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कृत्रिम बुद्धिमत्ता बनाम प्रकृति : अरावली और हमारे संवैधानिक दायित्व

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कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार प्रतीत होने वाला अरावली संबंधी सरकारी एफिडेविट भविष्य के लिए गंभीर चिंता पैदा करता है। इसमें न प्रकृति की समझ झलकती है, न सांस्कृतिक दृष्टि। संवैधानिक दायित्वों और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण प्रतिबद्धताओं की अनदेखी से पहाड़ों का अस्तित्व खतरे में है। यदि समय रहते सावधानी नहीं बरती गई, तो यह प्रवृत्ति पर्यावरण और न्याय व्यवस्था दोनों के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।


कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार भारत सरकार के जलवायु परिवर्तन, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अरावली एफिडेविट को देखकर भविष्य में डर दिखता है। अरावली केवल 100 मीटर ऊंची ही है, इससे नीचे पहाड़ नहीं होता ऐसा एफिडेविट भारत का नागरिक नहीं बना सकता। यह काम तो केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता ही कर सकती है। एफिडेविट में प्रकृति और संस्कृति हेतु स्थान नहीं है। भारत सरकार का अरावली एफिडेविट तो अरावली के माथे पर अभिशाप बन गया है। तब संविधान के अनुच्छेद 21 तथा 48ए के साथ-साथ भारतीय संविधान का अनुच्छेद 253, जो अंतरराष्ट्रीय संधियों, समझौतों, सम्मेलनों या निर्णयों को प्रभावी बनाने के लिए संसद को शक्तियां प्रदान करता है, हमें स्मरण आता है। इसी से कानून बनाने का अधिकार भी प्राप्त होता है और इसी के आधार पर हम अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को भी पूरा करते रहे हैं।

हमारा देश अंतर्राष्ट्रीय राष्ट्रसंघ और संयुक्त राष्ट्रसंघ के 1992 के वन सिद्धांतों का हस्ताक्षरी है। इसलिए स्वतः ही हम जीवन प्रकृति का पर्यावरण पहाड़ संरक्षण सिद्धांतों के पालन का आह्वान करते हैं। भारत ने 1992 में उक्त सिद्धांत अपनाए थे। मैं स्वयं भी वर्ष 1992 में रियो डी जनेरो में आयोजित सम्मेलन में भागीदार रहा था। 1991 में फ्रांस में पृथ्वी शिखर सम्मेलन के तैयारी सम्मेलन में बोलने गया था और दस दिन तक पूरी कार्रवाई का सहभागी रहा। यह वह काल था जब राज्य और न्यायपालिका अपने लोगों की बातें सुनती और मानती थी। पृथ्वी शिखर सम्मेलन 1992 में वनों, वनवासियों और वन्यजीवों के संरक्षण, प्रबंधन, संवर्धन और सतत विकास की अवधारणा का विस्तार हुआ। इसी के अंतर्गत वैश्विक सहमति हेतु सिद्धांतों का आधिकारिक विवरण प्रस्तुत किया गया।

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भारत ने विकासशील 77 देशों के समूह के हितों का प्रतिनिधित्व करते हुए वार्ताओं में प्रमुख भूमिका निभाई थी। हमारी 1988 की वन नीति सदैव सभी सम्मेलनों में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है और इसी के कारण हम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रभावशाली रहे। वनों को बचाने की भारतीय प्रतिबद्धता बहुत गहरी रही है, इसलिए भारत के पहाड़, जंगल और जंगली जीव आज तक बचे रहे हैं।

अब हम अपने संवैधानिक दायित्वों को भूल रहे हैं। हमने उन्हें भुलाया तो हमारे पर्वत और पहाड़ नष्ट होने लगे हैं। अरावली का विनाशकारी मानचित्र बनता जा रहा है क्योंकि हमने अपने प्राकृतिक और सांस्कृतिक चिंतन-मनन को छोड़कर अपना व्यवहार और संस्कार बदल दिया है।

अब हम जीवन के हर व्यवहार में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर निर्भर होते जा रहे हैं। प्रकृति और संस्कृति के संबंध विच्छेद के कारण कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रभावी होकर संपूर्ण जीवन-बोध को नष्ट कर रही है। यदि जंगल, पहाड़, नदियाँ और जीवन को बचाना है तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जीवन-बोध के नीचे नियंत्रित रखकर ही उपयोग करना होगा। न्यायपालिका के निर्णयों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता से मुक्त रखना हमारा संवैधानिक दायित्व है और इसकी पालना होनी चाहिए। वर्तमान में अफसरों द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार सरकारी एफिडेविट अरावली के संदर्भ में यह आभास कराते हैं कि इनका निर्णयों पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। इससे हमें बचना और बचाना है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता जीवनशैली असहायता को संकट में डाल रही है। इससे बचना कठिन नहीं है। इसके लिए प्रकृति और संस्कृति की समझ के साथ जीवन जीना ही होगा। प्रकृति हमारे भावों को प्रगाढ़ करती है, वह हमारी पोषक है। हमें सिखाने वाली है। जबकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमें नकलची बनाती है। बचपन में भी शिक्षा में नकल को बुरी बात माना जाता था, किंतु अब नकल को मान्यता मिल रही है। बुद्धिमत्ता केवल मान्यता नहीं है, यह इनका सब कुछ बिगाड़ भी सकती है।

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हमारी प्रशासनिक गतिविधियों में तेजी से काम होना अच्छा लगता है, परंतु जल्दबाजी घातक हो सकती है। इस समझ के साथ काम करेंगे तो कृत्रिमं पर भी प्राकृतिक प्रभाव बना रहेगा। जीवन सबसे महत्वपूर्ण है इसे सत्य मानकर इसका संरक्षण करना चाहिए। जीवन संरक्षण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सीमित भूमिका हो सकती है, परंतु जीवन को बचाने के लिए पहाड़ भी हमारे जैसे ही जीवंत अस्तित्व हैं। उनके जीवन को बचाना आवश्यक है। पहाड़ हमारे लिए जलवायु निर्माण करते है। इनके बिना सम्पूर्ण पृथ्वी नहीं बनती है और नहीं चलती है। हमारे शरीर की तर्ज पर पंचमहाभूतों द्वारा निर्मित पहाड़ है। इसे नष्ट करने का काम उंचाई-निचाई में बांटकर नष्ट करने की कोई भारतीस सिफारिश नहीं कर सकता। हम भारतीय पहाडों को भी अपना प्राण-जीवित इकाई मानते है।

अरावली के संदर्भ में भारत सरकार के संबंधित मंत्रालयों ने जो ऐफिडेविट उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत किया है, उसे देखकर लगता है कि, यह मशीनों ने बनाया है। मशीन बड़े कामों को आसानी कर देती है। आजकल कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सभी काम होने लगे है। इस ऐफिडेविट को देखकर भी मशीन द्वारा तैयार कराये जैसा ही लगता है। मुझे इस बात की शंका है।

सम्मानीय उच्चतम न्यायालय से प्रार्थना करता हूं कि  इस ऐफिडेविट निर्माण प्रक्रिया की जांच कराऐं; आगे ऐसा नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो हमारे देश का अहित होगा। सम्मानीय उच्चतम न्यायालय गलतियां होने से पहले ही संवैधानिक दायित्व निभाने हेतु भारत के लोक को न्याय दिलाने का काम करता रहा है। ये अरावली के मामले में ऐसा जरूर करेगा। इसी से भारत के सभी पहाड़ों को बचाने की प्रक्रिया शुरू होगी।

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डॉ. राजेंद्र सिंह, जिन्हें “भारत का जलपुरुष” के नाम से जाना जाता है, प्रख्यात नदी पुनर्जीवनकर्ता और पर्यावरणविद् हैं। डॉ. सिंह तरुण भारत संघ के संस्थापक और अध्यक्ष हैं, जिसने पिछले 50 वर्षों में पूरे भारत में 1500 से अधिक गांवों को 14,800 जल संरचनाओं के निर्माण के लिए तैयार और सहायता प्रदान की है। उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया है, जिनमें भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा 1994 में दिया गया इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार शामिल है।

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