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जननेता कामरेड होमी एफ दाजी – शताब्दी पर जयजगत !

जननेता कामरेड होमी एफ दाजी – शताब्दी पर जयजगत !

ऐसे जमाने में जब बुजुर्गों, खासकर प्रात:स्मरणीय बुजुर्गों को तुरत-फुरत भुलाना चलन में है, अनिल भाई का कॉमरेड होमी एफ. दाजी को याद करना बेहद प्रासंगिक है। करीब पचास साल के विचारवान राजनीतिक, सामाजिक जीवन में दाजी साहब ने इंदौर...

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ऐसे जमाने में जब बुजुर्गों, खासकर प्रात:स्मरणीय बुजुर्गों को तुरत-फुरत भुलाना चलन में है, अनिल भाई का कॉमरेड होमी एफ. दाजी को याद करना बेहद प्रासंगिक है। करीब पचास साल के विचारवान राजनीतिक, सामाजिक जीवन में दाजी साहब ने इंदौर के नगरीय निकाय से लगाकर राज्य की विधानसभा और देश की संसद तक अपनी प्रभावी आवाज गुंजायमान की। क्या थे, दाजी साहब?


5 सितम्बर : कामरेड होमी दाजी जन्म शताब्दी

होमी एफ. दाजी साम्यवादी विचारधारा के साथ ज़ीने वाले राजनेता होने के साथ ही वंचित तबके से लेकर पढ़े-लिखे बुद्धिजीवियों के मन-मस्तिष्क को गहराई से प्रभावित करने वाले राजनेता थे। होमी दाजी का जन्म 5 सितम्बर 1926 को बम्बई में एक पारसी परिवार में हुआ था 14 मई 2009 को कामरेड होमी दाजी ने अपनी जीवन यात्रा इन्दौर में 82 वर्ष की आयु में पूरी की। जीवन संघर्ष क्या होता है यह होमी दाजी ने अपने जीवन के प्रारंभ में ही अच्छे से समझ लिया था। बम्बई से अपने पिताजी के साथ होमी दाजी इन्दौर आये और अपना और परिवार का जीवन गढ़ने की।

होमी दाजी के जीवन की कहानी वंचित समुदायों में रहने और हक़ एवं गरिमापूर्वक जीते रहने की अनोखी कहानी है। आजादी के शुरूआती काल में सभी लोगों के मन में बहुत उत्साह था। आजादी की खुशी और आगे बढ़कर देश, समाज के कार्य में भागीदारी की प्रवृत्ति भी मौजूद थी। आजादी के आन्दोलन के कारण जनचेतना समाज के सभी तबकों और हिस्सों में मौजूद थी। गुलामी के कालखंड की उदासीनता छट चुकी थी।

इस कालखंड में नौजवान होमी दाजी, जो खुद घनघोर आर्थिक संकटों से घिरे हुए थे, ने अपनी परवाह किए बगैर लोगों के अरमानों को जगाने के लिए संघर्ष की राजनीति की राह चुनी। छात्र जीवन में अपने अध्ययन हेतु स्कूल की फीस भरने लायक आर्थिक स्थिति नहीं होने पर भी होमी दाजी ने बिना घबराये और बिना पीछे हटे, छात्र जीवन संघर्ष की वैचारिक प्रतिबद्धता एवं तेजस्विता के साथ इतिहास विषय में आगरा यूनिवर्सिटी से एमए करने के साथ ही एलएलबी  की डिग्री मेरिट में स्थान पाकर हासिल की।

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कामरेड होमी दाजी जैसा शब्दों और आवाज का जादूगर किसी भी कालखंड में यदा-कदा ही  उभरता है। कामरेड होमी दाजी को सुनने के लिए लोग लालायित रहते थे। दाजी का कालखंड एक तरह से वैचारिक सक्रियता का कालखंड था। होमी दाजी को अपने श्रोताओं के मानस की गहरी समझ थी। यदि गरीब, वंचित और निरक्षर लोगों के बीच होमी दाजी बोलते थे तो इस तरह बोलते थे कि उनकी बातें श्रोताओं के दिल-दिमाग में उतर जाएं। इसी तरह पढ़े-लिखे विद्वानों की सभा में भी शामिल श्रोता समूह, मंत्र मुग्ध हो दाजी को सुनता रहता था।

आमसभा हो या कपड़ा मिलों में गेट-मीटिंग, होमी दाजी के भाषण न केवल मजदूरों को राजनीतिक चिंतन का विषय देते थे, वरन सुनने वाले मजदूर, अपनी-अपनी बस्तियों में जाकर लोगों को बताते थे कि आज होमी दाजी ने अपने भाषण में यह बात कही। इस तरह मज़दूरों को गेट-मीटिंग के माध्यम से अपनी बस्तियों में जाकर राजनीतिक चेतना को फ़ैलाने की कोचिंग वे आमसभाओं के माध्यम से करते रहते थे। होमी दाजी की वकालत का कार्यालय एक तरह से वकालत के साथ राजनीतिक, सामाजिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण केन्द्र की तरह जाना जाता था।

कामरेड होमी दाजी ने सन् 1962 में चीन के भारत पर हमले की पृष्ठभूमि में इन्दौर से लोकसभा का चुनाव निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़ा और वे तीसरी लोकसभा के सदस्य बने। इस लोकसभा निर्वाचन की एक और उल्लेखनीय बात यह थी कि समाजवादी पार्टी ने मामा बालेश्वर दयाल को इन्दौर लोकसभा से प्रत्याशी बनाया था। इस आम चुनाव में जीत होमी दाजी को मिली। इन्दौर लोकसभा क्षेत्र से मामा बालेश्वर दयाल के समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ने से जो राजनीतिक चेतना निकली उसकी परिणति यह हुई कि 1967 के विधानसभा चुनाव में इन्दौर से कल्याण जैन और आरिफ बेग दोनों समाजवादी विधायक निर्वाचित हुए।

इस तरह कामरेड होमी दाजी और मामा बालेश्वर दयाल के निर्वाचन लड़ने से इन्दौर की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ आया और समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा की इन्दौर की राजनीति और समाजिक जीवन में पकड़ मजबूत हुई। लोकसभा में कामरेड होमी दाजी ने अपनी भाषण कला के साथ संसदीय प्रक्रिया की गहरी संवैधानिक समझ होने की छाप छोड़ी। इस कालखंड में पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। समाजवादी नेता डॉ.राममनोहर लोहिया सहित देश के दिग्गज राजनेता लोकसभा में मौजूद थे। लोकसभा में सक्रिय भूमिका से कामरेड होमी दाजी ने देश के राजनेताओं सहित जनमानस का ध्यान आकर्षित किया और देश की संसदीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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कामरेड होमी दाजी दो बार मध्यप्रदेश की विधानसभा के सदस्य के रूप में इन्दौर के श्रमिक क्षेत्र से निर्वाचित हुए। कामरेड होमी दाजी बाद में 1967 के लोकसभा चुनाव में प्रकाशचन्द्र सेठी से हार गए। 1971 में पुनः इन्दौर के श्रमिक क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। इन्दौर, मध्यप्रदेश और भारत के श्रमिक आंदोलन में कामरेड होमी दाजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ‘एटक’ में राष्ट्रीय स्तर पर भी कामरेड होमी दाजी की भूमिका इतिहास में दर्ज है।

कामरेड होमी दाजी की जीवनसाथी कामरेड पैरिन दाजी ने घर, परिवार से लेकर कम्युनिस्ट पार्टी, श्रमिक आन्दोलन और सार्वजनिक एवं निजी जीवन में बराबरी से सहभागिता कर एक आदर्श प्रस्तुत किया। कामरेड होमी दाजी एवं पैरिन दाजी का एक बेटा रूसी दाजी जो एक अभिभाषक होने के साथ-साथ आजीवन सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहा। इसी तरह एक बेटी कामरेड डाक्टर रोशनी दाजी, जो रूस से डाक्टर बनकर आई और इन्दौर की मजदूर बस्तियों में चिकित्सकीय परामर्श और इलाज एक डिस्पेंसरी के माध्यम से करते हुए राजनीतिक सामाजिक गतिविधियों में आजीवन शामिल रही। कामरेड दाजी के दोनों बच्चों का युवा अवस्था में ही देहावसान हो जाना दाजी दम्पति के जीवन काल की गहरी दुखदाई घटना होने पर भी दाजी दम्पति ने निराशा को अपने निजी जिंदगी में फटकने नहीं दिया।

होमी दाजी ने पचास – पचपन साल से ज्यादा समय सार्वजनिक जीवन में सक्रियता के साथ बिताया। इस कालखंड में हजारों नौजवानों, मजदूरों, किसानों और राजनीतिक सामाजिक, कार्यकर्ताओं को जनता के लिए और जनता की तरह जीते हुए निर्भय राजनीति करते रहने का रास्ता दिखाया। मैं सन् 1960 में नौ वर्ष की आयु में पहली बार कामरेड होमी दाजी से एक आमसभा में मिला था। तब से लेकर कामरेड होमी दाजी के अंतिम संस्कार तक की घटनाएं मेरी स्मृति में आज भी जीवन्त रूप में दर्ज हैं। मुझे कामरेड होमी दाजी को देखने, सुनने, समझने और साथ काम करने का लंबा अवसर मिला ।

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कामरेड होमी दाजी से जीवन के कई नए आयाम सीखने का अद्भुत अवसर भी मिला। इन्दौर के साम्यवादी विचारधारा के कई कार्यकर्ताओं और राजनीतिक सामाजिक नेतृत्व से भी सम्पर्क का अवसर मिला। श्री दत्तात्रय सरमंडल, कामरेड अनन्त लागू से लेकर इन्दौर के साम्यवादी आन्दोलन की आज की पीढ़ी एवं पुरानी पीढ़ी के लगभग सभी साथियों एवं लोगों से पिछले साठ-पैंसठ सालों से मिलने और जानने का एक लंबा सिलसिला जारी है, जो मेरे जीवन के अनुभवों का अनमोल खजाना है।

यह वर्ष कामरेड होमी दाजी का शताब्दी वर्ष है। सौ वर्ष में सारी दुनिया में जमीन आसमान का अंतर आता है, पर सारी दुनिया में मनुष्यता के बुनियादी सवाल और अधिक गहराई से वैसे ही उठ रहे हैं जैसे सौ साल पहले या उससे पहले भी उठ रहे थे। सौ साल यानी पांच पीढ़ियों का कालखंड आज के कालखंड से एकदम भिन्न हो गया है, पर भारत ही नहीं सारी दुनिया की समस्याएं और उन्हें समझने और धीरज के साथ बेहतर रास्ता निकालने की समझ जरूरी है।आज के कालखंड के नौजवान, मजदूर, किसान और जीवन संघर्ष में रास्ता खोज रहे राजनैतिक, सामाजिक गतिविधियों में लगे हुए आन्दोलनकारी लोगों को नया बेहतर रास्ता निकालने का आमंत्रण दे रही है जैसा की कामरेड होमी दाजी की युवावस्था में आजाद भारत के शुरुआती दिनों में युवा होमी दाजी की पीढ़ी को मिला था। कामरेड होमी दाजी की जन्म शताब्दी पर कामरेड होमी दाजी, पैरिन दाजी, रूसी दाजी, डाक्टर रोशनी दाजी सहित जीवन संघर्ष के सभी साथियों सहित सभी दिवंगत साथियों का भी सादर स्मरण। (सप्रेस)

श्री अनिल त्रिवेदी वरिष्ठ गांधीवादी विचारक, चिंतक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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