विचार समसामयिक समाज

स्त्री के सवालों से बेनकाब होती सामाजिक सोच

स्त्री के सवालों से बेनकाब होती सामाजिक सोच
डॉ. मोनिका भाम्भू कलाना

दिल्ली के जंतर-मंतर और विश्वविद्यालय परिसरों में महिलाओं की सुरक्षा और यौन हिंसा के खिलाफ उठी छात्राओं की आवाज ने समाज की सोच पर कई सवाल खड़े किए हैं। विडंबना यह है कि अपने अधिकारों की मांग करने वाली स्त्रियों को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है, जबकि उनके खिलाफ हिंसा और भेदभाव को अक्सर सामान्य मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।


हाल ही में महिलाओं और छात्राओं द्वारा महिलाओं की सुरक्षा, यौन हिंसा और परिसरों में सुरक्षित माहौल की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर और दिल्ली यूनिवर्सिटी के परिसरों में जोरदार विरोध प्रदर्शन किए गए हैं। ये प्रदर्शन देशभर में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा, उत्पीड़न की घटनाओं और कथित रूप से सुरक्षित माहौल न मिलने के विरोध में किए जा रहे थे। महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की कई बड़ी घटनाएँ पिछले दिनों में देखने को मिलीं। अपना हक माँग रही इन छात्राओं की माँगें एक सामाजिक और नागरिक के रूप में की गई हैं जिन्हें सुना जाना आवश्यक है।

सामाजिक माहौल कभी किसी भी समय में स्त्रियों के अनुकूल नहीं रहा है। तकनीक और संचार क्रान्ति के इस युग में जब हर व्यक्ति की आवाज को एक मंच मिला है, सोचा जाने लगा कि स्त्रियाँ भी आजाद हुई हैं। किन्तु क्या सचमुच ऐसा हुआ है? स्त्रियों की तस्वीरों और वीडियो पर लाखों लाइक्स देने वाले लोग इन्हीं स्त्रियों को अपनी व्यवस्था के बारे में कोई भी सवाल करने की आजादी नहीं देना चाहते। जंतर-मंतर पर बैठकर अपने हक के लिए लड़ रही छात्राओं के मुद्दे को हाईलाइट नहीं किया जाता। उनके नारों, भाषा और कपड़ों को यक्ष प्रश्न बना दिया जाता है।

किसी लड़की द्वारा किए गए अपराध को स्त्री-जाति द्वारा किए गए सामाजिक अपराध की श्रेणी में रखकर उसे मीम और मुहावरा बनाया जा सकता है लेकिन लाखों की संख्या में रोज प्रताड़ित होने वाली स्त्रियों के बारे में बात करना जरूरी नहीं समझा जाता! स्त्री का जीवन सिर्फ दो खानों में बँटा हुआ मान लिया गया है घर के भीतर और बाहर। घर के भीतर होने वाले किसी भी सुलूक को निजी, धार्मिक या सामाजिक कहकर पल्ला छुड़ा लिया जाता है। और बाहर कदम रख देने वाली स्त्री को हर कदम पर अपने अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ता है। उन्हें रात को नहीं निकलना चाहिए, उन्हें क्या पहनना चाहिए, कहाँ जाना चाहिए, क्या खाना चाहिए, कैसे बोलना चाहिए और कितना-क्या करना चाहिए सब कुछ समाज बताएगा।

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लेकिन जब स्त्री-अधिकारों का प्रश्न आता है तब कोई भी धर्म, जाति या क्षेत्र क्यों न हो, सब उनकी खिलाफत करने एकजुट हो जाते हैं। वे किसी भी समुदाय के अनिवार्य हिस्से के रूप में नहीं देखी जाती, वे पिछड़ों में भी सबसे पिछड़ी हुई हैं, लेकिन उनके लिए आरक्षण और विशेष सुविधाओं के प्रावधान का विरोध करने के लिए फिर सब एकमत हो जाते हैं।

विडंबना यह है कि स्त्रियों के अधिकार के हर मुद्दे को पुरुष-विरोध के रूप में परिभाषित किया जाता है। स्त्रियों के बिना कोई घर, परिवार, समाज, संस्कृति और परम्परा नहीं बन सकते। उनके अधिकारों को दबाकर, उनकी इच्छाओं को मारकर, उनके साथ जबरदस्तियाँ करके आखिर हम कैसा समाज बनाएंगे? क्या ऐसा समाज प्रेम की भावना पर खड़ा होगा? ऐसे समाज से वहीं कुंठा युक्त नागरिक बनते रहेंगे जो अपने अधिकार मांगने वाली छात्राओं पर मौखिक हिंसा करने में लगे हुए हैं।

जब भी स्त्रियों के पक्ष का कोई मुद्दा उठता है उसका प्रतिपक्ष पहले से ही तैयार रहता है। तथ्यों को तोड़-मरोड़कर इस तरह पेश किया जाता है जिनसे अंततः एक ही अर्थ निकलता है। स्त्री गलत ही हो सकती है या उसे गलत ही होना चाहिए। किसी लड़के के साथ कोई लड़की कुछ गलत करे तो उसे मीडिया राष्ट्रीय मुद्दा बना देता है, इन मुद्दों को स्त्री-द्वेष फैलाने के लिए हर मंच इस्तेमाल करने लगता है।

स्त्रियों के साथ होने वाले सभी अत्याचारों को सामान्य मान लिया गया है। वह अब कोई खबर, कोई सनसनी, कोई मुद्दा नहीं बनता। क्योंकि यह कोई नई बात नहीं है, मीडिया को इससे टीआरपी, लाइक्स और व्यूज नहीं मिलते। स्त्रियों के अधिकारों की बात को परिवार से लेकर मीडिया तक कहीं गंभीरता से नहीं लिया जाता।

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इंटरनेट मीडिया पर लोग इनके बारे में अलग-अलग तरह की बातें कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि ये छात्राएं अपने अभिभावकों द्वारा दी गई आजादी का गलत इस्तेमाल कर रही हैं। उन्हें दूसरों की चिंता नहीं करते हुए अपने करियर और पढ़ाई पर फोकस करना चाहिए। कुछ लोगों ने इसे पब्लिसिटी स्टंट करार देते हुए अश्लील टिप्पणियाँ भी की। जो भी हो, जो संविधान इन लोगों को अपनी राय रखने का अधिकार देता है वही स्त्रियों के भी बराबर हक का प्रावधान करता है।

अपने घर की सुरक्षा और करियर में सफल होने मात्र से महिलाओं की समस्या का समाधान नहीं हो जाता। जब तक स्त्रियों की बराबरी को स्वीकार नहीं लिया जाता तब तक परिवार में उन्हें मिलने वाली बराबरी एक अधिकार की तरह नहीं दान की तरह ही मिलती रहेगी। कब तक स्त्रियाँ अपने ही घरों में पुरुषों के बराबर होने के लिए संघर्ष करेंगी और कब तक यह बराबरी पिता के घर तक ही सीमित रहेगी? सामाजिक संबंधों और सामाजिक व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन के बिना स्त्रियों के लिए कोई बराबरी सम्भव नहीं है। अब जब वे अपने हक के लिए खड़ी हो रही हैं, तब इन छात्राओं को सीख देने की बजाय समाज को स्वयं अपना आत्म-मूल्यांकन करना चाहिए।

शर्मिंदा होने वाली हरकतों पर मजाक उड़ाने का यह दुस्साहस कहाँ से पैदा हो रहा है, आखिर हम कैसे नागरिक होते जा रहे हैं। जनता को उन पर प्रतिक्रिया देने से पहले उन समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, जिसके बारे में वे बात कर रही हैं। वे समस्याएँ हैं, बहुत गंभीर हैं और प्रदर्शन कर रही छात्राओं को कुछ भी कह लेने मात्र से उनका समाधान नहीं होना है। कितनी चिंता वाली बात है कि बहुत कम लोग उनके पक्ष में खड़े हैं!

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एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र में सबको अपने लिए हक मांगने का अधिकार है, फिर वे तो खुलकर जीने मात्र का अधिकार माँग रही है। हम उनके पक्ष में नहीं खड़े हो सकते तो विरोध करने भी क्या जरूरत है? यह विरोध एक समाज के रूप में हमारी विकृत मानसिकता का ही प्रदर्शन है। सामूहिक बलात्कार और यौन हिंसा की घटनाओं को लेकर संविधान-सम्मत संस्थाएँ और कानून किस तरह की कार्रवाई करते हैं, भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति को नियंत्रित करने हेतु क्या किया जाता है, इन सब प्रश्नों पर विचार करने के साथ ही सामाजिक मनोवृत्ति को समझने और उसे प्रश्नांकित किए जाने की भी जरूरत है।

सामाजिक मनोवृत्ति को आखिर कानून बदलने से भी बदला नहीं जा सका है। कानून की भूमिका दण्ड देने तक सीमित होती है, यदि वह अपराध को मिटाने में सक्षम होता तो इस तरह के अपराध होते ही नहीं। सामाजिक मनोवृत्तियाँ अक्सर कानून को भी निष्प्रभावी करती रही है।

लेखक का परिचय

डॉ. मोनिका भाम्भू कलाना

डॉ. मोनिका भाम्भू कलाना कॉलेज शिक्षा विभाग, राजस्थान सरकार के अंतर्गत सहायक आचार्य (हिंदी) के पद पर कार्यरत है।

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