Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

चरम मौसम की घटनाएं जानलेवा साबित हो रहा है

लेखक की फोटो

भारत में चरम मौसम घटनाओं की रफ्तार भयावह स्तर तक बढ़ चुकी है। हीटवेव, बाढ़, चक्रवात, बादल फटना और बिजली गिरने जैसी आपदाएँ अब लगभग पूरे साल देश के किसी न किसी हिस्से को प्रभावित कर रही हैं। इनकी बढ़ती आवृत्ति, अवधि और तीव्रता जलवायु परिवर्तन के गहरे संकट की स्पष्ट चेतावनी देती हैं, जो जीवन, आजीविका और अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बन गई है।


भारत में चरम मौसम (एक्स्ट्रीम वेदर) तेजी से बढ़ रहे हैं और अब यह केवल मौसमी उतार–चढ़ाव नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। हीटवेव, बाढ़, चक्रवात, सूखा, बादल फटना, आकाशिय बिजली गिरने, समुद्री तूफान और हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झील फटना जैसी घटनाएं पिछले एक दशक में रिकॉर्ड स्तर पर दर्ज की गई हैं। इन घटनाओं की आवृत्ति, अवधि और तीव्रता में बढ़ोतरी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का स्पष्ट संकेत है। इस वर्ष जनवरी से सितंबर तक 273 दिनों में से 270 दिन देश के किसी न किसी हिस्से को मौसम की एक्स्ट्रीम वेदर का सामना करना पड़ा है। इन घटनाओं में 4064 लोगों की जानें गई ,99,533 घर ढह गए, 94.7 हेक्टेयर खेत में फसल बर्बाद हो गई और 58,982 मवेशी मारे गए। मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा 532 लोगों की मौत हुई है। पिछले तीन वर्षों में 2022 में 241,2023 में 235 और 2024 में 255 दिनों तक एक्स्ट्रीम वेदर रहा था, जिसके कारण क्रमशः 2755, 2923 और 3238 लोगों की जानें गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के जलवायु, पर्यावरण और स्वास्थ्य विभाग के अनुसार वायु प्रदुषण से विश्व में प्रतिवर्ष 90 लाख मौतें होती है। इसके अलावा 18.9 करोड़ लोग हर साल चरम मौसम से जुड़ी घटनाओं से प्रभावित होते हैं। भारत में 1990 से 2020 के बीच चरम मौसम से 100 बिलियन डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है।

See also  सिकुड़ते जंगल, बढ़ता भय — विकास की कीमत कौन चुकाएगा?

जर्मन वाच के एक नए क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स के अनुसार, पिछले 30 वर्षों में चरम मौसम से सबसे अधिक प्रभावित देशों में भारत नौवें स्थान पर है।

 इस चरम मौसम के कारण सबसे ज्यादा मछुआरा समुदाय, तटीय मजदूर, किसान और दिहाड़ी कामगार सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। द लैंसेट काउंटडाउन 2025 के रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ती गर्मी से हर मिनट  एक व्यक्ति की मौत हो रही है और गरीब देशों की आय का छह फीसदी हिस्सा खत्म हो गया है। ‘ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हेल्थ’ जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण एशिया में हर साल 2 लाख से अधिक लोग बेहद गर्मी से जान गंवा रहे हैं। अनुमान है कि 2045 तक यह संख्या 4 लाख प्रतिवर्ष तक पहुंच सकती है। यानी हर घंटे 46 लोगों की मौत हो सकती है।  पृथ्वी पर जीवन हमेशा गतिमान रहा है, चाहे इंसान हो या दूसरे जीव हमेशा एक जगह से दूसरी जगह आवागमन करते रहते हैं। वाइजमैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए इस नए अध्ययन से पता चला है कि इंसानों की कुल आवाजाही अब धरती पर मौजूद सभी जंगली जानवरों, पक्षियों, स्तनधारियों और कीटों की कुल हलचल से करीब 40 गुणा ज्यादा हो चुकी है।

अंतराष्ट्रीय जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि पिछले तीन दशकों में भारत के अधिकांश हिस्सों में धूप के घंटे कम होते जा रहे हैं। यह अध्ययन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी (आईआईटीएम), पुणे और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) से जुड़े वैज्ञानिकों के दल द्वारा किया गया है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल  से जुड़े जलवायु वैज्ञानिकों की एक टीम ने शोध-पत्र में उल्लेख किया गया है कि भारत का औसत तापमान पिछले एक दशक (2015–2024) में लगभग 0.9°C बढ़ गया है, जो 20 वीं सदी की शुरुआत (1901–1930) की तुलना में है। इसके अतिरिक्त, पश्चिमी और पूर्वोत्तर भारत में वर्ष के सबसे गर्म दिन का तापमान 1950 के दशक से अब तक 1.5 से 2°C तक बढ़ चुका है।

See also  जलवायु परिवर्तन : खेती पर मंडराता खतरा

21वीं सदी में, ‘जलवायु संकट’ मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया है, जिससे राहत मिलने की कोई संभावना नहीं दिख रही है, जिससे तापमान में तीव्र वृद्धि हो रही है और वैश्विक स्तर पर सभी कमजोर समुदायों के लिए खतरा बढ़ गया है। भारत में अनियंत्रित गति से बढ़ते जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण है कि बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा अभी भी कोयला आधारित थर्मल प्लांटों से आता है। परिवहन क्षेत्र में डीजल और पेट्रोल की खपत लगातार बढ़ रही है। औद्योगिक क्षेत्रों में कोयला और पेट्रोलियम उत्पादों का भारी उपयोग हो रहा है। जिससे तापमान में वृद्धि और वायु प्रदूषण दोनों बढ़ रहे हैं। तेजी से बढ़ते शहरों में कंक्रीट का फैलाव बढ़ रहा है दूसरी ओर शहरों में ग्रीन स्पेस, झीलें और जलाशय घटते जा रहे हैं। ऊंची इमारतें, सड़कें और औद्योगिक क्लस्टर, सब मिलकर “हीट आइलैंड प्रभाव” को बढ़ा रहे हैं।

भारत को त्वरित, समन्वित और स्थानीय स्तर पर अनुकूलित  जलवायु नीति की आवश्यकता है। जलवायु अनुकूलन (क्लाइमेट एडपटेशन) मजबूत करना और जोखिम वाले जिलों की क्लाइमेट एटलस तैयार कर योजनाओं को उसी आधार पर बजट देना। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जल निकासी, बाढ़ सुरक्षा, हीट एक्शन प्लान लागू करना, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, नदी संरक्षण और वेटलैंड संरक्षण को मजबूत करना होगा। समाधान केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों, पंचायतों, नगर निकायों, वैज्ञानिक संस्थानों और नागरिकों की संयुक्त भागीदारी से ही संभव है।

जलवायु परिवर्तन को कम करने और इसके प्रभावों से निपटने के लिए अभी कदम उठाना अनिवार्य है, क्योंकि आने वाला दशक भारत के लिए निर्णायक है। प्राथमिकता से प्रत्येक राज्य में आधुनिक, तकनीकी आधारित चेतावनी तंत्र विकसित करना और पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों में सैटेलाइट आधारित मॉनिटरिंग व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक है।(सप्रेस)

WhatsApp हमारे WhatsApp Channel को Join करें
See also  सुप्रीम कोर्ट से संवैधानिक अधिकार : मौसम और मजदूरी पर फैसले

Table of Contents

अनशन से आगे का संघर्ष: सोनम वांगचुक से उठी एक ऐसी अपील, जिसने लोकतंत्र की आत्मा को छू लिया

लोकतांत्रिक आंदोलनों का इतिहास केवल संघर्षों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन नैतिक दुविधाओं का भी इतिहास है, जहाँ एक ओर सिद्धांतों के लिए जीवन दांव पर लगा होता है और दूसरी ओर वही जीवन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी

Read More »

सोनम वांगचुक :  अनशन नहीं, सत्ता का चरित्र बदला है

सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब केवल शिक्षा सुधार या एक मंत्री की जवाबदेही का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध की प्रभावशीलता की भी परीक्षा बन चुका है। इसी बीच न्यायालय ने उनके जीवन की रक्षा को

Read More »

यात्रा-वृत्तांत : अनोखी है बैतूल की भू-संस्कृति

भारत की विविध भू-संस्कृतियों की खोज में बैतूल एक ऐसा पड़ाव है, जहाँ प्रकृति, लोकजीवन, आस्था और सामुदायिक संस्कृति एक-दूसरे में सहज रूप से घुली-मिली दिखाई देती हैं। यह यात्रा-वृत्तांत एक शोधार्थी की आँखों से बैतूल की सांस्कृतिक और प्राकृतिक

Read More »