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कोशी-मेची नदी जोड़ परियोजना पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग

परियोजना की मंजूरी पर नदी घाटी मंच और जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय का बयान

नई दिल्ली, 3 अप्रैल। केंद्र सरकार ने कोशी-मेची नदी जोड़ परियोजना को मंजूरी दे दी है। 28 मार्च 2025 को प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार यह परियोजना केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी नदी जोड़ परियोजना होगी। सरकार द्वारा इसे कोशी क्षेत्र में बाढ़ नियंत्रण और सीमांचल के जिलों—अररिया, पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार—में सिंचाई की सुविधा बढ़ाने के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।

हालांकि, नदी घाटी मंच और जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM) ने इस परियोजना पर गंभीर सवाल उठाए हैं। नदी घाटी मंच व जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय की सुश्री मेधा पाटकर, प्रफुल्ल समांतरा, राज कुमार सिन्हा, सी. आर. नीलकंडन, डॉ. सुनीलम, सौम्य दत्ता, हिमांशु ठक्कर ने जानकारी देते हुए बताया कि कोशी नवनिर्माण मंच ने पहले ही इस परियोजना के दावों की समीक्षा कर सरकार से स्पष्टीकरण और श्वेत पत्र जारी करने की मांग की थी, जिस पर अब तक कोई उत्तर नहीं मिला है।

बाढ़ नियंत्रण पर सवाल

परियोजना से कोशी की बाढ़ कम होने के दावे को खोखला बताते हुए नदी घाटी मंच ने कहा कि यदि यह परियोजना कार्यशील होती, तब भी कोशी का बाढ़ जल प्रवाह मात्र 0.77% ही कम होता। 2024 में कोशी नदी में 6.81 लाख क्यूसेक से अधिक पानी आया था, जबकि इस परियोजना से मात्र 5247 क्यूसेक अतिरिक्त पानी डायवर्ट किया जा सकेगा। ऐसे में बाढ़ नियंत्रण का दावा भ्रामक प्रतीत होता है।

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सिंचाई के दावे की हकीकत

परियोजना के तहत खरीफ के मौसम में 2.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई का दावा किया जा रहा है, जबकि महानंदा बेसिन में इसी दौरान औसत 1640 मिमी वर्षा होती है। इसके अलावा, रबी की सिंचाई के लिए हाई डैम बनाए जाने की बात कही जा रही है, जो मात्र एक वायदा साबित हो सकता है।

संगठनों ने यह भी याद दिलाया कि कोशी पूर्वी मुख्य नहर से जुड़ी पुरानी सिंचाई परियोजना का लक्ष्य 7.12 लाख हेक्टेयर था, जिसे 1973 में घटाकर 3.38 लाख हेक्टेयर कर दिया गया था, लेकिन वह भी पूरा नहीं सका। ऐसे में इस नई परियोजना की सफलता पर संदेह बना हुआ है।

बाढ़ और जलजमाव की नई समस्या?

कोशी नवनिर्माण मंच  के इंद्र नारायण सिंह, आलोक राय, राजेश मंडल ने इस परियोजना से बाढ़ और जलजमाव बढ़ने की आशंका भी जताई है। परियोजना के तहत 13 हिमालयी नदियों को सायफन के माध्यम से पार कराने की योजना है, लेकिन मानसून में इन नदियों का भारी वेग सायफन और लंबवत संरचना को प्रभावित कर सकता है। 2017 में अररिया जिले में कोशी पूर्वी नहर के सायफन में आई दरार का उदाहरण देते हुए मंच ने चेतावनी दी कि ऐसा भविष्य में भी हो सकता है।

पर्यावरणीय प्रभाव और वैकल्पिक समाधान

परियोजना से कोशी और महानंदा बेसिन की नदियों के जल में सिल्ट की मात्रा में असंतुलन आने की आशंका है, जिससे पर्यावरण और जैव विविधता पर प्रभाव पड़ेगा। मंच ने सरकार से वैकल्पिक समाधान पर विचार करने की मांग की है, जिससे बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई की वास्तविक समस्याओं का समाधान हो सके।

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राजनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए विनाशकारी परियोजना?

नदी घाटी मंच और जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय ने इस परियोजना को चुनावी लाभ और ठेकेदारों के स्वार्थ से प्रेरित बताते हुए इसे विनाशकारी करार दिया है। संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग की है कि वे या तो इन सवालों पर श्वेत पत्र जारी कर जनता के समक्ष सच्चाई रखें, या इस परियोजना को रोककर बाढ़ और सिंचाई के प्रभावी विकल्पों पर काम करें।

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