कौन देगा साफ हवा-पानी की ग्यारंटी !

डॉ.ओ.पी.जोशी

मौजूदा आम चुनावों में सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी ओर से नागरिकों को थोक में तरह-तरह की ग्यारंटी दे रहे हैं, लेकिन किसी का ध्यान जीवन की बुनियादी जरूरत, हवा और पानी की ग्यारंटी की तरफ नहीं है। क्या इन दोनों की अनदेखी हमारे लिए भारी नहीं पड़ेगी?

देश में केन्द्र की मोदी सरकार ने देशवासियों को कई ग्यारंटियां दी हैं जिनमें सभी की सुरक्षा, आतंकवाद व भ्रष्टाचार की समाप्ति, स्टार्टअप से समृद्धि तथा 140 करोड़ देशवासियों के सपने साकार करना आदि प्रमुख हैं। वर्तमान में देशभर में फैली वायु एवं जल प्रदूषण की गंभीर स्थिति को ध्यान में रखकर अब प्रधानमंत्री को साफ हवा एवं पानी की उपलबधता की भी ग्यारंटी देना चाहिये। इन दोनों प्रकार के प्रदूषण से लगभग हरेक देशवासी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित हो रहा है। यह प्रभाव सीधे उसके स्वास्थ्य पर हो रहा है जिससे वायु एवं जल-जनित बीमारियां बढ़ रही हैं।

हवा सभी जीवों के लिए आधारभूत जरूरत है। अतः इसका साफ, स्वच्छ होना बेहद जरूरी है। सामान्यतः एक व्यक्ति 24 घंटे में श्वसन-क्रिया से 14 – 15 किलोग्राम हवा को फेफड़ों में भरकर निकालता है। 24 घंटे में लिए गये पानी एवं भोजन की तुलना में हवा की यह मात्रा सबसे ज्यादा होती है। विश्वव्यापी वायु गुणवता की निगरानी करने वाली स्विस संस्था ‘आयक्यू एअर’ की हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार देश की 96 प्रतिशत आबादी (लगभग 130 करोड़) प्रदूषित हवा में सांस ले रही है। विश्व के 50 प्रदूषित शहरों में 42 हमारे देश के हैं। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (डब्ल्यूएचओ) तथा शिकागो विश्वविद्यालय द्वारा कुछ वर्षो पूर्व जारी रिपोर्ट के अनुसार देश में वर्ष 2001 से 2020 के मध्य वायु-प्रदूषण से हुई मौतों में 69 प्रतिशत बढ़ौती हुई है।

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‘क्लाईमेट ट्रेंड’ की सितम्बर 2021 में जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्तरप्रदेश की 99.4 प्रतिशत आबादी प्रदूषित हवा में सांस लेने के लिए मजबूर है। इसी उत्तरप्रदेश से 80 से ज्यादा सांसद देश की संसद में पहुंचते हैं। ‘आयआयटी – दिल्ली’ तथा ‘क्लाइमेट ट्रेंड’ का एक संयुक्त अध्ययन दर्शाता है कि अब देश के शहरों एवं ग्रामीण क्षेत्र में वायु-प्रदूषण में बहुत ज्यादा अंतर नहीं रहा है। कुछ अन्य संस्थानों के अध्ययन अनुसार उज्जैन एवं दार्जिलिंग में वायु-प्रदूषण बढ़ा है तथा पर्यटन बढ़ने से वायु-गुणवता बिगड़ रही है। वैसे केन्द्र सरकार ने वर्ष 2019 में देश के 130 शहरों में ‘राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम’ (एनकेप) प्रारंभ किया था, परंतु उसके भी कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आए हैं।

जीवों के लिए हवा के बाद दूसरी जरूरत जल है। सामान्यतः एक व्यक्ति 24 घंटे में 5 से 7 लीटर पेयजल ग्रहण करता है। देश में जीवन देने वाला जल भी जहरीला हो गया है। देश के ‘नीति आयोग’ के ‘जल-प्रबंधन सूचकांक’ के अनुसार देश का 70 प्रतिशत पानी पीने योग्य नहीं है। ‘केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल’ के अनुसार देश की 521 नदियों में से 351 काफी प्रदूषित हैं। भूजल के अतिदोहन से ये कम होने के साथ-साथ प्रदूषित भी हो रही हैं। देश के 360 जिलों के भूजल में नाइट्रेट, क्लोराइड एवं आर्सेनिक की मात्रा बढ़ी है।

प्रधानमंत्री की ग्यारंटी में इतनी चमक होती है कि ग्यारंटी वाले विषय से जुड़े विभाग सक्रिय होकर उसे पूरा करने में जुट जाते हैं। साफ हवा एवं पानी की ग्यारंटी देने पर केन्द्र का ‘पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ तथा ‘प्रदूषण नियंत्रण मंडल’ के सभी कार्यालय अन्य विभागों के समन्वय से यदि इस ग्यारंटी पर कार्य करें तो लगभग एक वर्ष में काफी अच्छे परिणाम आ सकते हैं। साफ हवा एवं पानी मिलने से लोग स्वस्थ्य रहेंगे तो ज्यादा अच्छी तरह से कार्य करेंगे जिससे ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (जीडीपी) में बढ़ोत्री भी संभव है।

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साफ पर्यावरण का लाभ आने वाली पीढ़ियों को भी मिलेगा। आयरलैंड के शोधकर्ताओं ने हाल ही में बताया है कि लॉकडाउन के समय साफ हुए पर्यावरण में जिन बच्चों ने जन्म लिया उनमें प्रतिरोध-क्षमता ज्यादा है। साफ पर्यावरण, विशेषकर वायु एवं जल के संदर्भ में देश के वर्तमान एवं भविष्य दोनों के लिए अच्छा है। अतः इसकी ग्यारंटी देना अब जरूरी है। वैसे चुनावी घोषणा-पत्रों में पर्यावरण के कुछ मुद्दों की चर्चा की गयी है, परंतु उन्हें ग्यारंटी नहीं माना जा सकता। (सप्रेस)

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