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1 व 2 अप्रैल को होशंगाबाद में होगा NAPM जन आंदोलनों के राष्ट्रीय सम्मेलन में विकास की अवधारणा पर विमर्श

1 व 2 अप्रैल को होशंगाबाद में होगा NAPM जन आंदोलनों के राष्ट्रीय सम्मेलन में विकास की अवधारणा पर विमर्श

2 अप्रैल को होगी होशंगाबाद में जनसभा 1 अप्रैल, 2023। होशंगाबाद में नर्मदा किनारे 1 और 2 अप्रैल को बांद्रा धाम, नर्मदापुरम, होशंगाबाद में जन आंदोलनों के राष्ट्रीय सम्मेलन होने जा रहा है। सम्‍मेलन में देशभर से 10 राज्यों के...

2 अप्रैल को होगी होशंगाबाद में जनसभा

1 अप्रैल, 2023। होशंगाबाद में नर्मदा किनारे 1 और 2 अप्रैल को बांद्रा धाम, नर्मदापुरम, होशंगाबाद में जन आंदोलनों के राष्ट्रीय सम्मेलन होने जा रहा है। सम्‍मेलन में देशभर से 10 राज्यों के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, आदिवासी, किसान, मजदूर, मछुआरों के प्रतिनिधि भी हिस्‍सा लेंगे।

जन आंदोलनों के राष्ट्रीय सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणविद प्रफुल्ल सामन्तरा (ओड़िसा), छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के प्रमुख संस्थापक आलोक शुक्ला, अंतरराज्य नदी घाटी मछुआरा संगठन के प्रदीप चटर्जी, वन अधिकार और पंचायती राज विशेषज्ञ एडवोकेट सुरेखा दलवी, किसान संघर्ष समिति की अधिवक्ता आराधना भार्गव, गांधीवादी कार्यकर्ता विदिता विद्रोही, बिहार के कोसी क्षेत्र में कार्यरत महेंद्र यादव,कैलाश मीणा समेत राजकुमार सिन्हा, अमूल्य निधि और नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर आदि विशेष रूप से शामिल हो रहे है।

सम्मेलन के बाद 2 अप्रैल की शाम 4:00 बजे होशंगाबाद नर्मदा पुरम जिलाधिकारी कार्यालय के पास पीपल चौपाल पर आमसभा आयोजित की गई है जिसमें सम्मेलन में उभरे विचार और निर्णय आम जनता के समक्ष रखे जाएंगे।

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि सम्‍मेलन में नर्मदा घाटी में दशकों से चल रहे आंदोलन, आसाम, ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, छत्तीसगढ़ सहित हर राज्य में बांध, खदान, औद्योगीकरण, शहरीकरण जैसे विकास के नाम पर विविध रूप में हो रहे जल, जंगल, जमीन पर आघात ध्यान में रखकर विचार-विमर्श किया जाएगा तथा आगे की रणनीति तय की जाएगी।

विज्ञप्ति में कहा गया है कि देशभर में जब संवैधानिक मूल्यों, समता और न्याय तथा सतत संसाधनों का उपभोग होता है, तब विकास की अवधारणा पर विमर्श करना जरूरी हो जता है। जनतांत्रिक प्रक्रिया में अधिकार किसका यह बताने वाले कानून आजादी के 75 सालों में बने हैं, लेकिन ये अब बदल रहे हैं। मानवीय अधिकार कुचले जा रहे है। संसाधनों का विकास नहीं विनाश होता है और पीढ़ियों पुराने समुदाय का विस्थापन। संविधान भी इन प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षा और विकास का निर्देश राज्य/ शासन को देता है ।

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