किसी भी सीवर को नागरिकों के लिए अभयारण्य नहीं होना चाहिए
पुल के नीचे, रेलवे लाइन के पास, फुटपाथ या अन्य किसी जगह बने सीवर उनके लिए अभयारण्य हैं| बाकी स्थानों पर चाहे वे पुल के नीचे हो, रेल पटरी के पास हो, फुटपाथ पर हो या और कहीं, कोई न…
समर्थन मूल्य की समीक्षा : मध्यप्रदेश में सोयाबीन
इन दिनों सोयाबीन को लेकर मध्यप्रदेश में भारी बवाल मचा है। फसल की लागत और लगातार बढ़ते अन्य खर्चों के चलते किसान सोयाबीन का ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ बढ़वाने के लिए आंदोलनरत हैं और सरकार इसे लेकर ना-नुकुर कर रही है।…
एक दशक का ‘विकल्प संगम’
दस साल पहले उभरा गैर-दलीय राजनीति करने वाले संगठनों, संस्थाओं और सरोकार रखने वाले व्यक्तियों के जमावड़े का विचार अब अपने ठोस रूप में दिखाई देने लगा है। ‘विकल्प संगम’ के तहत देश भर के करीब सौ संगठन मिलजुलकर वैकल्पिक…
क्या दलीय लोकतंत्र से आगे कोई रास्ता नहीं है?
जयप्रकाश नारायण क्या वर्तमान दलीय लोकतंत्र का कोई विकल्प हो सकता है? और यदि हो सकता है तो उसका स्वरूप कैसा होगा? इस सिलसिले में प्रस्तुत है, ‘सप्रेस’ के भंडार में से देश के मूर्धन्य नेता, स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी स्व. श्री…
नक्सलवाद : हिंसा का जवाब हिंसा नहीं, क्या हो असली समाधान?
छत्तीसगढ की लाचारी, बेकारी और बीमारी नक्सलवाद को जन्म दे रही है। नक्सलवाद और बागीपन हिंसा है, लेकिन हिंसा को हिंसा से ठीक कभी नहीं किया जा सकता। हिंसा को स्नेह से सम्मान देकर बदला जा सकता है; इसलिए राज-समाज…
इतिहास : सौ साल पहले पुणे के अस्पताल में हुआ था गांधी जी का ऑपरेशन
पुणे के एक अस्पताल के जिस वार्ड में गांधी जी का ऑपरेशन हुआ था उसे राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित किया जा रहा है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि गांधी का कभी किसी अस्पताल में ऑपरेशन हुआ।…
55वीं वर्षगांठ : सामाजिक सरोकारों के लिए है, ‘राष्ट्रीय सेवा योजना’
करीब साढ़े पांच दशक पहले महाविद्यालयीन युवाओं में समाज के प्रति सरोकार बढ़ाने की खातिर, 1948 में गठित ‘राष्ट्रीय कैडेट कोर’ (एनसीसी) के समकक्ष ‘राष्ट्रीय सेवा योजना’ (एनएसएस) का गठन किया गया था। प्रस्तुत है, ‘एनएसएस’ की 55 वीं वर्षगांठ…
खेती को खोखला कर देंगी, जीएम फसलें
दबावों के बावजूद यूरोपियन यूनियन (ईयू) के 27 देशों समेत कई देशों में प्रतिबंधित ‘जीनेटिकली मॉडीफाइड’ फसलों को दुनियाभर में पैदावार बढ़ाने के तर्क की बुनियाद पर फैलाया जा रहा है, हालांकि सब जानते हैं कि इसके पीछे अमरीकी बहुराष्ट्रीय…
हिंदी दिवस : भारत एक राष्ट्र है, पर उसकी राष्ट्रभाषा नहीं
एल.एस. हरदेनिया भाषा की ताकत कितनी होती है। यदि उसका समर्थन होता है तो वह भी अद्भुत और यदि इसका विरोध होता है तो भी अद्भुत। हमारे साथ-साथ चीन में भी आज़ादी आई, परंतु वहां के नेतृत्व ने एक विशेष भाषा…
सिने-संसार : सिनेमा का असहनीय सच
उत्तर भारत में अहर्निष जारी राजनीतिक कौतुकों और उसके अलावा बाकी संसार से पीठ-फेरे पड़े मीडिया के बरक्स यह जानना चौंकाता है कि सुदूर केरल के सिने-संसार में आजकल भारी बवाल मचा है। वहां चार साल बाद अभी हाल में…









