्यप्रकाश धनेरिया का लेख।

डॉ. सूर्यप्रकाश धनेरिया

भारत स्वास्थ्य के क्षेत्र में दो गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। एक तो यह कि चिकित्सक बीमारी का पता लगाने के लिये मरीज से संवाद एवं परीक्षण के बजाय अनावश्यक एवं महंगी जांचों पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। दूसरे, औषधियों का तर्कसंगत (रेशनल) उपयोग बीमारियों के इलाज में नहीं हो पा रहा है। पिछले कुछ दशकों से चिकित्सा शिक्षा के पाठ्यक्रम भी इन समस्याओं का कोई खास समाधान नहीं दे पा रहे हैं।

शिक्षक अपने ज्ञान, कौशल, चरित्र एवं व्यवहार द्वारा एक रोल मॉडल की तरह उस आने वाली पीढ़ी को तराशता है जिसे आगे कई दशकों तक समाज को रोगों और कष्टों से मुक्ति दिलाने का दायित्व प्रामाणिकता से निभाना है एवं मानवता की सेवा करना है। पिछले कुछ दशकों में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापन की गुणवत्ता का अत्यधिक अवमूल्यन हुआ है। इस घोर अवहेलना का परिणाम चिकित्सा स्नातकों के ज्ञान व कौशल में दिखाई देता है। चिकित्सा के क्षेत्र में होने वाले शोध यथार्थ, प्रामाणिक और आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिये, जिनसे देश की समस्याओं का सही, सटीक और देशज समाधान हो सके, परंतु काफी धनराशि खर्च करने के बाद भी हम उपरोक्त उद्देश्य प्राप्त करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं।

टीबी (क्षय रोग) सरीखी बीमारी का उदाहरण है जिसकी रोकथाम व इलाज पूर्णत: संभव है और देश में मौजूद है, लेकिन मरीज स्वस्थ्य नहीं हो रहा। वजह है, हम अपने मरीजों का इलाज सप्ताह में तीन बार टीबी की दवाई देकर करते रहे, जो कि हमारे देश की परिस्थितियों के हिसाब से तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अनुकूल नहीं था। हमने काफी समय के बाद टीबी के उपचार में दवाईयों के दैनिक सेवन की प्रथा को लागू किया। हमने 2025 तक टीबी से मुक्त होने का संकल्प तो ले लिया, परंतु जन-जागरूकता के बिना यह संभव नहीं हो पा रहा।

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दूसरी बानगी कोविड-19 बीमारी की है जो एक ‘सेल्फ लिमिटिंग’ (स्वयं सीमित) वायरल इंफेक्शन था। इस बीमारी में 80-85 प्रतिशत लोगों को या तो बीमारी के लक्षण आने ही नहीं थे (एसिम्प्टोमेटिक) या बहुत ही हल्की बीमारी होना थी। कोविड-19 से ग्रसित सिर्फ 15-20 प्रतिशत लोगों में लक्षण आधारित एवं सहायक उपचार की जरूरत थी। ऑक्सीजन जीवन रक्षक थी। स्टेरॉइड एवं एंटीकोएगुलेंट (खून का थक्का न जमने की दवाई) दवाईयों की उपयोगिता के बारे में वैज्ञानिक प्रमाण के साथ-साथ स्पष्ट दिशा-निर्देश भी थे कि इन्हें किस परिस्थिति में, किस मात्रा में तथा कितने दिनों तक उपयोग में लाना है।

असल में दवाईयों का जो अत्यधिक एवं अनावश्यक उपयोग कोविड-19 में हुआ वह किसी भी दृष्टि से न तो तर्कसंगत था, न ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित था। बीमारी में इस तरह से दवाईयों के उपयोग से फायदा कम, नुकसान ज्यादा हुआ। जिस तरह से दवाईयों का उपयोग (बिना स्पष्ट वैज्ञानिक आधार के) कोविड-19 बीमारी में हुआ, उससे मरीज का स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हुआ तथा समाज और देश को आर्थिक बोझ उठाना पड़ा।

किसी भी बीमारी का सामना करने में मरीज के सकारात्मक दृष्टिकोण की अहम भूमिका रहती है। भ्रामक जानकारी, चिंता एवं भय के कारण ऐसी धारणा बन गई कि कोविड-19 वायरल इंफेक्शन से मृत्यु निश्चित है, जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। कोविड-19 के दौरान जिस तरह की परिस्थितियां निर्मित हुईं उसमें मरीज एवं उसके परिजनों ने एक तरह से हिम्मत खो दी एवं अपने-आपको अकेला व असहाय पाया। इस तरह के नकारात्मक दृष्टिकोण के हावी होने से गंभीर परिणाम रहे। मरीज का उपचार अत्यधिक कोविड-19 केंद्रित था। ऐसे में अन्य बीमारियों के इलाज की उपेक्षा के गंभीर परिणाम रहे।

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ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाएं बहुत कम उपलब्ध रहती हैं, इसके बावजूद कोविड-19 का दुष्प्रभाव ग्रामीण अंचल में कम रहा। ग्रामीण अंचल में रहने वाले हमारे देशवासियों की जीवनशैली, सकारात्मक सोच एवं मानवीय मूल्यों में गहरी आस्था से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। इस बात को हमें स्वीकार करना चाहिए कि कोविड-19 की विषम परिस्थिति के दौरान ईश्वर में हमारा अटूट विश्वास, सदियों पुरानी परंपरागत जीवनशैली, हमारे लोगों की विलक्षण रोग-प्रतिरोधक क्षमता एवं घरेलू उपचार पद्धति हमारी शक्ति रही है और उसने संबल प्रदान किया है।


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कोविड-19 के दौरान इसके उपचार के दिशा-निर्देश हमारे देश में समय-समय पर जारी हुए। यदि इनका निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए तो हम पाएंगे कि इनमें सही वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी रही। बीमारी के बारे में उपलब्ध ज्ञान का सही तरीके से अध्ययन नहीं किया गया एवं दिशा-निर्देशों में व्यक्तिगत पसंद व नापसंद परिलक्षित हुई। मानवीय, सामाजिक और आर्थिक मापदण्डों पर भी ये दिशा-निर्देश सही साबित नहीं हुए। इस बीमारी ने हमारे चिकित्सकीय ज्ञान, कौशल एवं मानवीय संवेदनाओं में हुए अवमूल्यन को एकदम सतह पर ला दिया, जिसकी देश एवं देशवासियों ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई।

दवाईयों के तर्कसंगत व न्यायोचित उपयोग के लिए जिस ज्ञान व कौशल की जरूरत थी, वह कहीं भी परिलक्षित नहीं हुआ। जिस तरह से चिकित्सा शिक्षा पिछले दो-तीन दशकों में दी जा रही थी, यह उसकी असफलता का परिणाम है। बीमारी की पहचान (डायग्नोसिस) के बारे में चिकित्सक ने जरूरी क्षमता तो हासिल कर ली, परंतु दवाईयों से बीमारी के उपचार में जरूरी प्रवीणता, तर्कसंगत दृष्टिकोण चिकित्सक में हो, इसमें चिकित्सा पाठ्यक्रम करीब-करीब असफल रहा। चिकित्सा शिक्षा में अध्यापन की गुणवत्ता के महत्व की अनदेखी ने गंभीर प्रश्न खड़े कर दिये हैं।

चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में नियुक्ति एवं पदोन्नति के लिए शोधपत्रों को सही ज्ञान व अध्यापन की गुणवत्ता पर तरजीह दी गई और यह गलती चिकित्सा शिक्षा के अवमूल्यन का प्रमुख कारण साबित हुई। वास्तविकता यह है कि चिकित्सा के क्षेत्र में हमारे देश में जो भी शोध हुआ है, उसकी उपयोगिता तमाम आर्थिक संसाधनों के इस्तेमाल के बावजूद देश की स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान में कुछ विशेष नहीं रही। इस तरह से लोगों ने अपना बायोडाटा तो सुधार लिया, पर देश के बायोडाटा की बिल्कुल भी चिंता नहीं की।

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शिक्षक द्वारा अपने ज्ञान, कौशल व चरित्र से आने वाली पीढ़ी को तराशने की परम्परा एक तरह से विलुप्त हो गई है। जिन नीति-निर्धारकों ने इस परिपाटी को शुरू किया व जारी रखा, उन्होंने राष्ट्र एवं समाज के हितों के विरूद्ध काम किया और हमारे देशवासियों ने इसकी भारी कीमत चुकाई। देश के तमाम उच्च चिकित्सा शिक्षा संस्थानों को आत्मावलोकन करना चाहिए कि उन्होंने देश और समाज को चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में क्या दिया है एवं उपलब्ध संसाधनों का विज्ञान एवं समाज के उत्थान में किस तरह उपयोग किया है।

आम आदमी सामान्य बीमारियों को पहचानने एवं इसके प्राथमिक उपचार में सक्षम हो और उसकी निर्भरता दूसरों पर कम हो, इस तरह की आत्मनिर्भरता सामान्यजन में विकसित करने की अत्यधिक आवश्यकता है। इसके लिए जन-स्वास्थ्य शिक्षा के प्रयासों के साथ-साथ सामान्यजन एवं स्वास्थ्यकर्मियों के बीच विश्वसनीय रिश्तों को स्थापित करने को प्राथमिकता देना होगी। सरकार को आवश्यक दवाईयों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना होगी तथा इन दवाईयों को सस्ते दामों पर देशवासियों को उपलब्ध कराना होगी। जैसे-जैसे देशवासी अपनी सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने में सक्षम होंगे, वैसे-वैसे स्वास्थ्य सेवा से जुड़े संस्थान एवं तंत्र के पास आत्मनिरीक्षण के अलावा कोई और विकल्प न होगा और उन्हें समाज एवं समय की जरूरतों के हिसाब से अपनी कार्यशैली में आवश्यक बदलाव लाने होंगे। (सप्रेस)

 डॉ. सूर्यप्रकाश धनेरिया वरिष्ठ फार्माकोलॉजिस्ट और चिकित्सा शिक्षा विशेषज्ञ हैं। वर्तमान में आर.डी. गार्डी मेडिकल कॉलेज, उज्जैन में प्रोफेसर एवं डीन (शैक्षणिक) हैं।

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